द्वितीय सोपान

अयोध्याकाण्ड

राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन एवं भरत मिलाप की कथा।

1. मंगलाचरण एवं कथा का आरंभ

तुलसीदास जी अयोध्याकाण्ड आरंभ करने से पहले फिर श्रीराम को प्रणाम करते हैं। वे कहते हैं — जिनके मुखकमल की शोभा न तो राज्याभिषेक की बात सुनकर हर्ष से बढ़ी, न वनवास के दुःख से म्लान हुई, उन रघुनंदन श्रीराम के उस मुखारविंद की शोभा सदा मुझे मंगल प्रदान करने वाली हो। भक्तो, ध्यान दीजिए — यह श्लोक ही पूरे काण्ड का सार खोल देता है। श्रीराम का चरित्र इस पूरी कथा में एक ही धुरी पर टिका रहेगा — न राज्य पाने का हर्ष, न राज्य खोने का शोक। यही समता, यही स्थितप्रज्ञता उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाती है। फिर तुलसीदास जी गुरु के चरणों की रज से अपने मन-रूपी दर्पण को स्वच्छ करके श्रीराम के उस निर्मल यश का वर्णन आरंभ करते हैं, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों फल देने वाला है। कथा आरंभ होती है वहीं जहाँ बालकाण्ड छूटी थी — जब से राम विवाह करके अयोध्या लौटे, तब से नगर में प्रतिदिन नए मंगल-उत्सव होने लगे। चौदहों लोक मानो विशाल पर्वत हैं, जिन पर पुण्य-रूपी बादल सुख की वर्षा कर रहे हैं। ऋद्धि-सिद्धि और संपत्ति नदियों के समान उमड़कर अयोध्या-रूपी समुद्र में आ मिलीं। नगर के स्त्री-पुरुष उत्तम कुल के मणियों के समान पवित्र और सुंदर हैं। राजा दशरथ राम के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख-सुनकर दिन-रात प्रसन्न रहते हैं। सबके हृदय में एक ही अभिलाषा उठ रही है — सब मिलकर महादेव जी को मनाते हैं कि राजा अपने जीते-जी ही राम को युवराज-पद प्रदान करें। सोचिए भक्तो — कितना सुंदर, कितना निष्कलंक था वह समय। पूरा राज्य, पूरी प्रजा एक स्वर में राम के अभिषेक की कामना कर रही थी। न कोई ईर्ष्या, न कोई विरोध। ऐसा लगता था मानो अयोध्या में स्वयं स्वर्ग उतर आया हो। पर भक्तो, यही तो जीवन का रहस्य है — जब सब कुछ इतना निर्दोष, इतना संपूर्ण दिखे, तभी सबसे अधिक सजग रहना चाहिए, क्योंकि विधाता की गति कोई नहीं जानता। सीख: जीवन में जब सब कुछ अनुकूल हो, जब चारों ओर सुख और सफलता का ही वातावरण हो, तब भी विनम्र और सजग बने रहें। सुख के शिखर पर पहुँचकर अहंकार में डूब जाना ही सबसे बड़ी भूल है। समता — न अति हर्ष, न अति शोक — यही जीवन की सच्ची कुशलता है, और यही श्रीराम का प्रथम उपदेश है जो इस काण्ड के आरंभ में ही छिपा है।

2. राज्याभिषेक का निर्णय

एक दिन राजसभा में बैठे राजा दशरथ राम का सुयश सुनकर अत्यंत उल्लसित हो रहे थे। उन्होंने स्वाभाविक ही हाथ में दर्पण ले लिया और अपना मुख देखकर मुकुट सीधा किया। कानों के पास बाल सफेद हो गए थे, मानो बुढ़ापा स्वयं उपदेश दे रहा हो — "हे राजन, राम को युवराज पद दो, अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों न उठा लो।" हृदय में यह विचार लेकर राजा शुभ दिन और उत्तम अवसर पाकर गुरु वशिष्ठ के पास गए। उन्होंने कहा — "हे मुनिराज, राम हर प्रकार से पूर्ण योग्य हो गए हैं। सेवक, मंत्री, समस्त नगरवासी — चाहे शत्रु हों, मित्र हों या उदासीन — सब राम को उतना ही प्रिय मानते हैं जितना मुझे। अब मेरे मन में एक ही अभिलाषा है — मेरे जीते-जी ही यह उत्सव हो जाए, जिससे सभी लोग अपने नेत्रों का लाभ पा सकें। फिर मुझे कोई चिंता नहीं कि शरीर रहे या जाए, बस पीछे कोई पछतावा न रह जाए।" गुरु वशिष्ठ ने प्रसन्न होकर तुरंत आज्ञा दी और अभिषेक की तैयारी आरंभ हो गई। सभी पवित्र तीर्थों का जल मँगवाया गया, नगर में मंडप सजाए गए, चौक मणियों से सँवारे गए, ध्वजा-पताका-बंदनवार लगाए गए। पूरी अयोध्या एक दुल्हन की तरह सज उठी। राम और सीता के शरीर पर शुभ शकुन प्रकट होने लगे, उनके मंगलमय अंग फड़कने लगे। रनिवास आनंद से भर उठा, कौशल्या माता ने ब्राह्मणों को भरपूर दान दिया, सुमित्रा जी ने चौक सजाए, कोयल जैसी मधुर वाणी वाली स्त्रियाँ मंगलगान गाने लगीं। गुरु वशिष्ठ स्वयं राम को शिक्षा देने उनके महल पहुँचे। राम ने सीता सहित उनके चरण पकड़े और कहा — "हे स्वामी, अपनी प्रभुता को त्यागकर आपने यह स्नेह दिखाया है — आज यह घर पवित्र हो गया। जो भी आज्ञा हो, मैं वही करूँगा; सेवक तो स्वामी की सेवा में ही अपनी सार्थकता पाता है।" गुरु ने कहा — राजा तुम्हें कल युवराज बनाना चाहते हैं, आज संयम और व्रत का पालन करो। यह सुनकर श्रीराम के हृदय में एक सूक्ष्म संकोच उठा। वे सोचने लगे — सभी भाई साथ-साथ जन्मे, बचपन में साथ-साथ भोजन-शयन-खेल किए, कर्णवेध-यज्ञोपवीत-विवाह सब संस्कार साथ-साथ हुए। इस निर्मल वंश में यह एक बात अनुचित-सी लगती है कि अन्य भाइयों को छोड़कर केवल बड़े का ही अभिषेक हो। देखिए भक्तो — इतनी बड़ी सफलता, इतना बड़ा सम्मान सामने होते हुए भी, राम के मन में पहला विचार यही उठा कि मेरे भाई इससे वंचित क्यों रह जाएँ! यही तो उनके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है। उधर पूरे नगर में उत्सव है। लोग पूछ रहे हैं — "कल की शुभ लगन में अब कितना समय शेष है?" स्वर्ण सिंहासन पर सीता सहित राम बैठेंगे, यह सोचकर सब सचेत मन से प्रतीक्षा कर रहे हैं। पर उसी समय, जैसा कवियों ने कहा है — "जैसे चोर को चाँदनी रात नहीं भाती, वैसे ही कुटिल स्वभाव के दुष्ट लोगों को अयोध्या का यह उत्सव नहीं सुहाता।" और यहीं से कथा एक नया, अत्यंत गूढ़ मोड़ लेती है। देवताओं ने, जिनका भार रावण के अत्याचार से भरा पड़ा था और जो जानते थे कि राम का अवतार रावण-वध के लिए ही हुआ है, यह देखा कि यदि राम अयोध्या में ही राजा बनकर रह गए तो देवताओं का प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा! वे सरस्वती माता के पास गए और विनती करने लगे — "हे माता, हमारी इस बड़ी विपत्ति को देखकर आज ऐसा कीजिए कि राम राज्य त्यागकर वन चले जाएँ, जिससे देवताओं का सारा प्रयोजन सिद्ध हो जाए।" सरस्वती जी संकोच से भर उठीं, पर देवताओं के आग्रह पर, विवश होकर वे अयोध्या की ओर चलीं — मानो कोई असह्य दुखदायी ग्रहदशा उतर रही हो। और उन्होंने अपना निवास बनाया कैकेयी की दासी मंथरा की मंदबुद्धि में। सीख: यहाँ हमें एक गहरा सत्य दिखता है — कभी-कभी जीवन में जो घटना बाहर से सबसे बड़ा दुर्भाग्य लगती है, वह भीतर से किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति का माध्यम होती है। देवताओं का स्वार्थ भी अंततः धर्म की स्थापना का निमित्त बना। इसलिए जब जीवन में अचानक कोई विपत्ति आ खड़ी हो, तो निराश होने से पहले यह याद रखें — विधाता की योजना हमारी समझ से परे होती है, और हर अंधकार के पीछे कोई बड़ा प्रकाश छिपा हो सकता है।

