1. मंगलाचरण — समुद्र का मार्गदर्शन
गोस्वामी तुलसीदास जी इस काण्ड का आरंभ भी भगवान की वंदना से करते हैं — वे उन श्रीराम को नमन करते हैं जो योगियों के भी परम गम्य हैं, जो कामदेव के शत्रु शिव जी के पूज्य हैं, जो काल-रूपी मतवाले हाथी के लिए सिंह के समान हैं, और जो मायातीत होते हुए भी उर्वीश (राजा) के रूप में प्रकट हुए हैं। वे यह भी कहते हैं कि काल स्वयं जिनका धनुष है, और क्षण-पल-वर्ष-युग-कल्प जिनके प्रचंड बाण हैं, ऐसे प्रभु का मन सदा भजन करता रहे।
अब कथा आगे बढ़ती है। श्रीराम तीन दिनों तक समुद्र के तट पर बैठकर, हाथ जोड़कर, विनम्रता से समुद्र देवता से मार्ग माँगते रहे थे। परंतु समुद्र मौन ही रहा, कोई उत्तर न आया। भक्तो, यहाँ ध्यान दीजिए — स्वयं परब्रह्म परमेश्वर, तीन दिन तक एक जड़ समुद्र के सामने विनम्रता से याचना करते रहे! यही तो मर्यादा पुरुषोत्तम का स्वभाव है — वे शक्ति होते हुए भी पहले विनय का मार्ग अपनाते हैं। जब तीन दिन बीत गए और समुद्र न पसीजा, तब श्रीराम का धैर्य टूटा और उन्होंने अपने धनुष पर अग्निबाण चढ़ाकर समुद्र को ही सुखा देने की चेतावनी दी।
यह देखकर समुद्र देवता थर्रा उठे और तुरंत मनुष्य-रूप धारण कर प्रभु के सामने प्रकट हुए, हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और मार्ग सुझाया — "हे प्रभु! आपकी सेना में नल और नील नामक दो वानर हैं, जिन्हें बचपन में एक ऋषि से यह वरदान मिला हुआ है कि वे जो कुछ भी मुझमें डालेंगे, वह डूबेगा नहीं, तैरता रहेगा। आप उन्हीं से सेतु बँधवाइए, मैं स्वयं उसे थामे रहूँगा।" यह सुनकर श्रीराम ने मंत्रियों को बुलाया और कहा — "अब देर किस बात की, शीघ्र सेतु बाँधो।"
तभी जाम्बवान जी ने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा — "हे सूर्यवंश की ध्वजा-स्वरूप प्रभु! आपका नाम स्वयं ही सबसे बड़ा सेतु है, फिर यह पत्थरों का सेतु किस काम का?" यह सुनकर हनुमान जी ने चंचलता से पूछा — "फिर यह छोटा-सा समुद्र पार करने में कितनी देर लगेगी? प्रभु आज्ञा दें तो मैं ही सबको उठाकर उस पार पहुँचा दूँ!" ऐसे प्रेम-भरे विनोद के बीच सेतु-निर्माण का संकल्प लिया गया।
सीख: स्वयं भगवान भी, जब मार्ग बंद दिखे, तो पहले धैर्य और विनम्रता से याचना करते हैं, बल का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में करते हैं। जीवन में जब कोई बाधा सामने आए, तो पहले नम्रता और प्रयास का मार्ग अपनाइए — बल और क्रोध सबसे अंतिम अस्त्र होने चाहिए, सबसे पहला नहीं।
2. सेतु बंधन — भक्ति का सेतु
अब आरंभ होता है रामायण का वह प्रसंग जिसे सुनकर बच्चे-बूढ़े सभी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं — राम-सेतु का निर्माण।
जाम्बवान जी ने नल और नील दोनों भाइयों को बुलाकर सारी बात समझायी। दोनों भाई हृदय में श्रीराम के प्रताप का स्मरण करते हुए आगे बढ़े। फिर उन्होंने समस्त वानर-सेना को पुकारा — "जाओ, विकट वानरो! पेड़ों और पर्वतों के समूह उखाड़ लाओ!" यह सुनते ही वानर-भालुओं में हुंकार भर उठी। भक्तो, सोचिए — लाखों वानर, बड़े-बड़े पर्वत-शिखर और विशाल वृक्ष खेल-खेल में उखाड़कर कंधों पर, पूँछों में लपेटकर, दौड़े चले आ रहे हैं! वे उन्हें नल-नील के हाथों में सौंप देते, और नल-नील उन्हें गेंद की तरह पकड़कर समुद्र में डाल देते — और आश्चर्य, वे भारी-भरकम शिलाएँ डूबने के बजाय पानी पर तैरने लगतीं!
तुलसीदास जी यहाँ एक अत्यंत सुंदर बात कहते हैं — "यह न तो समुद्र की महिमा है, न पत्थरों का कोई गुण, न वानरों की ही कोई करामात — यह तो केवल श्रीरघुवीर के प्रताप का ही चमत्कार है कि पत्थर भी समुद्र पर तैर गए। जो ऐसे श्रीराम के नाम को हृदय में धारण किए बिना संसार-सागर तरना चाहता है, वह मूर्ख है।" भक्तो, यही तो पूरे मानस का सार है — पत्थर में कोई विशेष गुण नहीं था, केवल भगवान के नाम और स्पर्श का प्रताप था जिसने असंभव को संभव कर दिया।
गिलहरी का योगदान
भक्तो, इसी सेतु-निर्माण के समय की एक अत्यंत मार्मिक और प्रिय कथा भी युगों-युगों से भक्तों के हृदय में बसी है — जब विशालकाय वानर-भालू पर्वत और शिलाएँ ढो रहे थे, तब एक नन्ही-सी गिलहरी भी अपनी ओर से कुछ करना चाहती थी। वह समुद्र-तट की रेत में बार-बार लोटती, अपने छोटे-से शरीर पर रेत के कण चिपकाती, फिर दौड़कर जाकर उन्हें सेतु के ऊपर, पत्थरों की दरारों में झाड़ आती — फिर लौटकर वही क्रिया दोहराती। बड़े-बड़े वानर उसे देखकर हँस पड़ते — "अरे नन्ही, तू क्या कर रही है? हमारे इस विशाल कार्य में तेरे इन रेत के कणों से क्या फर्क पड़ेगा?"
पर जब यह बात श्रीराम तक पहुँची, तो प्रभु स्वयं वहाँ आए, उस छोटी-सी गिलहरी को अपनी हथेली पर उठा लिया, और अत्यंत स्नेह से उसकी पीठ पर तीन उंगलियाँ फेरीं — कहा जाता है कि आज भी गिलहरी की पीठ पर वे तीन रेखाएँ श्रीराम के आशीर्वाद के चिह्न स्वरूप विद्यमान हैं। प्रभु ने कहा — "इस कार्य में उसका योगदान किसी वानर के पर्वत उठाने से तनिक भी कम नहीं है, क्योंकि मैं भार का नहीं, भाव का मूल्य आँकता हूँ।"
सोचिए भक्तो — जिस कार्य में लाखों वानर पहाड़ ढो रहे थे, उसमें एक गिलहरी के रेत के कुछ कण भला कितना जोड़ते? कुछ नहीं, तर्क की दृष्टि से। परंतु प्रभु ने उसे उतना ही सम्मान दिया जितना सबसे बलशाली वानर को। यही भक्ति का सबसे गहरा रहस्य है — भगवान परिणाम नहीं, समर्पण देखते हैं। वे यह नहीं मापते कि आपने कितना दिया, वे यह देखते हैं कि आपने अपने पास जो कुछ भी था, वह सब दे दिया या नहीं।
नल-नील ने पाँच दिनों में ही सौ योजन लंबा वह विशाल सेतु बाँध दिया, जिसे देखकर स्वयं कृपानिधान श्रीराम का हृदय प्रसन्नता से भर उठा। श्रीराम सेतु के किनारे चढ़कर समुद्र का विस्तार निहारने लगे। वहाँ नाना प्रकार के मगर, घड़ियाल, मच्छ और सौ-सौ योजन लंबे सर्प थे — पर आश्चर्य, वे सब अपना स्वाभाविक वैर भूलकर प्रभु को एकटक निहार रहे थे, हटाए भी न हटते थे। उनके मन हर्ष से भरे थे। भक्तो, यह दृश्य हमें बताता है कि जब भगवान का दर्शन हो, तो पशु-पक्षी तक अपना स्वभाव भूल जाते हैं — फिर हम मनुष्य अपने द्वेष और वैमनस्य को क्यों नहीं भुला पाते?
