सप्तम सोपान

उत्तरकाण्ड

अयोध्या वापसी, राज्याभिषेक एवं रामराज्य की कथा।

1. मंगलाचरण

तुलसीदास जी उत्तरकाण्ड का आरंभ भी, अपनी परंपरा के अनुसार, मंगलाचरण से करते हैं। वे संस्कृत के श्लोकों में उस दृश्य को प्रणाम करते हैं जिससे यह काण्ड खुलता है — मोर के कंठ-सी नीली आभावाले, ऋषि के चरण-चिह्न से अंकित, पीताम्बरधारी, कमलनयन, सदा प्रसन्नचित्त, हाथ में धनुष-बाण लिए, वानरों की सेना से घिरे और भाई लक्ष्मण से सेवित, पुष्पक विमान पर विराजमान श्रीरघुनाथ को वे बारंबार नमन करते हैं। फिर वे कोसलनरेश के उन सुकुमार चरण-कमलों को प्रणाम करते हैं जिन्हें ब्रह्मा और शिव स्वयं वंदन करते हैं, और अंत में भगवान शिव को — जो पार्वती के स्वामी, करुणा के सागर और कामदेव को भस्म करनेवाले हैं। सोचिए भक्तो — कथा के आरंभ में ही तुलसीदास जी शिव को क्यों स्मरण करते हैं? क्योंकि आगे जो कथा आने वाली है, वह मूलतः शिव जी की ही वाणी है — वही कथा जो उन्होंने कैलाश पर माता पार्वती को सुनाई थी, और जिसके भीतर एक और कथा छिपी है — काकभुशुण्डि और गरुड़ के संवाद की कथा। एक कथा के भीतर कथा, और उसके भीतर फिर एक कथा — मानो दर्पणों की एक शृंखला हो, जिसमें झाँकते-झाँकते हम अंततः अपने ही भीतर झाँकने लगते हैं। सीख: किसी भी बड़े कार्य या यात्रा के अंत में भी, उतनी ही विनम्रता और स्मरण-भाव चाहिए जितना आरंभ में था। जीवन की सबसे बड़ी सफलताओं के क्षण में भी सिर झुकाना न भूलें — क्योंकि वही विनम्रता हमें अगली, और भी गहरी सीख के लिए तैयार करती है।