3. मंथरा-कैकेयी कुमंत्र

मंथरा ने देखा कि नगर सज रहा है, मंगल बाजे बज रहे हैं। उसने पूछा — यह किस बात का उल्लास है? राम-तिलक की बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा। कुबुद्धि और कुजाति मंथरा विचार करने लगी — किसी भी तरह आज रात यह कार्य बिगड़ जाए। वह उदास मुख बनाकर भरत की माता कैकेयी के पास गई। रानी ने हँसकर पूछा — "क्यों उदास है?" पर मंथरा कोई उत्तर न देकर केवल लंबी साँस लेती रही, स्त्री-सुलभ चातुर्य से आँसू बहाने लगी। रानी हँसकर बोलीं — "तेरी तो बड़ी बातें बनाने की आदत है, लगता है लक्ष्मण ने तुझे कोई सीख दे दी है।" मंथरा फिर भी काली नागिन की तरह लंबी साँसें छोड़ती रही। भयभीत होकर रानी बोलीं — "बोलती क्यों नहीं, राम, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सब कुशल तो हैं?" यह सुनकर मंथरा के हृदय में और भी जलन उठी, और वह बोली — "मुझे भला कौन सीख देगा, हे रानी? राम को छोड़कर आज किसकी कुशलता है, जिसे राजा युवराज बनाने जा रहे हैं? कौशल्या पर विधाता अत्यंत अनुकूल हो गए हैं, यह देखकर उनके हृदय में गर्व समाता नहीं। तुम्हारा पुत्र विदेश में है, तुम्हें कोई चिंता नहीं, तुम्हें तो बस नींद और मुलायम सेज ही प्रिय है — राजा की चतुर चालाकी तुम पहचान ही नहीं पातीं।" यह मीठी परंतु विषभरी बात सुनकर कैकेयी ने उसका मलिन मन भाँप लिया और डाँटकर बोलीं — "अब चुप रह, घर फोड़नेवाली! फिर कभी ऐसी बात कही तो तेरी जीभ पकड़कर खिंचवा डालूँगी।" उन्होंने आगे यहाँ तक कहा — "बड़ा भाई स्वामी और छोटे भाई सेवक होते हैं, यही सूर्यवंश की परंपरा है। राम को तो सहज स्वभाव से ही सब प्रिय हैं, वे सब माताओं पर विशेष स्नेह रखते हैं। यदि विधाता कृपा करके मुझे फिर जन्म दें, तो राम और सीता ही मेरे पुत्र-पुत्रवधू बनें। मुझे तो राम प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं — फिर उनके तिलक से तुझे इतनी व्याकुलता क्यों है?" भक्तो, ध्यान दीजिए — यहाँ कैकेयी का हृदय अभी भी शुद्ध और प्रेम से भरा है। वे राम को अपने पुत्र भरत से किसी भी प्रकार कम नहीं मानतीं। यह वही कैकेयी हैं जिन्होंने युद्ध में स्वयं अपना हाथ कटवाकर राजा की जान बचाई थी — पर मंथरा अब अपनी असली चाल चलती है। गूढ़ छल से भरे मीठे वचनों को सुनकर अल्पबुद्धि रानी कैकेयी, मानो देवमाया के वश होकर, इस शत्रु को हितैषी मानकर उस पर विश्वास कर बैठीं। मंथरा ने अनेक ढंग से विश्वास जमाकर कहना आरंभ किया — "आपने कहा कि सीता-राम आपको प्रिय हैं और राम को भी आप प्रिय हैं — यह बात पहले सच थी, पर वे दिन अब बीत चुके। समय बदलते ही शत्रु भी प्रिय जैसा दिखने लगता है। जो सूर्य कमल-कुल का पोषण करता है, वही जल के अभाव में उसे जलाकर राख कर देता है। आपकी सौत आपको जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती है — अभी समय रहते किसी उपाय से इसे रोक लीजिए। कौशल्या बड़ी चतुर और गंभीर हैं। राजा ने भरत को ननिहाल भेज दिया — यह भी कौशल्या माता की ही चाल थी, समझ लीजिए। कुल-परंपरा के अनुसार राम का तिलक होना उचित ही है, यह मुझे भी अच्छा लगता है, पर आगे जो होने वाला है उसे सोचकर मुझे डर लगता है — विधाता वह फल कौशल्या को ही लौटा दें।" यह कटु वचन सुनकर कैकेयी सहम गईं, भय से सूख-सी गईं, केले के पौधे-सी काँपने लगीं। मंथरा ने और आगे बढ़ते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा — "पंद्रह दिन तो यह सारी तैयारी होते बीत गए, और आपको आज मुझसे पता चला है। यदि कल राम का तिलक हो गया, तो समझ लीजिए विधाता ने आपके लिए विपत्ति का बीज बो दिया है। हे रानी, अब तो आप दूध में गिरी मक्खी के समान असहाय हो गई हैं। मैं तो विनयपूर्वक ही कह रही हूँ — कौशल्या आपको दुख देंगी, भरत को बंदीगृह में रहना पड़ेगा, और लक्ष्मण राम के प्रधान सेवक बन जाएँगे।" यह सुनकर कैकेयी का शरीर पसीने से भीग गया। धीरे-धीरे, अपने कर्मों के पलटे से, वह कुटिल दासी अब उन्हें प्रिय लगने लगी — मानो कोई बगुला हंस मानकर सराहा जा रहा हो। कैकेयी बोलीं — "सुनो मंथरा, तेरी बात सच है। मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़कती रहती है। मैं प्रतिदिन रात को बुरे स्वप्न देखती हूँ, पर मोहवश तुझे यह बात नहीं बताई।" तब मंथरा ने बड़ा भारी कुघात रचा। उसने कहा — "राजा के पास आपकी दो वर वाली अमानत रखी है — आज वही माँगकर अपने हृदय को शांत कीजिए। पुत्र को राज्य और राम को वनवास — यह दोनों माँग लीजिए और सौत का सारा उल्लास मिटा दीजिए। जब राजा राम की सौगंध खाकर वचन दें, तभी माँगिएगा, जिससे उनका वचन टल न सके। यदि आज की रात बीत गई तो सारा काम बिगड़ जाएगा।" फिर उसने कहा — "जाओ, कोपभवन में जा बैठो। सजग रहकर सारा काम संवारना।" रानी ने मंथरा को अपने प्राणों से भी प्रिय मान लिया — "संसार में तेरे समान मेरा हितैषी कोई नहीं, बहती धारा में तू ही मेरा सहारा बनी है" — यह कहकर वे कोपभवन की ओर चल पड़ीं। तुलसीदास जी इस दृश्य का ऐसा वर्णन करते हैं जो सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं — "कैकेयी की कुबुद्धि मानो विपत्ति का बीज बन गई, और मंथरा वर्षा ऋतु बनकर उसे सींचने वाली बनी। छल-रूपी जल पाकर वह अंकुरित हो उठा — दोनों वर उसके दो पत्ते बने, और दुख उसका परिणामी फल हुआ।" सीख: भक्तो, यह प्रसंग कान की शक्ति और संगति की भयावहता का सबसे सजीव उदाहरण है। कैकेयी का हृदय स्वभाव से बुरा नहीं था — वे राम को अपने पुत्र से भी अधिक प्रिय मानती थीं। पर लगातार, बार-बार, कुशलता से बोले गए विषभरे शब्दों ने उनके निर्मल मन को धीरे-धीरे विषाक्त कर दिया। जीवन में हमें भी सावधान रहना चाहिए — जो व्यक्ति बार-बार हमारे मन में दूसरों के प्रति संदेह, ईर्ष्या और असुरक्षा के बीज बोता रहे, चाहे वह कितना भी अपना क्यों न लगे, उससे दूरी बनाना ही बुद्धिमानी है। एक बार जब कान विष सुनने के आदी हो जाएँ, तो सच्चाई भी झूठी लगने लगती है।