प्रभु की आज्ञा पाकर अपार वानर-सेना सेतु पर चल पड़ी। इतनी भीड़ हुई कि कुछ वानर आकाशमार्ग से उड़ने लगे, कुछ जलचरों की पीठ पर चढ़-चढ़कर पार होने लगे — यह अद्भुत कौतुक देखकर राम-लक्ष्मण दोनों भाई हँसते हुए आगे बढ़े। समुद्र के उस पार प्रभु ने डेरा डाला और सबको आज्ञा दी — "जाओ, सुंदर फल-मूल खाओ।" श्रीराम के हित के लिए मानो ऋतु-अऋतु का बंधन ही टूट गया और सभी वृक्ष फलों से लद गए।
सीख: गिलहरी की यह कथा हमें जीवन की सबसे गहरी सीखों में से एक देती है — भक्ति और सेवा में योगदान का आकार मायने नहीं रखता, भाव मायने रखता है। आप अपने परिवार, समाज, या भगवान के लिए जो भी थोड़ा-सा भी कर सकते हैं, उसे छोटा समझकर मत छोड़िए — क्योंकि जो अपने सामर्थ्य-भर पूरी निष्ठा से दिया गया हो, वह प्रभु की दृष्टि में सबसे बड़े योगदान के समान ही मूल्यवान होता है। और यह भी याद रखिए — नल-नील की शिलाएँ अपने बल से नहीं, श्रीराम के नाम-प्रताप से तैरीं। हमारे जीवन के सारे कठिन कार्य भी अपने बल से नहीं, प्रभु-स्मरण से ही सहज बनते हैं।
3. सेना का लंका प्रयाण
सेतु पार करने के बाद वानर-सेना जब लंका की सीमा में आगे बढ़ी, तो जहाँ-कहीं कोई राक्षस मिल जाता, वानर उसे घेरकर खूब नचाते, फिर दाँतों से उसके नाक-कान काट देते और छोड़ देते। जिनके नाक-कान कटे थे, वे भागकर रावण के पास पहुँचे और सारा हाल कह सुनाया — समुद्र पर सेतु बँध जाने का, वानर-सेना के लंका पहुँच जाने का समाचार। यह सुनते ही रावण का चेहरा फीका पड़ गया, पर अपनी घबराहट छिपाते हुए वह ऊपर से हँसता हुआ महल में चला गया।
मंदोदरी की विनती
जब रानी मंदोदरी को यह समाचार मिला, तो वह पति का हाथ पकड़कर अपने कक्ष में ले आयी और अत्यंत मधुर वाणी में, चरणों में सिर नवाकर बोली — "हे नाथ! वैर उन्हीं से करना चाहिए जिन्हें बल-बुद्धि से जीता जा सके। आपमें और श्रीराम में इतना ही भेद है जितना जुगनू और सूर्य में। जिन्होंने बड़े-बड़े बलवान मधु-कैटभ को मारा, हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु का संहार किया — हे नाथ! उनसे विरोध मत कीजिए, जिनके हाथ में काल, कर्म और सारे प्राणी हैं। उनके चरणकमलों में सिर नवाकर जानकीजी को लौटा दीजिए, पुत्र को राज्य सौंपकर वन में जाकर श्रीरघुनाथ का भजन कीजिए।"
फिर मंदोदरी ने एक अत्यंत गहरी बात कही, जो श्रीराम के विश्वरूप का वर्णन करती है — "हे प्राणनाथ! ऐसा विचारकर प्रभु से वैर छोड़िए। पाताल उनका चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, शेष सब लोक उनके भिन्न-भिन्न अंगों में बसे हैं — यह सारा विश्व ही मानो साक्षात् श्रीराम का विराट रूप है।" यह सुनकर रावण खूब हँसा — "अहो, मोह की महिमा भी क्या बलवान है! स्त्री का स्वभाव ही ऐसा होता है — साहस, चंचलता, भय, अविवेक। यह सारा विश्व तो स्वभाव से ही मेरे वश में है।" मंदोदरी ने बहुत समझाया, पर मदमत्त रावण ने कुछ न माना और सभा में जाकर बैठ गया।
प्रहस्त की चेतावनी और सभा का चाटुकारिता-भरा उत्तर
सभा में रावण ने मंत्रियों से पूछा — "शत्रु से किस तरह युद्ध किया जाए?" अधिकांश मंत्रियों ने मुँह-देखी बातें कहीं — "मनुष्य और वानर-भालू तो हमारा भोजन ही हैं, इसमें भला कैसा भय!" परंतु मंत्री प्रहस्त ने हाथ जोड़कर साहस से कहा — "हे प्रभु! नीति के विरुद्ध कुछ न करें। जिसने खेल-खेल में समुद्र बँधवा लिया और सेना सहित सुबेल पर्वत पर उतर आया, हे भाई! उसे मनुष्य कैसे कहा जा सकता है? यदि वे स्त्री पाकर लौट जाएँ तो व्यर्थ का झगड़ा न बढ़ाइए।"
भक्तो, देखिए — पूरी सभा में केवल एक ही मंत्री, प्रहस्त, सच बोलने का साहस रखता था। शेष सब वही कहते जो राजा सुनना चाहता था। यह हमें सिखाता है कि सत्ता के आसपास सच बोलने वाले लोग हमेशा दुर्लभ होते हैं — और जिस राजा या नेता के दरबार में केवल चाटुकार बचते हैं, उसका पतन निश्चित हो जाता है। पर रावण ने यह हितकर वचन भी न सुना, और संध्या होते ही वह अपने विलास-भवन में नाच-गान देखने चला गया — यद्यपि सिर पर अत्यंत प्रबल शत्रु मँडरा रहा था।
सुबेल पर्वत पर श्रीराम की सहज लीला
उधर सुबेल पर्वत पर श्रीराम ने विशाल सेना सहित डेरा डाला था। लक्ष्मण ने कोमल पत्ते और फूल बिछाकर शय्या सजायी, प्रभु ने सुग्रीव की गोद में सिर रखा और विश्राम किया। पूर्व दिशा में उगते चंद्रमा को देखकर प्रभु ने सबसे विनोद-भरी बातें कीं — यह चंद्रमा कैसा है, इसमें दाग़ क्यों हैं, इस पर सुग्रीव, विभीषण और हनुमान ने बारी-बारी अपने-अपने उत्तर दिए। भक्तो, इस एक क्षण में झलकता है श्रीराम का वह मानवीय, सहज, प्रेम-भरा स्वभाव — युद्ध की इतनी बड़ी विभीषिका के ठीक पहले भी वे अपने सखाओं के साथ हँसी-विनोद कर सकते हैं। यही तो असली नेतृत्व है — अपने साथियों को भय से नहीं, स्नेह और सहजता से जोड़े रखना।
फिर प्रभु ने दक्षिण दिशा में लंका के महल की ओर देखा, जहाँ नाच-गान की धुन गूँज रही थी। एक ही बाण से उन्होंने रावण का छत्र-मुकुट और मंदोदरी के कर्णफूल काटकर गिरा दिए — सबके देखते-देखते, बिना किसी को चोट पहुँचाए! यह चमत्कार देखकर रावण की सारी सभा भयभीत हो उठी, पर रावण ने हँसते हुए बहाना बनाया — "जिसके लिए सिर कटना भी सदा शुभ ही रहा है, ऐसे मुझ रावण के लिए यह कोई अपशकुन नहीं।" यह केवल एक चेतावनी थी — श्रीराम यह दिखा रहे थे कि चाहें तो अभी रावण का सिर उतार सकते हैं, पर मर्यादा के अनुसार अभी युद्ध की औपचारिक घोषणा शेष थी।
अगले दिन प्रातः श्रीराम ने मंत्रियों को बुलाकर सलाह पूछी। जाम्बवान जी ने कहा कि युद्ध से पहले शत्रु के पास एक बार दूत भेजना नीति-सम्मत है, ताकि यदि वह समझ जाए तो व्यर्थ रक्तपात रुक सके। यह सलाह सबके मन को भा गयी, और श्रीराम ने बालि-पुत्र अंगद की ओर देखा।
सीख: मंदोदरी और प्रहस्त, दोनों ने रावण को सच्चाई और नीति की राह दिखायी, पर अभिमान में डूबे रावण ने किसी की न सुनी। यह हमें सिखाता है कि अभिमान मनुष्य के कानों को भी बंद कर देता है — सबसे अच्छी सलाह भी उस तक नहीं पहुँच पाती जो स्वयं को सर्वज्ञ समझ बैठा हो। जीवन में जब कोई सच्चा हितैषी आपको चेतावनी दे, तो अहंकार में उसे नकारने के बजाय एक बार रुककर विचार अवश्य कीजिए।
4. अंगद दूत कार्य
अब आती है मानस के सबसे रोमांचक प्रसंगों में से एक की बारी — अंगद का दूत बनकर रावण की सभा में जाना।
श्रीराम ने अंगद से कहा — "हे बल-बुद्धि-गुणों के धाम बालिपुत्र! तुम्हें अधिक समझाकर क्या कहूँ, मैं जानता हूँ तुम परम चतुर हो। शत्रु से वही बात करना जिससे हमारा हित सधे और उसे भी अंतिम अवसर मिल जाए।" अंगद ने प्रभु के चरणों की वंदना कर, "जिस पर आप कृपा करें उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं" — यह कहकर लंका की ओर प्रस्थान किया।
लंका में प्रवेश करते ही रावण के एक पुत्र से भेंट हो गयी, जो वहीं खेल रहा था। बातों-ही-बातों में उसने अंगद पर लात उठायी — अंगद ने वही पैर पकड़कर उसे घुमाकर धरती पर पटक दिया! यह देखकर राक्षस भयभीत हो उठे, सारे नगर में कोलाहल मच गया, पर कोई किसी को असली बात न बता सका। सब यही सोचकर चुप रह गए कि विधाता अब क्या करेगा।
अंगद सिंह की-सी चाल में, निर्भय होकर रावण की सभा के द्वार पर पहुँचे। रावण ने हँसकर बुलावा भेजा। अंगद जब सभा में प्रवेश करते हैं, तो तुलसीदास जी उनका वर्णन करते हैं मानो मतवाले हाथियों के झुंड में एक सिंह निर्भय होकर चला जा रहा हो।
रावण ने पूछा — "अरे बंदर, तू कौन है?" अंगद ने गर्व से उत्तर दिया — "हे दशग्रीव! मैं श्रीरघुवीर का दूत हूँ, मेरे पिता का नाम बालि है। तुम्हारा कुल उत्तम है, तुम पुलस्त्य ऋषि के पौत्र हो, शिव-ब्रह्मा की तुमने बड़ी आराधना की है — पर राजमद या मोहवश तुमने जगज्जननी सीता को हर लिया है। अब मेरी हितकी बात सुनो, इसे मानोगे तो प्राण बच जाएँगे — दाँतों में तिनका दबाकर, गले में कुल्हाड़ी डालकर, कुटुंबियों और पत्नियों सहित जानकीजी को लौटा दो, और हाथ जोड़कर कहो — 'हे शरणागतपालक! अब मेरी रक्षा कीजिए।'"
रावण क्रोध से जल उठा — "अरे बंदर के बच्चे! मुझ देवशत्रु को तूने पहचाना नहीं?" अंगद ने हँसकर कहा — "मेरा नाम अंगद है, मैं बालि का पुत्र हूँ, कभी तुम्हारी उनसे भेंट हुई थी?" यह सुनते ही रावण चौंक उठा — "तू ही बालि का पुत्र है? कुलनाशक!" अंगद ने अत्यंत तीखे किंतु सत्य वचनों से उत्तर दिया — "यह सच है कि मैं कुलनाशक हूँ, और हे रावण! तुम कुलरक्षक हो — अंधे-बहरे भी ऐसी बात नहीं कहते! परायी स्त्री की चोरी करने वाला, अपनी बहन का नाक-कान कटवाने वाला तू धर्मशीलता की बात करता है?"