2. अयोध्या आगमन

भरत की प्रतीक्षा भक्तो, जिस समय श्रीराम पुष्पक विमान पर बैठकर आकाश-मार्ग से लौट रहे थे, ठीक उसी समय अयोध्या में एक हृदय ऐसा था जो चौदह वर्षों से क्षण-क्षण गिन रहा था। वनवास की अवधि का अंतिम दिन आ पहुँचा था। अवध के नर-नारी विरह में दुबले हो चुके थे। शुभ शकुन होने लगे थे — भरत का दायाँ नेत्र और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही थी, और यह शुभ संकेत जानकर उनका मन क्षण भर के लिए हर्ष से भर उठा। पर दिन बीतता गया, और प्रभु नहीं लौटे। भरत का हृदय व्याकुलता से भर उठा। वे सोचने लगे — "लक्ष्मण सचमुच धन्य हैं, जो कभी प्रभु के चरणों से अलग नहीं हुए। मुझे ही शायद कपटी और कुटिल समझकर उन्होंने भुला दिया।" फिर वे स्वयं को धीरज बँधाते — "यदि मेरे कर्मों को तौला जाय तो करोड़ों कल्पों में भी मेरा उद्धार संभव नहीं, फिर भी यह भरोसा है कि वे सेवक का दोष कभी हृदय में नहीं रखते।" और अंत में, भक्तो, वे यह भी कह उठे — "यदि आज की अवधि बीत गई और वे न लौटे, तो संसार में मुझसे नीच कोई न होगा" — यह भरत का वह मौन संकल्प था कि प्रभु के बिना जीवन उनके लिए असंभव है। सोचिए भक्तो — भरत चौदह वर्षों तक नंदिग्राम में तपस्वी का जीवन जीते रहे, राजसिंहासन पर श्रीराम की खड़ाऊँ रखकर स्वयं को केवल उनका सेवक मानते रहे। यह कोई साधारण प्रतीक्षा नहीं थी — यह प्रेम की वह पराकाष्ठा थी जहाँ प्रतीक्षा करनेवाला स्वयं को भूल जाता है। हनुमान का शुभ समाचार ठीक उसी क्षण, जब भरत विरह के सागर में डूबते जा रहे थे, हनुमान जी ब्राह्मण का वेश धरकर वहाँ आ पहुँचे — मानो डूबते हुए के लिए कोई नाव आ लगी हो। उन्होंने देखा — भरत कुश के आसन पर बैठे हैं, जटाओं का मुकुट बना है, शरीर क्षीण हो चुका है, और नेत्रों से अश्रु बहाते हुए वे निरंतर "राम राम" रट रहे हैं। भरत को देखते ही हनुमान जी का हृदय हर्ष से उमड़ पड़ा। उन्होंने अमृत-सी मधुर वाणी में कहा — "जिनके वियोग में आप रात-दिन घुलते रहते हैं, वे ही रघुकुलतिलक, सीता-लक्ष्मण सहित, शत्रु को परास्त करके कुशलपूर्वक लौट रहे हैं!" यह सुनते ही भरत का सारा दुःख वैसे ही विलीन हो गया जैसे प्यासे को अमृत मिलते ही तृष्णा शांत हो जाती है। चकित भरत ने पूछा — "तुम कौन हो?" हनुमान जी ने उत्तर दिया — "मैं वायुपुत्र हनुमान हूँ, उन्हीं दीनबंधु रघुनाथ का सेवक।" यह सुनते ही भरत बड़े आदर से उनसे गले मिले — इस मिलन में प्रेम हृदय में समाता न था। भरत ने कहा — "तुम्हारे दर्शन से ही मानो मुझे साक्षात् प्रिय राम मिल गए हों! बताओ, इस समाचार के बदले तुम्हें क्या दूँ?" फिर स्वयं ही कह उठे — "इस समाचार के समान संसार में कुछ भी नहीं, मैं तुमसे कभी उऋण नहीं हो सकता।" भरत ने बड़ी विनम्रता से पूछा — "हे कपि, क्या कृपालु स्वामी मुझे भी कभी अपने दास की भाँति स्मरण करते हैं?" इतने विनम्र वचन सुनकर हनुमान जी पुलकित होकर उनके चरणों में गिर पड़े। उन्होंने कहा — "आप श्रीराम को प्राणों से भी प्रिय हैं, यह मेरा सत्य वचन है।" नगर में मिलन हनुमान जी तुरंत लौटकर श्रीराम के पास पहुँचे और सारा समाचार सुनाया। प्रभु हर्षित होकर विमान पर सवार हो चल पड़े। इधर भरत भी प्रसन्न मन अयोध्या लौटे और गुरु वशिष्ठ को समाचार सुनाया। यह सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं, नगरवासी स्त्री-पुरुष हर्ष से भरकर दौड़ पड़े। सुहागिन स्त्रियाँ दही, दूब, फल-फूल और तुलसीदल सोने के थालों में भरकर मंगल-गीत गाती हुई चल पड़ीं। हर कोई जिस दशा में था उसी दशा में दौड़ पड़ा — न बालकों की सुध रही, न वृद्धों