4. कैकेयी के दो वर

देवासुर संग्राम का पूर्वऋण भक्तो, अब समझते हैं कि आखिर वे "दो वर" थे क्या, जिनकी बात मंथरा बार-बार कर रही थी। वर्षों पहले, देवासुर संग्राम में, राजा दशरथ देवताओं की सहायता के लिए युद्धभूमि में गए थे। घमासान युद्ध में उनके रथ का धुरा टूट गया, धुरी का कील निकल गया, और रथ डगमगाने लगा। यदि उस क्षण रथ पलट जाता तो राजा के प्राण संकट में पड़ जाते। कैकेयी, जो स्वयं भी युद्धकला में निपुण थीं और पति के साथ रथ पर सारथी का कार्य कर रही थीं, उन्होंने बिना एक पल गँवाए अपनी ही अंगुली धुरी के छेद में डाल दी और रथ को स्थिर रखा, जब तक युद्ध का वह संकटपूर्ण क्षण न टल गया। इस साहस और तत्परता से प्रसन्न होकर राजा दशरथ ने कैकेयी को दो वरदान देने का वचन दिया था। कैकेयी ने उस समय कुछ नहीं माँगा — उन्होंने कहा था, "जब आवश्यकता होगी, तभी माँगूँगी।" वे दोनों वर वर्षों तक अमानत की तरह पड़े रहे, और स्वयं राजा भी उन्हें प्रायः भूल चुके थे। सोचिए भक्तो — कितना पवित्र था वह वचन जब दिया गया था! पत्नी ने अपने पति के प्राण बचाए, पति ने कृतज्ञता में वचन दिया। यह प्रेम और विश्वास का प्रतीक था। पर आज, मंथरा के कुमंत्र से, वही पवित्र वचन विष का प्याला बनने जा रहा था। कोपभवन की रात संध्या के समय आनंदित मन से राजा दशरथ कैकेयी के महल गए — तुलसीदास जी लिखते हैं, उनका यह जाना मानो निष्ठुरता ही स्नेह का रूप धारण करके निकट आ गई हो। कोपभवन की बात सुनते ही राजा सकुचा गए, भयवश उनके पैर आगे बढ़ ही न पाए। जिनके बाहुबल से इंद्र भी सुरक्षित रहते हैं, वही राजा अपनी पत्नी का क्रोध सुनकर भय से सूख गए — कामदेव के प्रताप की यही महिमा है! भयभीत राजा अपनी प्रिया के पास गए। कैकेयी भूमि पर पुराने मोटे वस्त्र बिछाकर लेटी थीं, अपने सारे आभूषण उतार फेंके थे। राजा निकट जाकर मृदु वाणी में बोले — "हे प्राणप्रिया, तुम किस कारण रुष्ट हो? हे प्रिये, तुम्हारा अहित किसने किया है? बताओ किस दरिद्र को मैं राजा बना दूँ, बताओ किस राजा को देश-निकाला दे दूँ। तुम्हारे शत्रु को मैं देवता होते हुए भी मार सकता हूँ। हे प्रिये, मेरे प्राण, पुत्र, सर्वस्व, परिजन और समस्त प्रजा — सब तुम्हारे वश में हैं। यदि मैं तुमसे कुछ भी छल करके कहूँ, तो हे भामिनी, मुझे राम की सौगंध है। हँसकर जो भी मन भाए वह माँग लो।" यह सुनकर, राजा की बड़ी सौगंध को मन में तौलकर, कैकेयी मुसकराती हुई उठ बैठीं — पर तुलसीदास जी लिखते हैं, वे राजा को ऐसे ताक रही थीं मानो कोई किरातिन अपने जाल में फँसे हिरण को देख रही हो। राजा ने उसे फिर हितैषी मानकर प्रेम से कहा — "कल राम को युवराज पद दूँगा, हे सुलोचनि, तुम मंगल का श्रृंगार करो।" यह सुनते ही कैकेयी का हृदय ऐसे धड़क उठा मानो किसी पके हुए फोड़े को छू दिया गया हो, पर उसने वह पीड़ा भी हँसकर छिपा ली। फिर राजा ने पूछा — तुम्हें क्या चाहिए? कैकेयी ने कहा — "आप तो कहते हैं माँगो-माँगो, पर न कभी देते हैं न लेते हैं। आपने दो वरदान देने को कहा था, अब उन्हीं पर भी संदेह होने लगा है।" राजा हँसते हुए बोले — "मुझे झूठा दोष मत दो — दो के बदले चार भी माँग लो। रघुकुल की यह परंपरा सदा से चली आई है — प्राण भले चले जाएँ, पर दिया हुआ वचन कभी नहीं टूटता। असत्य के समान कोई पाप नहीं। उस पर मैंने राम की सौगंध भी खा ली है।" और तब, इस वचन को पूरी तरह दृढ़ करा लेने के बाद, कैकेयी हँसकर बोलीं, मानो अपने कुत्सित विचार-रूपी पक्षी का पिंजरा खोल रही हो — "सुनिए प्राणप्रिय, मेरे मन को जो भाता है वह कहती हूँ — पहला वर यह दीजिए कि भरत का राजतिलक हो। और दूसरा वर — राम तापस वेष धारण करके चौदह वर्ष तक वनवासी बनकर रहें।" भक्तो, कल्पना कीजिए उस क्षण को। तुलसीदास जी लिखते हैं — यह सुनते ही राजा के हृदय में ऐसा शोक उमड़ा जैसे चंद्रमा की किरण छूते ही चकवा पक्षी व्याकुल हो उठता है। राजा सहम गए, मुँह से कुछ कहते न बना, मानो वन में किसी बटेर पर बाज़ झपट पड़ा हो। राजा का मुख पूरी तरह विवर्ण हो गया, मानो बिजली ने किसी ताड़ के वृक्ष पर वज्राघात कर दिया हो। राजा ने माथे पर हाथ रखकर दोनों आँखें मूँद लीं और ऐसे बैठ गए मानो चिंता ही देह धारण करके बैठी हो। राजा ने विनती की — "क्या भरत तुम्हारे अपने पुत्र नहीं हैं? या तुमने मुझे बाज़ार से मोल खरीदा है? यदि मेरी यह सौगंध तुम्हें ऐसे बाण-सी चुभी है, तो सोच-समझकर उत्तर क्यों नहीं देतीं?" पर कैकेयी अडिग रहीं — "आप शिबि, दधीचि मुनि और राजा बलि जैसे सत्यप्रतिज्ञ पुरुषों की परंपरा में हैं, अपना वचन तोड़ें तो संसार में अपयश लोगे।" राजा भूमि पर गिर पड़े, माथा पीटते हुए व्याकुल वाणी में पुकारने लगे — "राम, राम, रघुनाथ!" उनका कंठ सूख गया, मुख से वाणी न निकली। वे बार-बार कैकेयी के पैर पकड़कर विनती करते रहे — "सूर्यवंश के लिए कुल्हाड़ी मत बनो। अभी माँग लो, मैं तुम्हें वही दे दूँगा — मुझे राम के वियोग से मत मारो। किसी भी तरह राम को यहीं रख लो, नहीं तो मेरी छाती जीवन भर जलती रहेगी।" पर कैकेयी टस से मस न हुईं। उन्होंने कठोर वाणी में कहा — "हे राजन, क्या ये दोनों बातें एक साथ हो सकती हैं — खुलकर हँसना और साथ ही गाल फुलाना? दानी कहलाना और साथ ही कंजूसी करना? या तो वचन तोड़ दो या धैर्य धारण करो — अबला स्त्री की भाँति विलाप मत करो। सत्यप्रतिज्ञ पुरुष के लिए तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी सब तिनके के समान बताए गए हैं।" पूरी रात राजा दशरथ इसी तरह विलाप करते रहे, "राम-राम" रटते रहे, मानो पंख कटा कोई असहाय पक्षी हों। हृदय में वे यही मनाते रहे कि सुबह न हो, और कोई भी जाकर राम को यह बात न बताए। "हे सूर्यदेव, आज उदय मत होना।" पर सुबह हुई ही, द्वार पर मंगल वाद्य बजने लगे — और वे स्वर राजा को बाणों की तरह चुभने लगे। सीख: यह प्रसंग हमें कई गहरी सीख देता है। पहली — दिया गया वचन, चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, निभाना ही सच्चे मनुष्य की पहचान है; राजा दशरथ ने प्राण देकर भी वचन निभाया। दूसरी — बिना सोचे-समझे किसी को अंधाधुंध वचन देना बड़े संकट को जन्म दे सकता है; इसलिए वचन देने से पहले सदा विचार करें। तीसरी — क्रोध और कुसंगति में लिया गया निर्णय अक्सर अपूरणीय क्षति पहुँचाता है, जैसा कैकेयी के साथ हुआ। और सबसे गहरी सीख — प्रेम और विश्वास पर टिका कोई भी रिश्ता जब एक ही रात में, एक ही निर्णय से चकनाचूर हो सकता है, तो हमें अपने रिश्तों की नींव को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।

5. वनगमन की तैयारी

सुबह होते ही मंत्री सुमंत्र राजा को जगाने गए। जो दृश्य उन्होंने देखा, वह भयावह था — राजा चिंता से व्याकुल, विवर्ण मुख लिए भूमि पर पड़े थे, मानो कमल अपनी जड़ से उखड़ गया हो। पास ही क्रोध से भरी कैकेयी खड़ी थीं। कैकेयी ने ही सुमंत्र को आदेश दिया — "जाओ, शीघ्र राम को बुलाकर लाओ।" राम आए। उन्होंने राजा की अत्यंत दयनीय दशा देखी — वे ऐसे सहम गए मानो कोई वृद्ध गजराज सिंहिनी को देखकर चौंक उठा हो। राम का स्वभाव करुणामय और कोमल है; ऐसा दुख उन्होंने पहले कभी न देखा था। फिर भी धैर्य धारण करके उन्होंने माता से मधुर वचनों में पूछा — "हे माता, मुझे पिताजी के दुख का कारण बताइए।" कैकेयी ने बिना किसी संकोच के, कठोर वाणी में सारा प्रसंग सुना दिया — मानो निष्ठुरता ही देह धारण करके बैठी हो। और यहीं भक्तो, हमें राम के चरित्र का वह रूप देखने को मिलता है जो पूरे रामचरितमानस का सार है। मन-ही-मन मुसकराकर, सभी दोषों से रहित मृदु और मनोहर वचनों में राम बोले — "सुनिए माता, वही पुत्र सौभाग्यशाली है जो माता-पिता के वचन का अनुरागी हो। मुनियों का सत्संग और विशेषकर वन-निवास — दोनों ही हर प्रकार से मेरे हित में हैं। उस पर पिता की आज्ञा और आपका साथ भी मिल रहा है। मेरे प्राणप्रिय भरत को राज्य मिल रहा है — आज तो विधाता हर प्रकार से मेरे अनुकूल हैं। यदि इतने अच्छे कारण के लिए भी मैं वन न जाऊँ, तो मुझे सबसे पहले मूर्खों में गिना जाना चाहिए। हे माता, मुझे केवल एक ही दुख है — राजा को इतना व्याकुल देखकर।" सोचिए भक्तो — कोई क्रोध नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई "मेरे साथ यह अन्याय क्यों?" जैसा प्रश्न नहीं। न पिता से कोई गिला, न कैकेयी से कोई शिकायत। पूर्ण समर्पण, पूर्ण स्वीकृति। जब सुमंत्र ने राजा के पास जाकर राम के इन शब्दों की सूचना दी, तो मूर्च्छा में पड़े राजा की चेतना लौटी और वे राम को हृदय से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगे — मानो किसी सर्प को उसकी खोई हुई मणि फिर मिल गई हो। पर मुँह से कुछ कह न सके। राम ने पिता को समझाते हुए कहा — "हे तात, इतनी छोटी-सी बात के लिए आपने इतना दुख उठाया, मुझे पहले किसी ने बताया ही नहीं। आपकी आज्ञा का पालन करके जन्म का फल पाकर मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा।" राम जब माता कौशल्या से विदा लेने गए, तो कौशल्या का हृदय द्वंद्व में फँस गया — धर्म और स्नेह दोनों ने उनकी बुद्धि को घेर लिया। अंततः, स्त्री-धर्म का विचार करके, राम और भरत दोनों को समान पुत्र मानकर, उन्होंने बड़े धैर्य से कहा — "हे तात, पिता की आज्ञा तो सभी धर्मों का शिखर है। तुम सबके परम प्रिय हो — प्राणों के भी प्राण, जीवन के भी जीवन। सुख से वन जाओ, मैं तुम पर वारी जाती हूँ।" ठीक उसी समय यह समाचार सुनकर सीता व्याकुल होकर उठ खड़ी हुईं। सास के चरणों की वंदना करके वे बैठ गईं, पर उनका हृदय एक ही प्रश्न में उलझा था — "मेरे जीवन के स्वामी वन जाना चाहते हैं — किस भाग्यशाली को उनका साथ मिलेगा?" राम ने सीता को समझाने का प्रयास किया — वन के अनगिनत कष्ट गिनाए — "वहाँ घोर धूप, हिम, वर्षा और आँधी है, मार्ग में कुश-काँटे बिछे हैं, राक्षस मनुष्यों का भक्षण करते हैं। हंसगामिनी, तुम वन के योग्य नहीं हो।" पर सीता का उत्तर वह उत्तर है जो युगों-युगों तक हर भारतीय नारी के हृदय में गूँजता रहेगा। उन्होंने कहा — "हे प्राणनाथ, हे करुणा के आगार — आपके बिना तो स्वर्ग भी मेरे लिए नरक के समान है। जैसे शरीर बिना प्राण के और नदी बिना जल के, वैसे ही, हे नाथ, स्त्री पुरुष के बिना निष्प्राण है। हे नाथ, आपके साथ पक्षी और मृग ही मेरे परिजन होंगे, वन ही नगर और वल्कल ही निर्मल रेशमी वस्त्र। आपके साथ रहने पर पर्णकुटी भी स्वर्ग-भवन के समान सुख का मूल बन जाएगी। आपने वन के अनेक दुख गिनाए, पर हे कृपानिधान, ये सब मिलकर भी प्रभु-वियोग के लेशमात्र दुख के बराबर नहीं हो सकते। यदि मुझे अवधि-भर अयोध्या में ही छोड़ दिया गया, तो जान लीजिए कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे।" राम ने देखा कि यदि हठपूर्वक रोका गया तो सीता प्राण नहीं बचा पाएँगी, और उन्होंने कहा — "चिंता छोड़ो, वन में मेरे साथ चलो।" ठीक इसी समय लक्ष्मण को समाचार मिला। वे व्याकुल होकर दौड़े, शरीर काँप रहा था, आँखें आँसुओं से भर गईं। उन्होंने राम के चरण पकड़ लिए। राम ने उन्हें समझाया — "हे तात, तुम यहीं रहो और सबको संतोष दो — भरत और शत्रुघ्न घर पर नहीं हैं, पिताजी वृद्ध हैं।" यह सुनते ही लक्ष्मण बुरी तरह व्याकुल हो उठे, मानो पाले के स्पर्श से कमल मुरझा जाए। उन्होंने कहा — "हे स्वामी, आपने मुझे सीख तो बहुत अच्छी दी, पर मेरी कायरता के कारण वह मेरी पहुँच से बाहर लगती है। मैं तो प्रभु के स्नेह में पला हुआ बालक हूँ। हे नाथ, सच कहता हूँ — आपके सिवा मैं गुरु, पिता, माता किसी को नहीं जानता। धर्म और नीति का उपदेश तो उसे देना चाहिए जिसे कीर्ति, वैभव या सद्गति प्रिय हो। पर जो मन-वचन-कर्म से केवल चरणों में अनुरक्त हो, हे कृपासिंधु, क्या उसे भी त्यागा जा सकता है?" राम पिघल गए और उन्हें भी साथ ले जाने की स्वीकृति दी। लक्ष्मण की माता सुमित्रा ने भी, गहरे शोक के बावजूद, धैर्य धारण करके पुत्र को समझाया — "जहाँ राम का निवास हो, वहीं अयोध्या है। सीता तुम्हारी माता हैं और राम तुम्हारे पिता — उनकी सेवा करना ही तुम्हारा सच्चा धर्म है।" सीख: भक्तो, इस पूरे प्रसंग में तीन महान चरित्र हमारे सामने उभरते हैं। राम की समता — जिसमें न शिकायत है, न विद्रोह, केवल सहज स्वीकृति। सीता का प्रेम — जो भौतिक सुख-सुविधा से कहीं ऊँचा है, जो साथ को ही सबसे बड़ा वैभव मानता है। और लक्ष्मण की भक्ति — जो तर्क और नीति से परे, केवल समर्पण जानती है। जीवन में जब भी कठिन समय आए, इन तीनों में से कोई एक भाव अपनाइए — या तो परिस्थिति को सहज स्वीकार करें, या प्रियजन का साथ न छोड़ें, या फिर पूर्ण समर्पण के साथ सेवा में लग जाएँ। यही तीनों मार्ग हमें विपत्ति में भी शांति दिला सकते हैं।