यहाँ दोनों में बहुत देर तक तीखा वाक्-युद्ध चलता है — रावण अपने बल की डींग हाँकता है, अपनी विजय-गाथाएँ सुनाता है, और अंगद हर बार उसे उसकी वास्तविक पराजयों की याद दिलाते हैं — कैसे बालि ने एक बार उसे अपनी काँख में दबाकर छह महीने तक कैद रखा था, कैसे सहस्रबाहु ने उसे किसी विचित्र जंतु की तरह पकड़ लिया था, कैसे बच्चों ने उसे पाताल में घुड़साल में बाँध दिया था। अंगद कहते हैं — "श्रीराम मनुष्य कैसे हैं? क्या कामदेव भी धनुर्धर नहीं? क्या गंगा भी नदी नहीं? क्या गरुड़ भी पक्षी नहीं? क्या चिंतामणि भी पत्थर नहीं? अरे रावण! ऐसे ही श्रीराम भी, तुझे साधारण मनुष्य प्रतीत होते हुए भी, साक्षात् परब्रह्म हैं।"
चरण-प्रतिज्ञा — सभा की चुनौती
अंत में अंगद ने एक अद्भुत चुनौती दी — उन्होंने अपना एक चरण धरती पर दृढ़ता से जमाकर कहा — "अरे बीस भुजा वाले! यदि मैंने तेरी दसों जीभें न उखाड़ीं तो सचमुच मैं ही झूठा। और यदि तू मेरा यह चरण हटा सके, तो श्रीराम लौट जाएँगे और मैं सीताजी को हारा हुआ मान लूँगा!"
यह सुनते ही इंद्रजीत मेघनाद सहित अनेक बलवान योद्धा जोश भरकर उठे और पूरे बल से अंगद का चरण हटाने का प्रयत्न करने लगे — पर पैर टलता ही नहीं! एक-एक कर करोड़ों योद्धा झपटते हैं, और अंगद का चरण उसी तरह अटल रहता है जैसे किसी सच्चे संत का मन विपत्तियों में भी नीति नहीं छोड़ता। अंततः जब सबने हार मान ली, तब स्वयं रावण अभिमान से उठ खड़ा हुआ। पर ज्योंही उसने अंगद के चरण को छूने के लिए हाथ बढ़ाया, अंगद ने तुरंत व्यंग्य से कहा — "अरे मूर्ख! जाकर श्रीराम के ही चरण क्यों नहीं पकड़ता?" यह सुनते ही रावण मन-ही-मन बहुत सकुचाकर, लज्जित होकर वापस अपने सिंहासन पर जा बैठा — मानो उसने अपनी सारी संपत्ति और सम्मान ही गँवा दिया हो।
सारी राक्षस-सभा के सामने, स्वयं रावण को इस प्रकार लज्जित होते देख भय की लहर दौड़ गयी। अंगद ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए, नीति की और बहुत सी बातें कहीं, पर काल निकट आ जाने के कारण रावण ने कुछ न माना। अंगद हर्षित होकर श्रीराम के चरणकमलों में लौट आए, उनका शरीर पुलकित था।
सीख: अंगद का यह चरण-प्रसंग हमें बताता है कि सच्ची शक्ति केवल भुजबल में नहीं, बल्कि सत्य और धर्म पर अटल खड़े रहने में होती है — करोड़ों प्रयास करने पर भी असत्य, सत्य को हिला नहीं सकता। और यह भी सीख मिलती है — शत्रु के सामने भी अंतिम क्षण तक शांति और समझौते का द्वार खुला रखना चाहिए, भले ही परिणाम युद्ध ही क्यों न हो। अंगद युद्ध का प्रस्ताव लेकर नहीं, शांति का अंतिम अवसर लेकर गए थे — यही सच्चे धर्मयुद्ध की पहचान है, कि युद्ध से पहले भी शांति का हर संभव प्रयास किया जाए।
5. युद्ध का प्रारम्भ
अंगद के लौटने के बाद रावण के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा था। अगले दिन प्रातः उसने अपने सेनापतियों को बुलाकर आदेश दिया — "जाओ, चारों दिशाओं में जाकर रीछ-वानरों को पकड़-पकड़कर खाओ!" राक्षस सेना नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर करोड़ों की संख्या में निकल पड़ी — भिंदिपाल, साँगी, तोमर, मुद्गर, फरसे, त्रिशूल। उधर वानर-भालू भी पर्वत और वृक्षों को हथियार बनाकर गरजते हुए आगे बढ़े। दोनों ओर से "श्रीराम की दुहाई" और "रावण की दुहाई" गूँज उठी, और युद्ध छिड़ गया।
पहले दिन का यह युद्ध अत्यंत भीषण था — वानर लंका के परकोटे तोड़ रहे थे, राक्षसों को पकड़कर ऊँचाई से नीचे फेंक रहे थे। संध्या होते-होते हनुमान जी और अंगद अकेले ही लंका के भीतर घुसकर सोने के खंभे उखाड़ रहे थे, महलों को ढहा रहे थे — रावण की स्त्रियाँ भय से चीख उठीं। इसी बीच मेघनाद ने माया रचकर चारों ओर घना अंधकार फैला दिया, जिससे वानर-सेना दिशाहीन होकर भटकने लगी। तब श्रीराम ने हँसकर धनुष चढ़ाया और एक अग्निबाण छोड़ा, जिससे चारों ओर प्रकाश फैल गया। प्रकाश पाते ही थकान-भय भुलाकर वानर-भालू पुनः हर्षित होकर दौड़ पड़े।
रात होते ही दोनों सेनाएँ लौट गईं। उधर लंका में रावण ने मंत्रियों से मारे गए योद्धाओं की सूची सुनी — आधी से अधिक सेना नष्ट हो चुकी थी। तभी माल्यवंत नामक एक अत्यंत वृद्ध राक्षस, जो रावण का नाना और उसका श्रेष्ठ मंत्री भी था, दुखी होकर बोला — "अरे मूर्ख! जबसे तूने सीता को हर लाया है, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं जिनका वर्णन ही नहीं हो सकता। जिन्होंने हिरण्यकशिपु और मधु-कैटभ जैसे बलवानों को मारा, वे ही कृपासागर भगवान अब तेरे सामने खड़े हैं — इसलिए वैर छोड़कर जानकीजी को लौटा दे।" रावण क्रोधित हो उठा — "तू बूढ़ा हो गया है, नहीं तो अभी तुझे मार डालता — दुबारा मुझे अपना मुँह मत दिखाना!" माल्यवंत दुर्वचन सहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद ने क्रोध से कहा — "सबेरे मेरी करामात देखना, मैं ही सबको समाप्त कर दूँगा।"
भक्तो, सोचिए — रावण के अपने ही कुल के वृद्ध, अनुभवी, हितैषी मंत्री उसे बार-बार सच्चाई का आईना दिखा रहे थे। पर सत्ता के मद में डूबा व्यक्ति अपने सबसे सच्चे हितैषियों को भी शत्रु समझने लगता है।
सीख: युद्ध का यह प्रारंभिक चरण हमें बताता है कि जब अहंकार अपने चरम पर पहुँच जाता है, तो व्यक्ति अपने ही परिवार और शुभचिंतकों की सलाह को अपमान समझने लगता है। जीवन में जब आपके अनुभवी बड़े-बुज़ुर्ग आपको कोई कड़वी पर सच्ची बात कहें, तो क्रोधित होने के बजाय एक बार गंभीरता से सोचिए — शायद वही आपका पतन रोक सकती है।
6. कुम्भकर्ण वध
पहले दिन की करारी हार से हताश रावण को अब एक ही सहारा दिखा — उसका विशालकाय भाई कुंभकर्ण, जो महीनों की नींद में सोया पड़ा था। भक्तो, स्मरण कीजिए बालकाण्ड की वह कथा — जब तीनों भाइयों ने तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान माँगे थे, तब देवताओं ने भयभीत होकर सरस्वती माता से प्रार्थना की थी कि कुंभकर्ण की जिह्वा पर बैठकर उसे भ्रमित कर दें, अन्यथा वह इंद्रासन माँग बैठेगा। सरस्वती माता की कृपा से उसके मुख से निकला था — "मुझे निद्रासन चाहिए!" और इस प्रकार उसे अनजाने ही महीनों सोते रहने का विचित्र वरदान मिल गया था। आज वही शाप-सा वरदान रावण के लिए अंतिम सहारा बन गया था।