6. अयोध्या से प्रस्थान

राम मुनि का वेश धारण कर माता-पिता को सिर नवाकर चल पड़े। जाने से पहले उन्होंने गुरु वशिष्ठ से कहकर ब्राह्मणों को वर्षभर का भोजन दिलवाया, याचकों को दान से तृप्त किया, दास-दासियों को गुरु के हवाले करते हुए कहा — "हे गुरुदेव, इन सबकी देखभाल माता-पिता की तरह करते रहिएगा।" फिर उन्होंने नगरवासियों से कहा — "आप सब वही उपाय करना जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरह से दुखी न हों।" राम के चलते ही नगर में भारी विषाद छा गया — नगर का करुण क्रंदन सुना नहीं जाता था। अयोध्या के स्त्री-पुरुष घर छोड़कर राम के पीछे चल पड़े — बूढ़ों-बच्चों को छोड़कर बाकी सब। राम ने उन्हें बहुत समझाया, धर्मोपदेश दिए, पर प्रेमवश लोग लौटाए नहीं लौटते थे। अंततः जब दो पहर रात बीत गई, राम ने सुमंत्र से कहा — "हे तात, रथ के पहियों के निशान छिपाकर हाँको, अब कोई और उपाय काम नहीं आएगा।" इस प्रकार, रात के अंधकार में, अपने ही प्रिय नगरवासियों को धोखा देकर, राम, सीता और लक्ष्मण आगे बढ़ गए। सवेरा होते ही सब जाग उठे और बड़ा शोर मच गया कि राम चले गए। लोग "राम राम" पुकारते हुए चारों दिशाओं में दौड़ते फिरे। तुलसीदास जी लिखते हैं — मानो समुद्र में जहाज डूब गया हो और व्यापारियों का समूह व्याकुल हो उठा हो। सब अपनी निंदा करते और मछलियों की सराहना करते हैं — "राम के बिना जीने को धिक्कार है!" अयोध्या से चलकर सुमंत्र के साथ राम, सीता और लक्ष्मण गंगा तट पर श्रृंगवेरपुर पहुँचे। यहीं से आरंभ होती है वह करुण गाथा जिसमें सुमंत्र अकेले लौटते हैं। राजा दशरथ ने सुमंत्र को यह आदेश दिया था कि वे राम को समझाकर, विशेषकर सीता को, वापस लौटा लाएँ — "जब सीता वन देखकर डर जाएँ, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उन्हें सुनाना।" पर सीता ने अत्यंत मृदु किंतु दृढ़ वाणी में उत्तर दिया — "हे प्रभु, आप करुणामय और परम विवेकी हैं — शरीर को छोड़कर छाया कहीं अलग रह सकती है भला?" सुमंत्र इतने व्याकुल हो उठे कि उन्हें कुछ सूझता न था, आँखों से कुछ दिखता न था। अंततः राम ने बलपूर्वक सुमंत्र को लौटा दिया। जब सुमंत्र अयोध्या पहुँचे और राजा से कहना पड़ा कि राम, लक्ष्मण, सीता वन को चले गए, तो राजा की जो दशा हुई वह वर्णन से परे है। सुमंत्र मार्ग भर पछताते रहे — "इस अधम शरीर ने राम से बिछुड़ते ही प्राण क्यों नहीं त्याग दिए?" घोड़े तक इतने व्याकुल थे कि न घास चरते, न पानी पीते, बस दक्षिण दिशा की ओर देख-देखकर हिनहिनाते रहे। सीख: यह प्रसंग हमें दिखाता है कि प्रेम कभी-कभी हमें वह करने को विवश कर देता है जो हमारे स्वभाव के बिल्कुल विपरीत है — राम जैसे सत्यनिष्ठ पुरुष को भी रात के अंधेरे में, अपने ही प्रजाजनों से छिपकर जाना पड़ा, केवल इसलिए कि वे उनके दुख को और नहीं बढ़ाना चाहते थे। कभी-कभी किसी को छोड़ना, या किसी से दूर जाना, प्रेम की कमी नहीं बल्कि प्रेम की पराकाष्ठा होती है — जब हम दूसरे के दुख को कम करने के लिए अपने मन को कठोर बना लेते हैं। और सुमंत्र तथा घोड़ों की व्याकुलता हमें सिखाती है कि सच्चा स्नेह मनुष्यों तक ही सीमित नहीं रहता, पशु भी उसे पहचानते हैं।

7. गुह मिलन (निषादराज)

श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह ने जब सुना कि राम आ रहे हैं, तो वे आनंदित होकर अपने भाई-बंधुओं सहित फल-मूल की भेंट लेकर दौड़ पड़े। दंडवत करके भेंट सामने रखकर वे अत्यंत प्रेम से प्रभु को निहारने लगे। उन्होंने कहा — "हे नाथ, आपके चरण-कमलों के दर्शन से ही कुशल है, आज मैं भाग्यवानों की गिनती में आ गया। यह धरती, धन और घर सब आपका है, मैं तो परिवार सहित आपका ही सेवक हूँ। कृपा करके नगर में पधारिए।" पर राम ने कहा — "हे सुजान सखा, पिता ने मुझे और ही आज्ञा दी है — चौदह वर्ष वन में मुनियों का व्रत, वेश और आहार धारण करते हुए बिताने हैं, गाँव में रहना उचित नहीं।" गुह ने अशोक वृक्ष के नीचे कुश और कोमल पत्तों की सेज बिछा दी, फल-मूल भेंट किए। रात्रि में जब राम, सीता, लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे, तब लक्ष्मण धनुष-बाण सजाए वीरासन में बैठकर पहरा देने लगे। गुह भी तरकस बाँधकर लक्ष्मण के पास जा बैठा। प्रभु को धरती पर सोता देखकर गुह के हृदय में गहरा विषाद उमड़ आया — वह विलाप करने लगा कि जिन सीता-राम के लिए इंद्रलोक-जैसा राजमहल था, वे आज घास-फूस की सेज पर सो रहे हैं। इसी रात लक्ष्मण ने गुह को समझाया — ज्ञान-वैराग्य-भक्ति के गहन सिद्धांत सुनाए — "हे भाई, कोई किसी को सुख-दुख देने वाला नहीं है, सब अपने ही किए कर्मों का फल भोगते हैं। इस संसार रूपी रात्रि में योगी ही जागते हैं। विवेक जागते ही मोह का यह भ्रम मिट जाता है, और तब राम के चरणों में सच्चा प्रेम उपजता है।" अब भक्तो, आता है वह प्रसंग जो शायद पूरे रामचरितमानस के सबसे प्रिय और सबसे मार्मिक प्रसंगों में से एक है। अगले दिन जब राम को नदी पार करनी थी, उन्होंने केवट से नाव माँगी। पर केवट नाव नहीं लाया! उसने कहा — "मैंने तुम्हारा भेद जान लिया है। तुम्हारे चरण-कमलों की धूल के बारे में सब कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है — जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री (अहिल्या) बन गई! काठ तो पत्थर से कठोर होता नहीं, मेरी नाव भी कहीं मुनि की पत्नी बन जाएगी और मेरी रोज़ी-रोटी की यही राह उजड़ जाएगी। मैं तो इसी नाव से अपना पूरा परिवार पालता हूँ, दूसरा कोई काम नहीं जानता। हे प्रभु, यदि आप अवश्य ही पार जाना चाहते हैं, तो पहले मुझे अपने चरण-कमल धोने दीजिए।" देखिए भक्तो, कितनी सरल, कितनी भोली-भाली, फिर भी कितनी गहरी बुद्धि थी उस निषाद की! उसने कहा — "हे नाथ, मैं चरण धोकर ही आपको नाव पर चढ़ाऊँगा, आपसे कोई उतराई नहीं चाहता। लक्ष्मण भले मुझे तीर मार दें, पर जब तक चरण धो न लूँ तब तक नहीं!" केवट के प्रेम में लिपटे इन भोले-भाले वचनों को सुनकर करुणाधाम राम मुस्कुरा उठे और बोले — "भाई, तू वही कर जिससे तेरी नाव सुरक्षित रहे। जल्दी पानी ला और मेरे पैर धो दे।" जिनका नाम एक बार स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर से पार हो जाते हैं, वही कृपालु राम आज केवट से विनती कर रहे थे! केवट ने अपार आनंद से भगवान के चरण-कमल धोए, फिर वह जल पिया, अपने पूरे परिवार सहित अपने पितरों को तार दिया, और तब आनंदपूर्वक प्रभु को गंगा के पार ले गया। पार उतरने पर, प्रभु के पास केवट को कुछ देने के लिए न कुछ धन था, न कुछ वस्तु — इससे प्रभु को झिझक हुई। पति के हृदय की बात जाननेवाली सीता ने प्रसन्न मन से अपनी रत्नजड़ित अँगूठी उतार दी। पर केवट व्याकुल होकर उनके चरण पकड़ बैठा — "हे नाथ, आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई। अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए, यह आपकी कृपा ही बहुत है।" बहुत आग्रह करने पर भी केवट ने कुछ नहीं लिया, और अंत में करुणा के धाम राम ने उसे निर्मल भक्ति का वरदान देकर विदा किया। गुह ने भी राम से विनती की — "मुझे आपके साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, कुछ दिन चरण-सेवा कर लेने दीजिए।" राम ने उसका सहज प्रेम देखकर उसे साथ ले लिया। सीख: केवट का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति और सच्चा प्रेम किसी बड़े ज्ञान या ऊँचे पद का मोहताज नहीं होता — एक साधारण नाविक भी, अपनी भोली बुद्धि और निश्छल प्रेम से, भगवान से सेवा माँग सकता है और उसे पा सकता है। और यह भी कि सच्चा भक्त बदले में कुछ नहीं चाहता — केवट ने अँगूठी तक ठुकरा दी। जीवन में जब भी हम किसी की सेवा करें, चाहे वह कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, प्रेम और निश्छलता से करें, बदले की आशा के बिना — यही सच्ची सेवा है, और यही सबसे बड़ा वरदान लाती है।

8. भरद्वाज आश्रम (प्रयाग)

गंगा पार करके राम, सीता, लक्ष्मण और गुह प्रयागराज पहुँचे। तीर्थराज प्रयाग की महिमा का राम ने स्वयं विस्तार से वर्णन किया — गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम, अक्षयवट, यह सब मिलकर मानो धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का साक्षात भंडार है। त्रिवेणी का दर्शन करके, स्नान करके, वे भरद्वाज मुनि के आश्रम पहुँचे। मुनि ने दंडवत करते-करते ही राम को हृदय से लगा लिया — मुनि के मन का आनंद वर्णन से परे था, मानो उन्हें ब्रह्मानंद की राशि मिल गई हो। उन्होंने कहा — "हे राम, आज आपका दर्शन पाकर मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया। लाभ और सुख की सीमा आपके दर्शन के अलावा और कुछ नहीं। अब कृपा करके यह वरदान दे दीजिए कि आपके चरण-कमलों में मेरा सहज प्रेम बना रहे।" राम ने प्रेम से पूछा — "हे नाथ, बताइए हमें किस राह जाना है।" मुनि ने हँसकर कहा — "आपके लिए तो सभी रास्ते सुगम हैं।" फिर उन्होंने चार ब्रह्मचारी और मार्ग जानने वाले शिष्य साथ भेजे और चित्रकूट का मार्ग सुझाया। भरद्वाज मुनि ने आगे बताया कि चित्रकूट में अत्रि ऋषि जैसे महान मुनि निवास करते हैं, वहाँ मंदाकिनी नामक पवित्र नदी बहती है, जिसे अत्रि-पत्नी अनसूया अपने तपोबल से लाई थीं। मार्ग में यमुना पार करते हुए, गाँव-गाँव में लोग राम-लक्ष्मण-सीता का सौंदर्य देखने उमड़ पड़ते थे। एक अत्यंत सुंदर प्रसंग है — कहीं एक तेजस्वी युवा तपस्वी मिला जो मन-वचन-कर्म से राम का अनन्य भक्त था। उसने अपने इष्टदेव को पहचानते ही धरती पर दंड की तरह गिरकर प्रणाम किया। राम ने प्रेम से पुलकित होकर उसे हृदय से लगा लिया — मानो किसी दरिद्र को पारस मिल गया हो। सीख: भरद्वाज मुनि जैसे विद्वान और तपस्वी भी, जिन्होंने जीवन भर तप-तीर्थ-त्याग किया, यह मानते हैं कि उनकी सारी साधना का असली फल भगवद्दर्शन ही है। यह हमें सिखाता है कि चाहे हम कितने भी ज्ञानी या सिद्ध क्यों न हों, भक्ति और प्रेम के बिना कोई भी साधना अधूरी है। और यह भी — सच्चे संत सदा दूसरों का मार्गदर्शन करने और उनकी सहायता करने में आनंद पाते हैं, बिना किसी स्वार्थ के।

9. चित्रकूट आगमन

आगे बढ़ते हुए राम वाल्मीकि के आश्रम पहुँचे। मुनि ने राम से पूछा कि वे कहाँ निवास करना चाहते हैं। राम ने विनम्रता से कहा — "हे मुनिराज, आप त्रिकालदर्शी हैं, वह स्थान बताइए जहाँ मैं सीता-लक्ष्मण सहित जा बसूँ।" वाल्मीकि जी ने अत्यंत सुंदर उत्तर दिया, जो सुनने में एक आध्यात्मिक उपदेश जैसा है — उन्होंने कहा कि राम तो वास्तव में उन भक्तों के हृदय में निवास करते हैं जिनमें काम-क्रोध-मद-मोह नहीं, जो सबके प्रिय और हितकारी हों, जिन्हें दुख-सुख समान हों। "जो अपने गुण आपके और दोष अपने समझता है, हे रघुनाथ, उसी के हृदय में आप निवास कीजिए।" फिर मुनि ने भौतिक स्थान के रूप में चित्रकूट पर्वत सुझाया — "वहाँ हाथी, सिंह, हिरन और पक्षी विचरते हैं, वहाँ मंदाकिनी नदी है जो सारे पापों को नष्ट करने वाली है।" लक्ष्मण ने पयस्विनी नदी के किनारे एक सुंदर स्थान देखा, और देवताओं ने अपने शिल्पी विश्वकर्मा को भेजकर कोल-भील का वेश धरकर वहाँ सुंदर पर्णकुटी बना दी। चित्रकूट में बसने के बाद वहाँ का वन ही मंगलमय हो उठा। वृक्ष फूलने-फलने लगे, भौंरे मीठा गुंजन करने लगे, हाथी-सिंह-हिरन-सूअर सब वैर भूलकर साथ-साथ विचरने लगे। तुलसीदास जी कहते हैं — "संसार में जितने भी देवताओं के वन हैं, सब राम के इस वन को देखकर ईर्ष्या करते हैं।" कोल-भील वनवासियों ने आकर राम से विनती की — "हे नाथ, हम हर तरह से हाथी-सिंह-सर्प-बाघों से बचाकर आपकी सेवा करेंगे।" राम ने उनसे प्रेमपूर्वक भेंट की, उनका प्रेम स्वीकार किया। सीता को यहाँ वनवास कैसा लगा, भक्तो? तुलसीदास जी लिखते हैं — "सीता का मन राम के चरणों में इतना रमा है कि उन्हें यह वन हजारों अयोध्या जैसा प्रिय लगता है। प्रियतम के साथ पर्णकुटी भी प्यारी लगती है, हिरन-पक्षी अपने परिवार जैसे लगते हैं, मुनि-पत्नियाँ सास जैसी, कंद-मूल-फल अमृत जैसे मीठे लगते हैं। स्वामी के साथ सोई हुई कुश-पत्तों की सेज भी सैकड़ों कामदेव-सेजों से बढ़कर सुखद है।" जब-जब राम को अयोध्या की, माता-पिता की, भरत की याद आती, उनके नेत्रों में जल भर आता — तब सीता और लक्ष्मण भी व्याकुल हो जाते, और तब राम कोई पवित्र कथा सुनाकर सबका मन बहला देते। सीख: चित्रकूट का यह वर्णन हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि प्रियजनों के साथ और स्वयं के भीतर की शांति में है। सीता के लिए राजमहल की जगह कुटिया, आराम की जगह वनवास कोई विषय नहीं था — क्योंकि प्रियतम का साथ था। यह हमें आज के भौतिकवादी युग में एक गहरा संदेश देता है — जीवन का सुख वस्तुओं में नहीं, संबंधों की गहराई में है। और यह भी कि सच्चा प्रेम हर परिस्थिति को सुंदर बना देता है।