कुंभकर्ण को जगाना भी कोई साधारण कार्य नहीं था — ढोल-नगाड़े बजाए गए, हाथियों से उसके शरीर को रौंदा गया, तब कहीं जाकर वह जागा। जागते ही वह ऐसा दिखा मानो स्वयं काल शरीर धरकर बैठा हो। उसने पूछा — "भाई, बताओ तो, तुम्हें किस बात का भय है जो मुझे इस तरह जगाया?" रावण ने सीता-हरण से लेकर अब तक की पूरी कथा सुनायी — कैसे वानरों ने उसकी सेना का संहार कर डाला।
कुम्भकर्ण की सत्यनिष्ठ फटकार
यह सुनकर कुंभकर्ण ने जो उत्तर दिया, भक्तो, वह इस पूरे प्रसंग का सबसे मार्मिक क्षण है। उसने दुखी होकर कहा — "अरे मूर्ख! जगज्जननी सीता को हरकर अब तू कल्याण चाहता है? हे राक्षसराज! तूने यह अच्छा नहीं किया, अब मुझे जगाकर क्या लाभ हुआ? हे तात! अब भी अभिमान त्याग दे। जिनके हनुमान-जैसे सेवक हैं, वे श्रीराम भला मनुष्य कैसे हो सकते हैं? हाय भाई! तूने बड़ी भूल की, तूने उस परम देवता का विरोध कर लिया जिसके शिव, ब्रह्मा जैसे देवता भी सेवक हैं।"
भक्तो, ध्यान दीजिए — कुंभकर्ण ने अपने ही भाई के सामने साफ-साफ कह दिया कि रावण ने अन्याय किया है, कि सीता को लौटा देना ही उचित है, कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं। यह कोई कायरता नहीं थी — यह सत्य को खुलकर स्वीकार करने का साहस था। परंतु इसके तुरंत बाद उसने यह भी कहा — "अब तो हे भाई! अंतिम बार मुझे भरपूर अँकवार में भर ले, मैं जाकर अपने नेत्र सफल कर लूँ।" और फिर विभीषण से मिलकर, जो उसे रावण छोड़कर श्रीराम की शरण में जा चुके भाई के रूप में मिले, कुंभकर्ण ने कहा — "हे भाई! तूने श्रीराम-जैसे शोभा और सुख के सागर को भजकर अपने कुल को उजागर कर दिया। मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर रणधीर श्रीराम का भजन करते रहना। अब मैं कालके वशमें आ चुका हूँ" — यह कहकर उसने विभीषण को गले लगाया और युद्धभूमि की ओर चल दिया।
यहाँ कुंभकर्ण हमारे सामने एक अत्यंत जटिल, अत्यंत मानवीय चरित्र बनकर खड़ा होता है — वह जानता है कि उसका भाई गलत है, वह जानता है कि सामने साक्षात् भगवान खड़े हैं, फिर भी वह युद्ध में जाता है — केवल इसलिए क्योंकि जिस अन्न-जल पर वह पला-बढ़ा, उस भाई का साथ छोड़ना उसे उचित नहीं लगता। यह अंधी वफ़ादारी है, विवेकपूर्ण निष्ठा नहीं — और यही उसका दुखांत भी बन जाता है।
रणभूमि में कुम्भकर्ण और उसका अंत
युद्धभूमि में कुंभकर्ण ने भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वज्रपात की तरह गर्जना की, और करोड़ों वानरों को शरीर से ही मसल डाला। सुग्रीव तक को उसने पकड़ लिया, पर सुग्रीव ने फुर्ती से उसके नाक-कान काटकर स्वयं को छुड़ा लिया। यह देखकर वानर-सेना ऐसे भागी जैसे भेड़िये को देखकर भेड़ों के झुंड भागते हैं। तब स्वयं श्रीराम आगे आए। उन्होंने पहले उसकी भुजाएँ काटीं, फिर एक-एक कर उसके पैर काटे, अंत में उसका विशाल सिर काट डाला। सिर रावण के सामने जा गिरा, देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणि खो देने पर सर्प व्याकुल होता है।
देवताओं ने नगाड़े बजाते, हर्षित होते हुए फूलों की वर्षा की और श्रीहरि के गुणों का गान किया। शिव जी कहते हैं — "जो नीच राक्षस और पापों की खान था, उस कुंभकर्ण को भी श्रीराम ने अपना ही धाम दे दिया" — क्योंकि स्वयं भगवान के हाथों मृत्यु पाना ही परम मोक्ष है, चाहे मरने वाला शत्रु ही क्यों न हो।
सीख: कुंभकर्ण का यह प्रसंग हमें एक अत्यंत गहरी और असहज सीख देता है — केवल निष्ठावान होना पर्याप्त नहीं, निष्ठा सही स्थान पर होनी चाहिए। कुंभकर्ण जानता था कि उसका भाई अधर्म पर है, फिर भी अंधी पारिवारिक वफ़ादारी में उसने अन्याय का साथ दिया — और इसी का मूल्य उसे अपने प्राणों से चुकाना पड़ा। जीवन में जब आपका कोई प्रियजन स्पष्ट रूप से गलत हो, तो केवल इसलिए उसका साथ मत दीजिए क्योंकि वह आपका अपना है — सच बोलिए, जैसे कुंभकर्ण ने बोला, और फिर विवेक से यह भी तय कीजिए कि क्या आप अन्याय में उसका साथ देंगे या नहीं। और यह भी सीख मिलती है — श्रीराम ने अपने सबसे भयंकर शत्रु को भी सम्मान और मोक्ष दिया; सच्ची विजय शत्रु को नीचा दिखाने में नहीं, उसे भी करुणा देने में है।
7. मेघनाद-लक्ष्मण शक्ति
कुंभकर्ण की मृत्यु से स्तब्ध रावण को अब अपने पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) पर ही भरोसा बचा था। मेघनाद ने पिता को ढाढ़स बँधाते हुए कहा — "सबेरे मेरी करामात देखियेगा।" अगले दिन उसने रणभूमि में भीषण माया-युद्ध आरंभ किया — वह कभी अंगारे बरसाता, कभी रक्त-हड्डियाँ, कभी अदृश्य होकर बाणों की झड़ी लगाता। वानर-सेना इस माया से त्रस्त होकर व्याकुल हो उठी।
तब श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण जी, अंगद आदि वीरों को साथ लेकर मेघनाद से भिड़ने चल पड़े। यह द्वंद्व अत्यंत लंबा और भीषण था — दोनों वीर बराबरी के योद्धा थे, कोई एक-दूसरे को जीत नहीं पा रहा था। अंततः जब मेघनाद हारने के करीब पहुँचा, तब उसने छल का सहारा लिया और अपनी वह भयंकर "वीरघातिनी शक्ति" चला दी, जिसे कोई साधारण अस्त्र काट नहीं सकता था। वह तेजस्वी शक्ति लक्ष्मण जी की छाती में जा लगी।
लक्ष्मण जी धरती पर गिर पड़े। मेघनाद के समान करोड़ों योद्धा मिलकर भी उन्हें उठाने का प्रयास करते रहे, पर जगत के आधार शेषावतार लक्ष्मण को कोई हिला तक न सका। यह समाचार जब श्रीराम तक पहुँचा, तो भक्तो — यहाँ मानस का वह क्षण आता है जो हमें प्रभु के सबसे मानवीय, सबसे करुण रूप के दर्शन कराता है।
श्रीराम का विलाप
श्रीराम, जो अभी कुछ ही क्षण पहले तक कुंभकर्ण-जैसे महाबली को क्षणभर में परास्त कर चुके थे, लक्ष्मण को इस अवस्था में देखकर एक साधारण मनुष्य की तरह विलाप करने लगे। उन्होंने कहा — "हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे, तुम्हारा स्वभाव सदा ही कोमल रहा है। मेरी व्याकुल पुकार सुनकर भी क्यों नहीं उठते? पुत्र, धन, पत्नी, घर और परिवार तो संसार में बार-बार मिलते-बिछड़ते रहते हैं, पर सगा भाई फिर नहीं मिलता। जैसे पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना सर्प और सूँड़ के बिना गजराज अत्यंत दीन हो जाते हैं, वैसे ही मैं तुम्हारे बिना हो जाऊँगा। स्त्री के लिए प्यारे भाई को खोकर मैं किस मुँह से अयोध्या जाऊँगा? हे पुत्र! मेरा यह निष्ठुर हृदय अपयश और तुम्हारा शोक दोनों साथ-साथ सहेगा — मैं जाकर माता सुमित्रा को क्या उत्तर दूँगा, जिन्होंने तुम्हें सब तरह से सुखद और परम हितकारी समझकर ही मेरे हाथ में सौंपा था?"