10. दशरथ का प्राणत्याग

उधर अयोध्या में राजा दशरथ पुत्र-वियोग में तड़प रहे थे। रात को वे बार-बार पूछते — "सुमंत्र, कहो, कृपालु राम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है?" यही पूछते-पूछते उन्हें अचानक उस अंधे तपस्वी के शाप की याद आई जो बालकाण्ड में हमने सुना था — जब युवावस्था में राजा दशरथ के अनुमान से चलाए गए बाण ने पितृभक्त श्रवण कुमार को मार डाला था, और उसके अंधे माता-पिता ने पुत्र-वियोग में प्राण त्यागते हुए राजा को शाप दिया था — "जिस प्रकार आज हम पुत्र-वियोग में प्राण त्याग रहे हैं, वैसे ही एक दिन तुम भी पुत्र-वियोग में ही प्राण त्यागोगे।" भक्तो, अब वह शाप अपना फल दे रहा था। राजा ने वह सारी कथा कौसल्या को सुनाई, और व्याकुल होकर बोले — "राम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है! हा रघुनंदन, मेरे प्राणप्रिय! हा जानकी, हा लक्ष्मण, हा रघुवर!" और फिर, "राम-राम कहते, फिर राम कहते, फिर राम-राम कहते और फिर राम कहते हुए राजा राम के विरह में शरीर त्यागकर स्वर्गलोक चले गए।" तुलसीदास जी इस मृत्यु का ऐसा वर्णन करते हैं जो शोक में भी एक गहरी शांति देता है — "जीने और मरने का सच्चा फल तो दशरथ ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनगिनत ब्रह्मांडों में फैल गया। जीते-जी राम के चंद्रमुख को निहारा, और राम के विरह को ही अपनी मृत्यु का सुंदर बहाना बना लिया।" पूरी अयोध्या शोक में डूब गई। रानियाँ विलाप करने लगीं, दास-दासी रोने लगे, नगरवासी घर-घर रोने लगे — "आज धर्म की सीमा, गुण-रूप के भंडार सूर्यकुल के सूर्य अस्त हो गए!" सब कैकेयी को कोसने लगे। सुबह गुरु वशिष्ठ ने राजा के शरीर को तेल भरी नाव में सुरक्षित रखवाया और दूतों को तुरंत भरत के ननिहाल भेजा — पर आदेश दिया कि राजा की मृत्यु की खबर रास्ते में किसी को न बताई जाए। भरत को केवल इतना कहा जाए कि गुरु ने दोनों भाइयों को बुलवाया है। सीख: भक्तो, यह प्रसंग हमें कर्मफल के अटल नियम का सबसे गहरा पाठ पढ़ाता है — जो बीज हम बोते हैं, चाहे अनजाने में ही क्यों न बोया गया हो, वह अपने समय पर अवश्य फल देता है। राजा दशरथ का यह अंत हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी कार्य को करते समय, विशेषकर अंधेरे में या जल्दबाजी में, अत्यंत सजग रहना चाहिए — क्योंकि परिणाम कभी-कभी वर्षों बाद, अप्रत्याशित रूप से सामने आते हैं। और यह भी कि प्रेम इतना गहरा हो सकता है कि वियोग प्राण ले सकता है — यही राजा दशरथ के जीवन की अंतिम, सबसे बड़ी सच्चाई थी।

11. भरत का अयोध्या आगमन

जब से अयोध्या में यह अनर्थ शुरू हुआ था, भरत को अपने ननिहाल में ही अपशकुन होने लगे थे — डरावने सपने, बुरी कल्पनाएँ। वे रोज़ शिव का अभिषेक करके माता-पिता और भाइयों की कुशलता माँगते रहते। जब दूत आए और गुरु की आज्ञा सुनाई, भरत तुरंत हवा जैसे वेग वाले घोड़ों को हाँकते हुए चल पड़े। नगर में प्रवेश करते ही अपशकुन होने लगे — कौवे बुरी जगह बैठकर अशुभ बोल रहे थे, गधे-सियार विपरीत दिशा में बोल रहे थे। नगर बेहद डरावना लग रहा था, और लोग मिलते तो कुछ बोलते नहीं, चुपचाप दूर से प्रणाम करके निकल जाते। पुत्र के आने की बात सुनकर कैकेयी ही अकेली हर्षित हुईं — तुलसीदास जी लिखते हैं, "मानो कोई भीलनी जंगल में आग लगाकर आनंदित हो रही हो।" भरत ने पूछा — "पिताजी कहाँ हैं, सब माताएँ कहाँ हैं, सीता और मेरे प्रिय भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं?" कैकेयी ने कहा — "बेटा, राजा स्वर्गको सिधार गए।" यह सुनते ही भरत दुख से विवश हो गए, "तात, तात, हा तात" पुकारते हुए धरती पर गिर पड़े। फिर उठकर पूछा — "माता, पिता के मरने का कारण तो बताओ।" और तब कैकेयी ने, बड़े प्रसन्न मन से, शुरू से लेकर अपनी सारी करनी सुना दी — दोनों वर, राम का वनवास, सब कुछ। यह सुनते ही भरत को पिता के मरने का शोक भी भूल गया, और वे मौन खड़े रह गए। जब कैकेयी ने घावों पर नमक छिड़कते हुए कहा — "बेटा, राजा के लिए सोच करने की बात नहीं, ऐसा समझकर सोच छोड़ो और राज्य संभालो" — तब भरत का धैर्य टूट गया। भरत ने ऐसे कठोर शब्द कहे जो शायद ही किसी पुत्र ने कभी अपनी माता से कहे हों — "पापिनी, तूने हर तरह से कुल का नाश कर डाला! यदि तेरी नीयत इतनी बुरी थी तो जन्मते ही मुझे क्यों नहीं मार डाला? मुझे सूर्यवंश-सा वंश मिला, दशरथ-जैसे पिता मिले, राम-लक्ष्मण-से भाई मिले, पर हे माता, जन्म देनेवाली तू निकली! वही राम भी तुझे शत्रु लगने लगे! तू सच-सच बता, तू कौन है? जो भी है सो है, अब मुँह काला करके उठ और मेरी नजरों से दूर जा बैठ।" उसी समय, सजी-धजी मंथरा वहाँ आ पहुँची। शत्रुघ्न का क्रोध सीमा पार कर गया — उन्होंने ठीक निशाना साधकर उसके कूबड़ पर लात जमा दी, वह चीखती हुई मुँह के बल जमीन पर गिर पड़ी, उसका कूबड़ टूट गया, दाँत टूट गए। भरत ने ही उसे शत्रुघ्न के हाथों से छुड़ाया। फिर भरत और शत्रुघ्न माता कौसल्या के पास गए। कौसल्या का शरीर दुख के बोझ से सूख गया था। भरत को देखते ही वे उठकर दौड़ीं पर चक्कर खाकर मूर्छित हो गिर पड़ीं। भरत भी अपनी सुध भुलाकर उनके चरणों में गिर पड़े और बोले — "माता, पिताजी कहाँ हैं, दिखा दो; सीता और मेरे दोनों भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं? कैकेयी संसार में जन्मी ही क्यों! जिसने मुझ जैसा पुत्र जना, तीनों लोकों में मुझसे बड़ा अभागा कौन होगा!" कौसल्या ने अत्यंत सरलता और प्रेम से भरत को गले लगाया, मानो राम ही लौट आए हों। यह देखकर सब कहने लगे — "राम की माता ऐसी ही तो होनी चाहिए।" भरत ने गुरु और नगरवासियों के सामने ईश्वर की सौगंध खाकर कहा — "यदि इस कुकर्म में मेरी तनिक भी सहमति रही हो, तो मुझे वही पाप और वही नरक भोगना पड़े जो हत्या, चोरी, विश्वासघात करने वालों को मिलता है।" फिर गुरु वशिष्ठ ने राजा की दाहसंस्कार क्रिया संपन्न कराई, भरत ने पूरे विधि-विधान से पिता का श्राद्ध किया और अपार दान दिया। इसके बाद राजसभा में गुरु वशिष्ठ ने भरत को राज्य स्वीकार करने का उपदेश दिया — "पिता ने राज्य तुम्हें दिया है, पिता का वचन सच करना ही चाहिए। जो लोग उचित-अनुचित का विचार छोड़कर पिता के वचन का पालन करते हैं, वे सुख और सुयश के भागी बनते हैं। राम के लौटने पर राज्य उन्हें सौंप देना, तब तक स्नेहपूर्वक उनकी ओर से प्रजा की सेवा करना।" पर भरत ने सिर झुकाकर, अत्यंत विनम्रता से, पर पूरी दृढ़ता से इनकार कर दिया — "पिता स्वर्ग में हैं, सीता-राम वनमें हैं, और आप मुझसे राज्य करने को कह रहे हैं! मेरा हित तो राम की सेवा में था, वह भी माता की कुटिलता ने छीन लिया। लक्ष्मण, राम और सीता के चरण देखे बिना यह शोकभरा राज्य किस गिनती में है? मैं सच कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें — राजा वही होना चाहिए जो धर्मपरायण हो। मुझे जबरन राज्य दोगे उसी क्षण धरती पाताल में धँस जाएगी। मुझे आज्ञा दीजिए, मैं राम के पास जाऊँ, यही निश्चय है, इसीमें मेरा हित है।" इस निर्णय को सुनकर पूरी सभा प्रसन्नता से भर उठी — गुरु वशिष्ठ, माताएँ, मंत्री, सब — सबने कहा कि यही सबसे अच्छा उपाय है, चलो चित्रकूट, जहाँ राम हैं, और उन्हीं से निवेदन करें। भरत ने पूरी अयोध्या की प्रजा और सेना को साथ लेकर चित्रकूट की यात्रा आरंभ की — विशाल सेना, माताएँ पालकियों में, गुरु वशिष्ठ आगे, और स्वयं भरत-शत्रुघ्न पैदल चलते हुए। रास्ते में, गंगा तट पर, निषादराज गुह को यह खबर मिली कि भरत बड़ी सेना लेकर आ रहे हैं। संदेह में डूबकर उसने सोचा — "भरत वन को क्यों जा रहे हैं, मन में जरूर कोई कपट है। समझते होंगे कि लक्ष्मण सहित राम को मारकर आराम से निष्कंटक राज्य करूँगा!" उसने युद्ध की तैयारी कर ली, कहा — "मैं भरत से आमने-सामने भिड़ूँगा और जीते-जी उन्हें गंगापार नहीं उतरने दूँगा।" पर तभी एक बुजुर्ग ने शकुन देखकर कहा — "भरत से मिल लो, लड़ाई नहीं होगी। भरत तो राम को मनाने जा रहे हैं।" गुह ने स्वयं जाकर भरत से भेंट की, और भरत का शील-स्नेह देखकर, उनका प्रेम देखकर, वह तुरंत समझ गया कि उसका संदेह मिथ्या था। भरत ने उस निषाद को ऐसे गले लगाया मानो लक्ष्मण से ही भेंट हो गई हो — देवता फूल बरसाने लगे। सीख: भरत का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म कभी-कभी सबसे कठिन निर्णय माँगता है — भरत के पास राज्य, सत्ता, सब कुछ था, पर उन्होंने उसे तत्काल अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह अन्याय से प्राप्त था। यह हमें सिखाता है कि जो कुछ भी हमें अनुचित तरीके से मिले, चाहे वह कितना भी मूल्यवान क्यों न हो, उसे स्वीकार करने से इनकार करने का साहस रखना चाहिए। और गुह का प्रसंग हमें बताता है कि संदेह और पूर्वाग्रह हमें गलत निष्कर्ष तक पहुँचा सकते हैं — प्रत्यक्ष भेंट और खुले संवाद से ही सच्चाई सामने आती है, इसलिए किसी पर आरोप लगाने से पहले उससे मिलना, समझना जरूरी है।

12. भरत-राम मिलाप (चित्रकूट)

भरत जब चित्रकूट के निकट पहुँचे, तो वे रास्ते में उस अशोक वृक्ष के पास रुके जहाँ राम ने पहली रात विश्राम किया था। उन्होंने वहाँ की धूल आँखों में लगाई, उस कुश-शय्या को देखकर विलाप किया — "मेरे छोटे भाई लक्ष्मण इतने सुंदर और प्यारे हैं, आज वे वन में हर तरह की विपत्ति झेल रहे हैं — मेरी यह छाती करोड़ों वज्रों से भी कठोर निकली कि अब तक फटी नहीं।" फिर वे चित्रकूट पहुँचे और आश्रम में प्रवेश करते ही उनका सारा दुख-दाह मिट गया, मानो किसी योगी को परमतत्त्व की प्राप्ति हो गई हो। उन्होंने देखा — सिर पर जटा, कमर में मुनि-वस्त्र बाँधे, हाथ में बाण और कंधे पर धनुष, वेदी पर मुनि-साधुओं का समूह बैठा है और सीता सहित रघुनाथ विराजमान हैं। भरत, शत्रुघ्न और सखा निषाद सहित मन प्रेम में डूब गया — "नाथ रक्षा करो, गोसाईं रक्षा करो" कहते हुए वे धरती पर दंड की तरह गिर पड़े। लक्ष्मण ने पहचान लिया और राम से कहा — "रघुनाथ, भरत प्रणाम कर रहे हैं।" यह सुनते ही राम प्रेम से अधीर होकर उठ खड़े हुए — कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष-बाण। कृपानिधान राम ने भरत को जबरन उठाकर छाती से लगा लिया। तुलसीदास जी लिखते हैं — "इस मिलन का प्रेम बयान कैसे हो, यह तो कविकुल के लिए कर्म, मन, वाणी तीनों से परे है। भरत और रघुनाथ का यह प्रेम इतना अगम है कि ब्रह्मा-विष्णु-शिव तक वहाँ नहीं पहुँच सकते।" फिर राम शत्रुघ्न से मिले, केवट से मिले, लक्ष्मण भरत से गले मिले। भरत सीता के चरणों की धूल सिर पर धरकर बार-बार प्रणाम करने लगे, सीता ने उन्हें उठाकर सिर पर स्नेह से हाथ फेरा। पीछे-पीछे गुरु वशिष्ठ, सब माताएँ, राजा जनक और पूरी अयोध्या-सेना पहुँची। राम सबसे प्रेमपूर्वक मिले — सबसे पहले कैकेयी से मिले और अपने सरल स्वभाव और भक्ति से उसका मन शांत किया, उसे किसी प्रकार दोष नहीं दिया। गुरु वशिष्ठ ने राजा दशरथ के स्वर्गगमन का समाचार सुनाया — यह सुनकर राम को गहरा दुख हुआ, वे अपने प्रति पिता के स्नेह को ही उनकी मृत्यु का कारण समझकर बेहद व्याकुल हो उठे। पूरे समाज ने विधिपूर्वक श्राद्ध किया। अब आता है वह क्षण जिसका पूरे काण्ड को इंतज़ार था — भरत की महान विनती। सबके सामने, गुरु और राजा जनक की उपस्थिति में, भरत ने हाथ जोड़कर कहा — "स्वामी, कृपासागर, अंतर्यामी, अब मैं और क्या कहूँ। मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और नीच जाति का हूँ, पर जबसे राम ने मुझे अपनाया है तभी से मैं संसार का भूषण बन गया।" उन्होंने कहा — "राजतिलक की सारी सामग्री सजाकर लाई गई है, यदि आपका मन माने तो इसे सफल कर दीजिए — शत्रुघ्न सहित मुझे वन में भेज दीजिए और अयोध्या लौटकर सबको सनाथ कर दीजिए।" राम इस विनती पर मौन रह गए — संकोच और स्नेह दोनों के वश। तब गुरु वशिष्ठ ने राम से पूछा, और राम ने कहा — "आप और मिथिलेश्वर जनक जो भी आज्ञा दें, वही सबको शिरोधार्य होगी।" फिर सबका ध्यान भरत की ओर मुड़ा। भरत ने बड़ा धीरज धरकर, अत्यंत विनम्र किंतु दृढ़ वाणी में कहा — "प्रभु, आप पिता, माता, मित्र, गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अंतर्यामी हैं। मैं मोहवश प्रभु और पिता के वचनों को टालकर समाज जुटाकर यहाँ आया हूँ। मुझे भय-संकोच है, फिर भी छोटे मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ — तात, विधाता को दोषी मानकर क्षमा कीजिएगा। ...देव, मेरी एक विनती सुनकर फिर जैसा उचित लगे वैसा कीजिए। राजतिलक की सारी सामग्री सजाकर लाई गई है, यदि आपका मन माने तो इसे सफल कर दीजिए। शत्रुघ्न सहित मुझे वनमें भेज दीजिए और अयोध्या लौटकर सबको सनाथ कर दीजिए। नहीं तो नाथ, लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयों को लौटा दीजिए और मैं आपके साथ चलूँ। या फिर हम तीनों भाई वनको चले जाएँ और आप सीतासहित लौट जाइए। दयासागर, जिससे भी प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिए।" राम फिर भी मौन रहे — संकोची स्वभाव के कारण कुछ न बोले। इसी बीच राजा जनक चित्रकूट पहुँचे, और उन्होंने भी भरत से यही सुनकर कहा — "राजा दशरथ ने राम को वन भेजा और अपने प्रेम को प्राणों से सच्चा साबित कर दिया, पर हम इन्हें और गहरे वनमें भेजकर अपने विवेक की बड़ाई करते हुए लौटेंगे?" पूरी सभा असमंजस में थी। अंत में भरत ने पुनः बड़ी दृढ़ता से कहा — "आपके चरणकमलों की धूल की सौगंध, जो सत्य, पुण्य और सुख की पराकाष्ठा है — उसकी दुहाई देकर मैं अपने मन की इच्छा कहता हूँ — वह इच्छा है छल, स्वार्थ और चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। आज्ञापालन से बढ़कर श्रेष्ठ स्वामी की कोई सेवा नहीं — देव, अब सेवक को वही आज्ञारूपी वरदान मिले।" तब राम ने बड़े प्रेम और गंभीरता से उत्तर दिया — "तात, तुम्हारी, मेरी, परिवार की, घर-वन की सारी चिंता गुरु वसिष्ठ और राजा जनक को है। मेरा और तुम्हारा सबसे बड़ा पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसीमें है कि हम दोनों भाई पिता की आज्ञा मानें। तुम बस मुनि, माताओं और मंत्रियों की सीख मानते हुए प्रजा और राजधानी का पालन करते रहना। मुखिया मुख की तरह होना चाहिए, जो खुद खाता तो एक अकेला है, पर विवेक से शरीर के सारे अंगों का पालन-पोषण करता है।" भरत के मन को न संतोष मिला न शांति। आखिर प्रभु ने कृपा करके अपनी खड़ाऊँ दे दीं। सीख: भक्तो, भरत-राम मिलाप का यह पूरा प्रसंग हमें त्याग की उच्चतम सीमा दिखाता है। भरत ने राज्य, सत्ता, हर सुख-सुविधा को त्याग दिया — केवल इसलिए कि यह उन्हें अनुचित तरीके से मिला था। और राम ने अपने वचन और पिता की आज्ञा के लिए, अपने सबसे प्रिय भाई की सबसे मार्मिक विनती को भी अस्वीकार किया — क्योंकि वचन-पालन धर्म का सर्वोच्च रूप है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में सही निर्णय लेने के लिए कभी-कभी अपने ही प्रियजनों की भावनाओं के विरुद्ध भी दृढ़ रहना पड़ता है, यदि वह धर्म और सत्य की माँग हो। पर इस दृढ़ता में भी करुणा और प्रेम की कोई कमी नहीं होनी चाहिए — जैसा राम ने भरत के साथ दिखाया।