सोचिए भक्तो — यह वही श्रीराम हैं जिन्होंने सीता-हरण के समय भी अपने संयम को इतना नहीं टूटने दिया था, जिन्होंने रावण के सामने अद्भुत धैर्य और गंभीरता दिखायी थी। पर अपने भाई के इस संकट में उनका संयम पूरी तरह टूट गया — वे रोए, विलाप किया, एक क्षण के लिए स्वयं को असहाय अनुभव किया। यह हमें बताता है कि भगवान जब मनुष्य-रूप धारण करते हैं, तो मनुष्य के सारे भाव — प्रेम, वियोग, असहायता — भी सच्चे रूप में धारण करते हैं। यह उनके अवतार की पूर्णता है, कोई कमज़ोरी नहीं।
सीख: श्रीराम का यह विलाप हमें सिखाता है कि अपनों के लिए गहरी पीड़ा अनुभव करना, रोना, टूट जाना — यह कमज़ोरी नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम का प्रमाण है। समाज अक्सर कहता है कि "बड़े लोग रोते नहीं," "नेतृत्व करने वालों को भावुक नहीं होना चाहिए" — पर स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने दिखाया कि अपने प्रियजनों के लिए विलाप करना मनुष्यता का ही एक पवित्र हिस्सा है। अपनी भावनाओं को दबाइए मत — उन्हें व्यक्त करना ही सच्ची शक्ति है, उन्हें छिपाना नहीं।
8. संजीवनी बूटी
श्रीराम के इस असीम शोक के बीच वैद्य सुषेण को लंका से बुलाया गया। सुषेण ने परीक्षा करके बताया — "हिमालय के द्रोणागिरि पर्वत पर एक विशेष संजीवनी बूटी है। यदि वह सूर्योदय से पहले लक्ष्मण को खिला दी जाए, तो वे बच जाएँगे। अन्यथा नहीं।" यह सुनते ही सबकी दृष्टि हनुमान जी की ओर गयी।
हनुमान जी श्रीराम के चरणकमलों को हृदय में बसाकर आकाश-मार्ग से हिमालय की ओर उड़ चले। रास्ते में रावण के गुप्तचर कालनेमि ने, जो मायावी मुनि का वेश धरकर एक तालाब और सुंदर बाग के बीच बैठा था, उन्हें भरमाने का प्रयत्न किया — पर एक शापित अप्सरा, जो मगरी के रूप में उस तालाब में थी, ने हनुमान जी को सचेत कर दिया कि यह मुनि नहीं, मायावी राक्षस है। हनुमान जी ने उसका वध कर आगे की उड़ान भरी।
पर्वत को उठा लेना
द्रोणागिरि पहुँचकर हनुमान जी ने पर्वत तो देखा, पर अंधेरे और उतावली में उस विशेष संजीवनी बूटी को पहचान न सके — इतनी सारी जड़ी-बूटियाँ, इतना कम समय! भक्तो, यहीं वह क्षण आता है जो पूरी रामायण के सबसे प्रिय, सबसे अद्भुत चित्रों में गिना जाता है — हनुमान जी ने एक क्षण भी नहीं गँवाया। उन्होंने सोचा — "यदि मुझे बूटी नहीं पहचान आ रही, तो मैं पूरा पर्वत ही क्यों न उठा ले चलूँ?" और उन्होंने अपने विराट रूप में उस समूचे द्रोणागिरि पर्वत को ही जड़ से उखाड़कर हथेली पर उठा लिया, और आकाश-मार्ग से उड़ चले!
रास्ते में अयोध्या के ऊपर से गुजरते हुए भरत जी ने आकाश में यह विशालकाय, विचित्र आकृति देखी और अनुमान लगाया कि यह कोई राक्षस है जो कोई अनिष्ट करने जा रहा है। उन्होंने एक बाण चढ़ाकर उसे गिरा दिया। बाण लगते ही हनुमान जी "राम, राम, रघुनायक" रटते हुए मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े। भरत जी दौड़कर पास आए, और प्रिय राम-नाम सुनकर तुरंत समझ गए कि यह कोई शत्रु नहीं। उन्हें हृदय से लगाकर जगाने का प्रयत्न किया, और अत्यंत व्याकुल होकर कहा — "यदि मन, वचन, कर्म से मैंने कभी श्रीराम को न भुलाया हो, तो यह वानर थकान और पीड़ा से तुरंत मुक्त हो जाए!" यह वचन कहते ही हनुमान जी की मूर्च्छा टूट गयी।
भरत जी ने पूछा — "हे तात! लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम की कुशल तो कहो।" जब सारा वृत्तांत सुना, तो भरत जी विलाप कर उठे — "हाय! मैं जगत में क्यों जन्मा, प्रभु के किसी काम न आ सका!" फिर धैर्य धरकर उन्होंने कहा — "हे तात! तुम्हें जाने में देर होगी और सबेरा होते ही सारा काम बिगड़ जाएगा। इसलिए पर्वत सहित मुझे ही बाण पर बिठाकर ले चलो, मैं तुम्हें शीघ्रता से पहुँचा दूँगा।" यह सुनकर हनुमान जी के मन में क्षणभर के लिए यह विचार उठा — "मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा?" — पर फिर श्रीराम के प्रताप का स्मरण कर वे तत्काल तैयार हो गए। भरत जी ने बाण पर बिठाकर उन्हें लंका की ओर छोड़ दिया।
लक्ष्मण का पुनर्जीवन
समय रहते हनुमान जी लंका पहुँचे, सुषेण वैद्य ने संजीवनी निकालकर लक्ष्मण को सुँघायी — और लक्ष्मण जी तुरंत उठ बैठे! श्रीराम हर्षित होकर भाई से गले मिले। सारे वानर-भालू आनंद से उछल पड़े, चारों ओर जय-जयकार गूँज उठी। जो शोक कुछ ही घंटे पहले पूरी सेना को डुबोए हुए था, वह क्षणभर में परम आनंद में बदल गया।
सीख: हनुमान जी का यह पर्वत उठाना हमें सिखाता है कि जब समय बहुत कम हो और सही निर्णय स्पष्ट न हो, तो झिझकने के बजाय पूरी शक्ति और साहस से वह कर डालिए जो कार्य को पूरा कर सके — भले ही वह तरीका असामान्य ही क्यों न लगे। परफेक्ट रास्ता खोजने में समय गँवाने से बेहतर है कि उपलब्ध सबसे भरोसेमंद रास्ता चुन लिया जाए। और भरत जी का यह प्रसंग भी अत्यंत मार्मिक है — दूर बैठे हुए भी, अयोध्या में तपस्वी जीवन जीते हुए भी, उनका हृदय सदा श्रीराम के साथ ही धड़कता था। सच्चा प्रेम दूरी से कभी कम नहीं होता।
9. मेघनाद वध
लक्ष्मण के पुनर्जीवित होने और कुंभकर्ण की मृत्यु से रावण अत्यंत विचलित हो चुका था। तभी मेघनाद ने एक नयी योजना बनायी — उसने निश्चय किया कि वह गुप्त रूप से एक विशेष यज्ञ करेगा, जिसे पूर्ण करने पर वह अजेय और अदृश्य होकर युद्ध कर सकेगा।
यह भेद विभीषण जी को ज्ञात हो गया, और उन्होंने तुरंत श्रीराम के पास जाकर कहा — "हे अतुलनीय बलवान, उदार प्रभु! सुनिए, देवताओं को सतानेवाला दुष्ट मेघनाद निकुंभिला में एक गुप्त यज्ञ कर रहा है। हे प्रभु! यदि वह यज्ञ पूर्ण हो गया तो फिर मेघनाद शीघ्र जीता न जा सकेगा।" यह सुनकर श्रीराम ने लक्ष्मण को आज्ञा दी — "हे भाई! तुम सब वहाँ जाओ और उसका यज्ञ विध्वंस कर दो।"
लक्ष्मण जी, अंगद, विभीषण और वानर-सेना ने जाकर देखा कि मेघनाद रक्त और भैंस की आहुति दे रहा है। वानरों ने उसका यज्ञ भंग करने के लिए हर उपाय किया, यज्ञ-सामग्री बिखेर दी। मेघनाद क्रोध में भरकर उठा। यह द्वंद्व अत्यंत भीषण था — मेघनाद कभी अदृश्य होकर वार करता, कभी नाना रूप धरकर लड़ता। शत्रु मारे नहीं मर रहा, यह देख कर लक्ष्मण जी अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने वीरोचित प्रण लिया कि आज इसे मारे बिना नहीं लौटूँगा। कोसलपति श्रीराम के प्रताप का स्मरण करके उन्होंने बाण चढ़ाया — बाण छूटते ही मेघनाद "लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं?" कहते हुए धराशायी हो गया और प्राण त्याग दिए।
देवता फूल बरसाकर नगाड़े बजाने लगे — "हे अनंत! आपकी जय हो!" उधर रावण को जब पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला, तो मंदोदरी छाती पीट-पीटकर विलाप करने लगी। पूरे नगर में शोक छा गया।
रावण का उपदेश — एक विरोधाभासी क्षण
भक्तो, यहाँ मानस का एक अत्यंत विचित्र और गहरा क्षण आता है। पुत्र-शोक में डूबी अपनी स्त्रियों को सांत्वना देते हुए रावण ने उन्हें ज्ञान का उपदेश दिया — "सारे संसार का यह रूप नाशवान है, हृदय में विवेक धारण करो।" तुलसीदास जी स्वयं यहाँ टिप्पणी करते हैं — "वह स्वयं तो नीच था, पर उसकी बातें शुभ और पवित्र थीं।" सोचिए भक्तो — जिस व्यक्ति ने पराई स्त्री का हरण किया, अनगिनत निर्दोषों की हत्या की, वह अपनी वाणी में इतना गहरा ज्ञान भी रखता था कि दुःखी स्त्रियों को जीवन की नश्वरता समझा सके। यह हमें बताता है कि ज्ञान होना और उस ज्ञान पर स्वयं आचरण करना — ये दो अलग-अलग बातें हैं। रावण के पास असीम विद्वता थी, पर उसने कभी उसे अपने ही जीवन पर लागू नहीं किया।
सीख: मेघनाद का पतन हमें बताता है कि छल और माया से चाहे जितनी देर तक जीता जाए, अंततः सत्य और धर्म ही विजयी होते हैं — बशर्ते हम लक्ष्मण की तरह धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ डटे रहें। और रावण के इस विरोधाभासी उपदेश से हमें यह गहरी सीख मिलती है — केवल शास्त्र जानना या अच्छी बातें कहना पर्याप्त नहीं, जब तक कि हम स्वयं उन पर चलने का साहस न रखें। ज्ञान और आचरण के बीच की यह खाई ही मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण बनती है।
10. रावण वध
अपने दोनों प्रिय — भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद — को खोकर रावण अब अंतिम युद्ध के लिए स्वयं रणभूमि में उतरा। जब विभीषण ने देखा कि रावण रथ पर सवार है और श्रीराम पैदल ही खड़े हैं, तो वे अधीर होकर बोले — "हे नाथ! आपके पास न रथ है, न कवच और न ही जूते — भला इतने बलवान रावण को कैसे जीता जाएगा?"