13. चरण-पादुका प्रसंग

अंततः, जब भरत की विनती और राम का निर्णय दोनों अटल हो गए, तब करुणानिधान राम ने एक अत्यंत सुंदर और प्रतीकात्मक उपाय निकाला। तुलसीदास जी लिखते हैं — "एक तरफ भरत का प्रेम, दूसरी तरफ गुरुजन-मंत्री-समाज की उपस्थिति — यह देखकर रघुनाथ संकोच और स्नेह दोनों के वश हो गए। आखिर प्रभु ने कृपा करके खड़ाऊँ दे दीं और भरत ने आदरसे उन्हें सिर पर धारण कर लिया।" यह दृश्य भक्तो, अपने आप में अद्वितीय है। राम ने अपनी चरण-पादुकाएँ (खड़ाऊँ) भरत को सौंपीं — इसका अर्थ यह था कि भरत राज्य पर स्वयं शासक के रूप में नहीं, बल्कि राम के प्रतिनिधि, राम के सेवक के रूप में बैठेंगे। राजसिंहासन पर राम नहीं बैठेंगे, उनकी पादुकाएँ बैठेंगी, और भरत उन्हीं पादुकाओं की आज्ञा से राज्य चलाएँगे। तुलसीदास जी इस पादुका की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं — "करुणानिधान की वे दोनों खड़ाऊँ मानो प्रजा के प्राणों की रक्षा करने वाले दो पहरेदार हैं, भरत के प्रेमरूपी रत्न के लिए मानो डिब्बा और जीव के उद्धार के लिए मानो राम-नाम के दो अक्षर हैं।" भरत इस सहारे को पाकर इतने आनंदित हुए जितना सीता-राम के साथ रहने से होता। उन्होंने प्रणाम करके विदा माँगी, राम ने उन्हें गले लगा लिया। सीख: पादुका-प्रसंग हमें सत्ता और सेवा के बीच का सबसे सुंदर भेद सिखाता है। भरत के पास सत्ता की समस्त शक्तियाँ थीं, फिर भी उन्होंने स्वयं को स्वामी नहीं, सेवक माना — सत्ता का उपयोग अपने लिए नहीं, अपने आदर्श के प्रतिनिधि के रूप में किया। आज के युग में जब सत्ता पाकर लोग अक्सर अहंकारी हो जाते हैं, भरत का यह उदाहरण हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो स्वयं को किसी उच्चतर आदर्श, उच्चतर मूल्य या उच्चतर उद्देश्य का सेवक मानकर कार्य करे, न कि अपने अहंकार की तुष्टि के लिए।

14. भरत का नंदिग्राम में तप

भरत अयोध्या लौटे, पर राजमहल में नहीं गए। शुभ मुहूर्त देखकर उन्होंने सबसे पहले राम की चरण-पादुकाओं को राजसिंहासन पर विराजमान किया। फिर माता कौसल्या और गुरु के चरणों में सिर नवाकर, चरण-पादुकाओं की आज्ञा लेकर, धर्मधुरंधर भरत ने नंदिग्राम में एक पर्णकुटी बनाई और वहीं निवास करने लगे। सोचिए भक्तो — जिस अयोध्या के राज्य को इंद्र तक तरसते थे, जिसकी संपत्ति सुनकर कुबेर भी लजाते थे, उसी अयोध्या में भरत ऐसे निर्लिप्त होकर रहने लगे जैसे चंपा के बागमें भौंरा। उन्होंने सिर पर जटा और मुनि-वस्त्र धारण किए, धरती खोदकर उसमें कुश की शय्या बिछाई। गहने, वस्त्र और तमाम भोग-सुख मन-वचन-कर्म से पूरी तरह त्याग दिए। वे राजा नहीं, तपस्वी बनकर रहे — पूरे चौदह वर्ष तक, ठीक वैसे ही जैसे राम वन में तपस्वी जीवन जी रहे थे। तुलसीदास जी लिखते हैं — "भरत का शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है, तेज घट रहा है, पर बल और मुख की कांति वैसी ही बनी है। राम प्रेम का यह व्रत रोज नया और सशक्त होता है, धर्म बढ़ता है और मन उदास नहीं, प्रसन्न रहता है।" वे नित्य प्रभु की पादुकाओं की पूजा करते, पादुकाओं से आज्ञा माँग-माँगकर हर तरह से राजकाज चलाते। शरीर रोमांचित रहता, हृदय में सीता-राम बसे रहते, जीभ राम-नाम जपती रहती, आँखों में प्रेम के आँसू रहते। तुलसीदास जी यहाँ भरत की महिमा का ऐसा वर्णन करते हैं जो शायद पूरी मानस में सबसे ऊँचा है — "लक्ष्मण-राम-सीता वनमें रहते हैं, और भरत घर में रहते हुए भी तप से अपना शरीर कसते हैं। दोनों ओर की स्थिति समझकर सब कहते हैं कि भरत हर तरह से सराहनीय हैं। उनके व्रत-नियम सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं, उनकी दशा देखकर मुनिराज भी लजा जाते हैं।" और अंत में वह अमर पंक्तियाँ आती हैं — "यदि सीता-राम के प्रेमरूपी अमृत से भरा भरत का जन्म न होता, तो मुनियों को भी दुर्लभ यम-नियम-शम-दम के कठिन व्रत कौन निभाता?" तुलसीदास जी स्वयं कहते हैं — "जो कोई भरत के चरित्र को नियमपूर्वक आदर से सुनेगा, उसे अवश्य ही सीता-राम के चरणों में प्रेम होगा और सांसारिक विषय-भोग से वैराग्य होगा।" सीख: भक्तो, भरत का यह तप हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति और सच्ची सेवा हमेशा प्रत्यक्ष, दिखावटी रूप में नहीं होती। भरत ने राम के साथ वन नहीं गए, पर उनका त्याग, उनकी तपस्या, उनका समर्पण राम के वनवास से किसी भी तरह कम नहीं था — बल्कि कई संत इसे उससे भी ऊँचा मानते हैं, क्योंकि भरत ने सत्ता के बीच रहते हुए भी पूर्ण वैराग्य साधा, जो कहीं अधिक कठिन है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में हमारा कर्तव्य कभी-कभी हमें अपने प्रियजन से भौतिक रूप से दूर रखता है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा प्रेम या हमारा समर्पण कम है। दूर रहकर भी, अपने कर्तव्य का पालन करते हुए भी, हम अपने आदर्शों के प्रति उतने ही समर्पित रह सकते हैं जितना कोई सामने रहकर।

15. उपसंहार — संपूर्ण अयोध्याकाण्ड का सार

भक्तो, अब हम पीछे मुड़कर देखें तो अयोध्याकाण्ड हमारे सामने त्याग, वचन-पालन और प्रेम की एक ऐसी गाथा बनकर उभरता है जिसकी गहराई मापना कठिन है। यह काण्ड हमें दिखाता है कि कैसे एक ही रात में, एक ही निर्णय से, चरम सुख करुण वियोग में बदल सकता है — और फिर भी कैसे उस वियोग में से सबसे ऊँचे मानवीय गुण प्रकट होते हैं। राजा दशरथ ने हमें वचन-पालन का सर्वोच्च उदाहरण दिया — प्राण देकर भी वचन नहीं तोड़ा। कैकेयी और मंथरा का प्रसंग हमें सिखाता है कि कुसंगति कैसे सबसे शुद्ध हृदय को भी विषाक्त कर सकती है। श्रीराम की समता — वनवास स्वीकार करते समय न कोई शिकायत, न कोई विद्रोह — हमें सिखाती है कि धर्म और कर्तव्य के आगे व्यक्तिगत सुख गौण हो जाना चाहिए। सीता का प्रेम हमें बताता है कि साथ ही सबसे बड़ा वैभव है। लक्ष्मण की भक्ति हमें समर्पण का पाठ पढ़ाती है। केवट का प्रसंग हमें बताता है कि सच्ची भक्ति किसी बड़े ज्ञान की मोहताज नहीं। और सबसे ऊपर, भरत का चरित्र — जिसे स्वयं तुलसीदास जी ने "राम-प्रेम की साक्षात मूर्ति" कहा है — हमें सिखाता है कि सत्ता को ठुकराना, अनुचित लाभ को अस्वीकार करना, और दूर रहकर भी पूर्ण समर्पण से सेवा करना — यही सच्चे मनुष्य की पहचान है। कई संत तो भरत की इस निष्काम, मौन तपस्या को लक्ष्मण की प्रत्यक्ष सेवा से भी ऊँचा मानते हैं — क्योंकि सामने रहकर सेवा करना जितना स्वाभाविक है, उतना ही कठिन है दूर रहकर, बिना किसी प्रत्यक्ष फल की आशा के, पूर्ण समर्पण बनाए रखना। और भक्तो, यह भी न भूलें — इस पूरी कथा में परिवार के भीतर हुए सबसे गहरे विश्वासघात के बावजूद, अंततः प्रेम ही विजयी हुआ। राम ने कैकेयी को कभी दोष नहीं दिया, भरत ने भी अंततः अपनी माता के प्रति कटुता को त्यागकर उसे क्षमा किया। यह हमें सिखाता है कि चाहे परिवार में कितनी भी गहरी दरार क्यों न आए, प्रेम और क्षमा से उसे फिर से जोड़ा जा सकता है — यह प्रयास करने योग्य है। अयोध्याकाण्ड यहीं समाप्त नहीं होती, भक्तो। राम, सीता और लक्ष्मण अभी चित्रकूट को भी छोड़कर आगे, और गहरे वन की ओर बढ़ेंगे — क्योंकि चित्रकूट भी अब भरत और अयोध्यावासियों के निकट होने के कारण उनके लिए उपयुक्त नहीं रहा। आगे की कथा — अरण्यकाण्ड — हमें ले जाएगी दंडकारण्य के घने जंगलों में, जहाँ राक्षसों का सामना होगा, जहाँ शूर्पणखा का प्रसंग आएगा, और जहाँ अंततः वह घटना घटेगी जो पूरी रामकथा को एक नया, और भी विशाल मोड़ देगी — माता सीता का हरण। वहीं से आरंभ होगी राम की वह खोज-यात्रा जो उन्हें वानरों, सुग्रीव, और अंततः परम भक्त हनुमान से मिलाएगी — ठीक वैसे ही जैसे नारद-मोह की कथा में शापित होकर भगवान विष्णु ने स्वयं कहा था, "मुझे वानरों की सहायता लेनी पड़ेगी।" जय श्री सीताराम! भक्तो, अरण्यकाण्ड की उस रोमांचक और मार्मिक कथा में हम फिर मिलेंगे, जहाँ त्याग और वियोग की यह गाथा एक नए, और भी गहन संघर्ष में प्रवेश करेगी। ॥ जय श्री सीताराम ॥