धर्म का रथ
यहाँ श्रीराम ने विभीषण को जो उत्तर दिया, वह मानस के सबसे गहरे उपदेशों में से एक है। उन्होंने कहा — "हे सखा! जिस रथ से विजय मिलती है, वह और ही प्रकार का होता है। शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं, सत्य और सदाचार उसकी दृढ़ ध्वजा-पताका हैं। बल, विवेक, संयम और परोपकार — ये उसके चार बलवान घोड़े हैं। क्षमा, दया और समता की रस्सी से वे बँधे हैं। ईश्वर का भजन ही उस रथ का चतुर सारथी है, वैराग्य ढाल है, संतोष तलवार है, दान फरसा है, बुद्धि प्रचंड शक्ति है। ब्राह्मण और गुरु की पूजा ही अभेद्य कवच है — हे सखा! ऐसे जिसके पास ऐसा धर्ममय रथ हो, उसके लिए संसार में जीतने को कोई शत्रु ही शेष नहीं रह जाता।"
भक्तो, सोचिए — कितनी गहरी बात है यह! श्रीराम कह रहे हैं कि असली रथ, असली कवच, असली अस्त्र बाहर के भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर के सद्गुणों में हैं। जिसके पास सत्य, धैर्य, संयम और भगवद्भक्ति है, वह बिना किसी बाहरी हथियार के भी अजेय है।
भीषण अंतिम युद्ध
फिर आरंभ हुआ मानस का सबसे लंबा, सबसे भीषण युद्ध। रावण बार-बार नए रथ मँगवाता, नए अस्त्र चलाता — पर श्रीराम के बाणों के आगे उसका हर प्रयास विफल होता गया। श्रीराम ने उसके सिर काटने आरंभ किए — पर हर बार कटे हुए सिर के स्थान पर नया सिर उग आता! तुलसीदास जी इसकी तुलना बड़ी सुंदरता से करते हैं — "ज्यों-ज्यों प्रभु उसके सिर काटते हैं त्यों-त्यों वे और भी बढ़ते जाते हैं — ठीक वैसे ही जैसे हर लाभ के साथ लोभ बढ़ता जाता है।" भक्तो, यह उपमा कितनी सटीक है — रावण का यह अनंत सिर-समूह मानो स्वयं मनुष्य के अनंत लोभ का प्रतीक बन जाता है, जो जितना पाता है उतना ही और माँगता है।
यह देखकर श्रीराम स्वयं मुस्कुराए — वे जानते थे कि केवल सिर काटने से यह युद्ध समाप्त नहीं होगा। तब विभीषण ने आगे बढ़कर वह गुप्त रहस्य बताया जो केवल वे ही जानते थे — "हे नाथ! इसकी नाभि में अमृत का कुंड है, उसी अमृत के बल पर यह जीवित है।"
यह सुनते ही श्रीराम ने अपना धनुष कान तक खींचकर इकतीस बाण छोड़े — एक बाण ने सीधे नाभि के अमृत-कुंड को सोख लिया, बाकी बाण उसकी भुजाओं और सिरों में जा लगे। जैसे ही अमृत सूखा, रावण का शरीर असहाय हो उठा। धड़ प्रचंड वेग से दौड़ने लगा, जिससे धरती डँसने लगी — तभी श्रीराम ने एक अंतिम बाण से उसके दो टुकड़े कर दिए। मरते-मरते भी रावण घोर गर्जना के साथ चिल्लाया — "राम कहाँ हैं, मैं उन्हें ललकारकर युद्ध में मार डालूँ!" — यह उसका अंतिम श्वास था, अंतिम शब्द भी युद्ध की ही ललकार।
रावण के गिरते ही धरती डोल उठी, समुद्र-नदियाँ, दिग्गज और पर्वत सब क्षुब्ध हो गए। रावण का सारा तेज प्रभु के मुख में समा गया — यह देखकर शिव और ब्रह्मा हर्षित हुए। ब्रह्मांडभर "जय-जय" की ध्वनि से गूँज उठा।
मंदोदरी का विलाप — शत्रु की महानता का सम्मान
पति का सिर देखते ही मंदोदरी मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। स्त्रियाँ रोती हुई दौड़ीं। मंदोदरी ने रावण के प्रति जो विलाप किया, वह पीड़ा और सच्चाई का अद्भुत मिश्रण है — "तुम्हारे बल से धरती सदा काँपती थी, अग्नि-चंद्र-सूर्य तक तुम्हारे आगे फीके पड़ जाते थे। शेषनाग और कच्छप तक जिस भार को न सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूल में लथपथ पड़ा है! वरुण, कुबेर, इंद्र, वायु — इनमें कोई भी रण में तुम्हारे सामने टिक न सका। पर श्रीराम से विमुख होने के कारण ही तुम्हारी यह दशा हुई — काल के वश में होने के कारण तुमने किसी का कहा नहीं माना, और चराचर के स्वामी परमात्मा को साधारण मनुष्य समझ बैठे। हाय नाथ! श्रीरघुनाथ जी के समान करुणासागर दूसरा कोई नहीं, जिन भगवान ने तुम्हें वह गति दी जो योगियों को भी दुर्लभ है।"
भक्तो, यह विलाप केवल शोक नहीं है — यह रावण की सच्ची महानता और उसके पतन, दोनों को एक साथ स्वीकार करता है। मंदोदरी अपने पति की अपार शक्ति और गौरव को नकारती नहीं, बल्कि यह स्वीकार करती है कि वह शक्ति भी अहंकार और अधर्म के आगे व्यर्थ हो गयी।
श्रीराम का शत्रु के प्रति सम्मान
रावण की मृत्यु के बाद श्रीराम ने विभीषण को आज्ञा दी कि वे शोक त्यागकर अपने भाई की अंत्येष्टि विधिपूर्वक संपन्न करें। भक्तो, यहीं छिपा है इस पूरे युद्ध का सबसे गहरा संदेश — श्रीराम ने रावण को केवल एक शत्रु के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसकी विद्वता, उसके तप, उसकी अद्भुत शक्ति को भी स्वीकार किया। रामकथा की व्यापक परंपरा में यह भी कहा जाता है कि युद्ध के बाद स्वयं श्रीराम ने लक्ष्मण को यह कहकर रावण के पास भेजा कि "जाओ, मरणासन्न रावण से राजनीति और शास्त्र का ज्ञान ग्रहण करो — क्योंकि विद्वता किसी की शत्रुता से कम नहीं होती।" लक्ष्मण ने जाकर रावण के शीश के पास खड़े होकर विनम्रता से ज्ञान माँगा, और रावण ने, मृत्यु के अंतिम क्षणों में भी, राजनीति के अनमोल सूत्र उन्हें सौंपे।
भक्तो, सोचिए — कितनी बड़ी बात है यह! जिस रावण का अभी-अभी वध हुआ था, उसी की विद्वता का सम्मान करते हुए श्रीराम अपने भाई को उससे सीखने भेजते हैं। यही सच्ची विजय है — शत्रु को नष्ट करना पर्याप्त नहीं, उसकी जो भी सच्ची योग्यता हो उसे स्वीकार करना और उससे सीखना भी उतना ही आवश्यक है।
सीख: रावण वध हमें कई गहरी सीख देता है — पहली, अहंकार और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली प्रतीत हों, अंततः धर्म के सामने टिक नहीं पाते। दूसरी, सिर काटने से अनंत बढ़ता हुआ लोभ हमें बताता है कि जब तक हम इच्छाओं की जड़ (नाभि-कुंड) को न पहचानें, तब तक ऊपरी लक्षणों से लड़ना व्यर्थ है। और सबसे गहरी सीख — सच्ची महानता वह है जो अपने सबसे बड़े शत्रु में भी जो कुछ श्रेष्ठ हो, उसे पहचान सके और सम्मान दे सके। द्वेष और शत्रुता में भी उदारता बनाए रखना ही सबसे बड़ी वीरता है।
11. विभीषण राज्याभिषेक
युद्ध समाप्त होने के बाद विभीषण जी शोकाकुल होकर श्रीराम के पास आए। उन्होंने विनती की — "हे प्रभु! अब मेरे इस सेवक के घर को पवित्र कीजिए, वहाँ स्नान कीजिए, जिससे युद्ध की थकान मिटे। फिर मुझे साथ लेकर अयोध्या पधारिए।" श्रीराम ने अत्यंत स्नेह से कहा — "हे भाई! तुम्हारा खजाना-घर सब मेरा ही है, यह सच है, पर भरत की दशा का स्मरण करके मुझे लंका में प्रवेश करना उचित नहीं जान पड़ता — वे तपस्वी के वेष में कृश शरीर से निरंतर मेरा ही नाम जप रहे हैं। यदि अवधि बीतने के बाद पहुँचूँ तो शायद भाई को जीवित न पाऊँ।"
फिर श्रीराम ने लक्ष्मण, सुग्रीव, अंगद, नल-नील, जाम्बवान और हनुमान को बुलाकर आज्ञा दी — "तुम सब मिलकर विभीषण के साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो। पिताजी के वचन के कारण मैं स्वयं नगर में नहीं जा सकता, पर अपने ही समान वानर और अपने भाई को भेज रहा हूँ।" वानरों ने तुरंत जाकर राजतिलक का सारा विधान संपन्न किया — आदरपूर्वक विभीषण को सिंहासन पर बैठाकर तिलक किया।
भक्तो, इस एक छोटे-से प्रसंग में कितना बड़ा संदेश छिपा है — श्रीराम ने लंका पर विजय पाकर उसे स्वयं नहीं रखा, न ही अपने किसी वानर-सखा को वहाँ का राजा बनाया। उन्होंने वह राज्य उसी को सौंपा जिसने धर्म के लिए अपना परिवार, अपना कुल, अपनी सुरक्षा — सब कुछ त्याग दिया था।
सीख: विभीषण का यह राज्याभिषेक हमें सिखाता है कि विजय का उद्देश्य कभी सत्ता हथियाना नहीं होना चाहिए, बल्कि धर्म की स्थापना होना चाहिए। श्रीराम ने वह राज्य उसे सौंपा जो सबसे अधिक योग्य और धर्मनिष्ठ था, न कि किसी निजी स्वार्थ या पक्षपात से। और विभीषण का जीवन यह भी सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर चलने के लिए कभी-कभी अपने ही परिवार और अपनी सुरक्षा को दाँव पर लगाना पड़ता है — पर अंततः धर्म ही सबसे बड़ा फल देता है।
12. सीता अग्निपरीक्षा
अब आती है मानस के सबसे मार्मिक, सबसे विचारणीय प्रसंगों में से एक की बारी। श्रीराम ने हनुमान जी को लंका भेजा कि जाकर सीता को सारा समाचार सुनाएँ। सीता जी हर्ष से भर उठीं और कहा — "हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं अपनी आँखों से प्रभु के कोमल श्याम शरीर के दर्शन कर सकूँ।"
श्रीराम ने अंगद और विभीषण को भेजकर सीता जी को आदरपूर्वक लिवा लाने को कहा। जब सीता जी को पालकी में सजाकर लाया जाने लगा, तो श्रीराम ने कहा — "हे मित्र! मेरा कहना मानो, सीता को पैदल ही ले आओ, जिससे वानर उन्हें माता के समान दर्शन कर सकें।" यह प्रभु की एक विनम्र इच्छा थी — कि उनकी विजय का श्रेय पानेवाले सभी वानर-भालू माता सीता के दर्शन बिना किसी आड़ के पा सकें।
प्रभु के कठोर वचन
पर इसके बाद जो हुआ, भक्तो, वह मानस का सबसे अधिक विचार और वाद-विवाद माँगने वाला प्रसंग है। जब सीता जी श्रीराम के सामने आयीं, तो करुणानिधान श्रीराम ने, तुलसीदास जी के अपने शब्दों में, "लीलावश कुछ कठोर वचन" कहे — उन्होंने सबके सामने यह प्रश्न उठाया कि इतने समय रावण की बंदी रहकर सीता की पवित्रता पर अब लोक-समाज क्या कहेगा।
भक्तो, यहाँ रुककर एक बहुत ज़रूरी बात समझनी चाहिए — मानस स्वयं यह स्पष्ट करता है कि यह श्रीराम का निजी संदेह नहीं था, यह "लीला" थी — अर्थात यह प्रश्न उन्होंने अपने हृदय के संदेह से नहीं, बल्कि इसलिए उठाया ताकि सीता जी की पवित्रता संसार के सामने, समाज के सामने सदा के लिए असंदिग्ध सिद्ध हो जाए। एक राजा के रूप में, जिनकी हर बात भावी प्रजा के लिए आदर्श बननी थी, उन्हें यह सुनिश्चित करना था कि आने वाली पीढ़ियाँ कभी सीता की पवित्रता पर उँगली न उठा सकें।
सीता जी ने मन-वचन-कर्म से पवित्र होकर लक्ष्मण से कहा — "हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्म के साक्षी बनो" — और अग्नि प्रज्वलित करने को कहा। श्रीराम का रुख देखकर लक्ष्मण दौड़े और अग्नि प्रज्वलित करके बहुत-सी लकड़ियाँ ले आए। सीता जी ने अग्नि के समक्ष खड़े होकर कहा — "यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्रीरघुवीर को छोड़कर दूसरा कोई आश्रय न हो, तो हे अग्निदेव! आप स्वयं मेरी साक्षी दीजिए" — और वे निर्भय होकर धधकती अग्नि में प्रवेश कर गयीं।
अग्निदेव का साक्ष्य
तब स्वयं अग्निदेव ने शरीर धारण कर, वेद और जगत में विख्यात असली सीता जी का हाथ पकड़कर उन्हें श्रीराम को सौंप दिया — वे बिल्कुल सुरक्षित, अक्षत, अपने उसी दिव्य रूप में लौट आयीं। देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे, आकाश में नगाड़े बज उठे, किन्नर गाने लगे। जानकी जी सहित प्रभु की अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्ष से भर उठे।
भक्तो, इस प्रसंग को लेकर सदियों से भक्तों और विद्वानों के मन में गहरी बेचैनी रही है, और यह स्वाभाविक भी है। यह प्रश्न आज भी उठता है — क्या श्रीराम, जो स्वयं जानते थे कि सीता पूर्ण रूप से पवित्र हैं, उन्हें ऐसी परीक्षा से गुज़रने के लिए बाध्य करना उचित था? क्या यह सीता के प्रति अन्याय नहीं था? मैं इस प्रश्न को छोटा करके नहीं दिखाना चाहता — यह वास्तव में एक कठिन, गहरा और आज भी जीवंत बहस का विषय है। मानस स्वयं इसे "लीला" कहकर, अर्थात प्रभु के आंतरिक संदेह के बजाय एक बड़े सामाजिक-धार्मिक उद्देश्य के रूप में प्रस्तुत करता है — पर इससे सीता जी को जो पीड़ा सहनी पड़ी, वह किसी भी व्याख्या से कम नहीं हो जाती।
सीख: भक्तो, इस प्रसंग पर मैं आपको कोई सरल उत्तर नहीं दूँगा, क्योंकि सच्चाई यही है कि यह प्रसंग सरल नहीं है। इससे हमें जो सबसे ईमानदार सीख मिलती है, वह यह है — जब समाज किसी निर्दोष व्यक्ति, विशेषकर किसी स्त्री, पर संदेह करता है, तो उस संदेह का बोझ अक्सर सबसे अधिक उसी निर्दोष व्यक्ति को उठाना पड़ता है, चाहे न्याय अंततः उसके पक्ष में ही क्यों न आए। यह हमें सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत पीड़ा के बीच के उस कठिन तनाव को समझने के लिए प्रेरित करता है, जिससे आज भी अनगिनत लोग गुज़रते हैं। हमें इस कथा से यह सीखना चाहिए कि हम स्वयं कभी किसी निर्दोष को केवल समाज के दबाव में संदेह की दृष्टि से न देखें — और अग्निदेव का यह साक्ष्य हमें यह भी स्मरण कराता है कि सत्य अंततः स्वयं ही प्रकट हो जाता है, चाहे उसे प्रकट होने में कितनी ही पीड़ा और समय क्यों न लगे।
13. पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान
अब आ गया वह सुखद क्षण जिसकी प्रतीक्षा चौदह वर्षों से हो रही थी — घर वापसी की। विभीषण जी ने अपने महल को रत्नों और वस्त्रों से भरकर पुष्पक विमान श्रीराम के सामने ला रखा। श्रीराम ने सभी वानर-भालुओं को भी बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण भेंट किए — जिनके मन को जो भाया, उन्होंने वही ले लिया। कुछ भोले वानर तो मणियों को मुँह में रखकर खाने की चीज़ समझ बैठे, यह देखकर सब हँस पड़े। ऐसे कोमल, विनोदपूर्ण दृश्यों के बीच युद्ध की सारी विभीषिका मानो धुल गयी।
श्रीराम ने वानरों से कहा — "अब तुम सब अपने-अपने घर जाओ।" पर यह सुनते ही सभी वानर लज्जा और प्रेम से भर उठे — "प्रभु! भला मच्छर कहीं गरुड़ का हित कर सकता है? आपके ये वचन सुनकर हमें मोह होता है — हम आपके बिना कैसे रहेंगे?" उनका यह अपार प्रेम देखकर श्रीराम ने सबको ही विमान पर चढ़ा लिया और अपने साथ अयोध्या ले चलने का निश्चय किया। भक्तो, सोचिए — जिन वानरों ने युद्ध में अपना सब कुछ लगाया, श्रीराम ने उन्हें अंत में छोड़ा नहीं, बल्कि अपने साथ अपने घर ले चले — यही तो सच्चा नेतृत्व है, अपने साथियों को अंत तक साथ रखना।
आकाश से यात्रा — स्मृतियों का पुनरावलोकन
विमान चलते ही चारों ओर "रघुवीर की जय" गूँज उठी। रास्ते में श्रीराम ने सीता जी को ऊपर से नीचे झाँककर सारी युद्धभूमि दिखायी — "हे सीते! यह रणभूमि देखो, यहाँ लक्ष्मण ने इंद्रजीत मेघनाद को मारा था, यहीं देवताओं और मुनियों को संतप्त करने वाले कुंभकर्ण और रावण, दोनों भाई मारे गए। यहाँ मैंने सेतु बँधवाया और सुखधाम शिवजी की स्थापना की थी।" फिर उन्होंने वे सारे स्थान भी दिखाए जहाँ-जहाँ वनवास के दौरान उन्होंने निवास और विश्राम किया था — पंचवटी, दंडकवन, चित्रकूट, अगस्त्य मुनि का आश्रम।
विमान यमुना जी के दर्शन कराता हुआ, फिर तीर्थराज प्रयाग के दर्शन कराता हुआ, अंततः पवित्र अयोध्यापुरी के निकट पहुँचा। सीता सहित कृपालु श्रीराम ने दूर से ही अयोध्या को प्रणाम किया — उनके नेत्र भर आए, शरीर बार-बार पुलकित हो उठा। चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण हो चुका था।
भरद्वाज मुनि और निषादराज गुह से भेंट
श्रीराम त्रिवेणी में उतरे, भरद्वाज मुनि के दर्शन किए, फिर हनुमान जी को ब्रह्मचारी के वेश में आगे भेजा ताकि भरत को कुशल-समाचार मिल जाए और वे किसी अनहोनी की आशंका में व्याकुल न रहें। इधर निषादराज गुह, जिन्होंने वनगमन के समय श्रीराम को गंगा पार करायी थी, विमान को देखते ही समझ गए कि यही उनके प्रिय राम लौट रहे हैं — वे आनंदमग्न होकर धरती पर गिर पड़े, उन्हें देह की सुध तक न रही। श्रीराम ने उस अत्यंत सामान्य कुल के निषादराज को भी भरत के समान ही हृदय से लगा लिया।
तुलसीदास जी यहाँ मार्मिक स्वर में कहते हैं — "सर्वथा नीच उस निषाद को भी प्रभु ने भरत की ही भाँति हृदय से लगा लिया।" भक्तो, यह छोटा-सा वाक्य पूरे मानस के सबसे बड़े संदेशों में से एक छिपाए हुए है — श्रीराम के हृदय में कुल, जाति, पद का कोई भेद नहीं था; प्रेम और भक्ति ही एकमात्र मापदंड था।
सीख: यह घर-वापसी हमें सिखाती है कि सफलता की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं कि हमने कितना जीता, बल्कि यह है कि हम अपने साथ चलने वालों को कैसे साथ रखते हैं। श्रीराम ने विजय के इस क्षण में भी अपने वानर-मित्रों को नहीं छोड़ा, निषादराज जैसे सामान्य कुल के मित्र को भी उतना ही स्नेह दिया जितना अपने सगे भाई भरत को। जीवन में जब आप ऊँचाई पर पहुँचें, तो अपने उन साथियों को कभी मत भूलिए जिन्होंने आपके संघर्ष में साथ दिया — चाहे वे कितने ही "छोटे" या "साधारण" क्यों न प्रतीत हों।
14. उपसंहार — संपूर्ण लंकाकाण्ड का सार
भक्तो, अब हम पीछे मुड़कर देखें तो पूरा लंकाकाण्ड हमारे सामने एक विशाल, प्रचंड युद्ध-चित्र की भाँति खुलता है — पर इसके भीतर छिपे हैं जीवन के सबसे गहरे सत्य।
सेतु-बंधन और गिलहरी का प्रसंग हमें सिखाता है कि भक्ति और सेवा में योगदान का आकार नहीं, भाव मायने रखता है — एक नन्ही गिलहरी का समर्पण भी प्रभु की दृष्टि में उतना ही मूल्यवान है जितना किसी विशालकाय वानर का। अंगद का चरण-प्रसंग हमें बताता है कि सत्य और धर्म पर अडिग खड़े रहना ही सच्ची शक्ति है। कुंभकर्ण का चरित्र हमें एक कठिन सत्य से परिचित कराता है — कि अंधी वफ़ादारी और सच्ची निष्ठा में भेद है, और यह भेद पहचानना हर मनुष्य का कर्तव्य है। मेघनाद का पतन बताता है कि छल और माया चाहे जितनी शक्तिशाली हों, अंततः सत्य के आगे टिक नहीं पातीं। और रावण-वध हमें सिखाता है कि सच्ची विजय वह है जो शत्रु को नष्ट करके भी उसकी महानता और सच्ची योग्यता का सम्मान करना जानती है — यही कारण था कि श्रीराम ने रावण की अंत्येष्टि का आदेश दिया, और उसकी विद्वता से सीखने की भी बात कही।
संजीवनी बूटी और भरत-हनुमान का प्रसंग हमें बताता है कि संकट की घड़ी में झिझकने के बजाय पूरे साहस से निर्णायक कदम उठाना चाहिए। और सीता की अग्निपरीक्षा — भक्तो, इसे मैं आपसे छिपाना नहीं चाहता — यह प्रसंग आज भी हमें असहज करता है, प्रश्न पूछने को विवश करता है, और यही उचित भी है। हर पवित्र ग्रंथ हमसे यही चाहता है कि हम उसे अंधश्रद्धा से नहीं, विवेक और संवेदनशीलता से पढ़ें।
अंततः, पुष्पक विमान की यह यात्रा हमें बताती है कि विजय का सच्चा अर्थ है — अपने साथियों को साथ लेकर लौटना, चाहे वे कितने ही "छोटे" क्यों न हों। चौदह वर्षों का वनवास, इतना बड़ा युद्ध, इतनी पीड़ा — सब कुछ इसी एक क्षण के लिए था, जब श्रीराम अपनी प्रजा के बीच, अपने भाइयों के बीच, अपनी अयोध्या में पुनः लौट रहे थे।
जय श्री सीताराम! भक्तो, अगले काण्ड — उत्तरकाण्ड — में हम देखेंगे भरत का वह अटूट प्रेम जब चौदह वर्षों की प्रतीक्षा के बाद अंततः भाइयों का मिलन होता है, श्रीराम का भव्य राज्याभिषेक, और वह स्वप्निल "राम राज्य" जिसकी कल्पना आज भी हर भारतीय के हृदय में बसती है — जहाँ न कोई दुःखी था, न कोई रोगी, न कोई असंतुष्ट। वहाँ हम यह भी देखेंगे कि सुख के इस चरम शिखर पर भी श्रीराम को कैसी-कैसी कठिन परीक्षाओं से गुज़रना पड़ा — क्योंकि मर्यादा पुरुषोत्तम का जीवन कभी भी केवल सुखांत नहीं होता, वह सदा हमें कर्तव्य और त्याग का सर्वोच्च आदर्श सिखाता रहता है।
॥ जय श्री सीताराम ॥