की। एक-दूसरे से बस यही पूछते जाते — "भाई, तुमने दयालु रघुनाथ को देखा क्या?" प्रभु के आगमन का समाचार पाकर अवधपुरी मानो स्वयं शोभा की खान बन गई — सरयू का जल अपने-आप निर्मल हो उठा। स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़कर आकाश में आते विमान को निहारने लगीं। श्रीराम मानो पूर्णिमा के चंद्रमा हैं और अयोध्या समुद्र, जो उन्हें देखकर हर्ष से उमड़ पड़ा है। और भक्तो, यहाँ एक अत्यंत मार्मिक क्षण आता है — आकाश से श्रीराम स्वयं सुग्रीव, अंगद और विभीषण को अपनी नगरी दिखाते हुए कहते हैं — "वेद-पुराणों में भले ही वैकुण्ठ की बड़ाई गाई गई हो, पर यह अवधपुरी मुझे उतनी ही प्रिय है — यह भेद विरले ही जानते हैं। यहाँ के निवासी मुझे विशेष प्रिय हैं।" सोचिए भक्तो — साक्षात् परब्रह्म, जिनका धाम वैकुण्ठ है, वे अपनी जन्मभूमि के लिए ऐसा प्रेम व्यक्त करते हैं। यह हमें सिखाता है कि चाहे हम जीवन में कितनी भी ऊँचाई पा लें, अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता कभी न भूलें। विमान उतरा। प्रभु ने पुष्पक को धन्यवाद देकर कुबेर के पास लौटा दिया। फिर गुरु वशिष्ठ को देखते ही उन्होंने धनुष-बाण भूमि पर रख दिए और लक्ष्मण सहित दौड़कर गुरु के चरण पकड़ लिए। और फिर वह क्षण आया जिसकी भरत चौदह वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे — भरत भूमि पर गिरकर उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे, अंततः कृपासिंधु ने बलपूर्वक उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। दोनों भाइयों के नेत्रों से अश्रुओं की बाढ़ आ गई, शरीर रोमांच से भर उठे। शिव जी कहते हैं — "हे उमा, वह सुख वाणी और मन से परे है, उसे वही जानता है जो उसे भोगता है।" फिर एक अद्भुत लीला हुई — करुणामय श्रीराम ने देखा कि समूचा नगर, हर स्त्री-पुरुष, प्रेम-विह्वल होकर मिलना चाहता है। तो उसी क्षण वे असंख्य रूपों में प्रकट हो गए और सबसे यथायोग्य मिले, अपनी कृपादृष्टि से सबको शोकरहित कर दिया। यह रहस्य किसी को समझ में नहीं आया — शिव जी कहते हैं, यह भगवान की माया की वह लीला है जो प्रेम के आगे असंभव को भी संभव बना देती है। तीन माताओं का आँचल और अब वह दृश्य, भक्तो, जो शायद पूरे उत्तरकाण्ड का सबसे कोमल क्षण है — कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा, तीनों माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नई ब्याई गौएँ अपने बछड़ों को देखकर दौड़ पड़ी हों। जैसे गौएँ दिनभर विवश होकर वन में चरती हैं, और साँझ ढलते ही गाँव की ओर देख हुंकार भरती, थनों से दूध टपकाती दौड़ पड़ती हैं — वैसे ही अपार प्रेम से प्रभु सब माताओं से मिले। सुमित्रा अपने पुत्र लक्ष्मण की श्रीराम के चरणों में अटूट प्रीति देखकर उनसे गले मिलीं। और जब श्रीराम कैकेयी से मिलने बढ़े, तो उनका हृदय संकोच से भर उठा — भक्तो, याद कीजिए, यही वह माता थीं जिनकी मांग के कारण श्रीराम को वनवास मिला था। पर प्रभु ने बिना किसी शिकायत, बिना किसी उलाहने के, उसी प्रेम से उनसे भेंट की। लक्ष्मण भी सब माताओं से मिलकर आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए; कैकेयी से भी वे बार-बार मिले, पर उनके मन का क्षोभ किसी तरह पूरी तरह शांत नहीं हो रहा था — यह भी एक सहज मानवीय सत्य है, जिसे तुलसीदास जी छिपाते नहीं। सीता जी सब सासुओं से मिलीं, उनके चरणों में लगकर हर्षित हुईं। सासुएँ आशीर्वाद देती हैं — "तुम्हारा सुहाग सदा अटल रहे।" कौसल्या बार-बार अपने पुत्र को निहारती हुई मन-ही-मन सोचती हैं — "इन्होंने लंकापति को आखिर कैसे मार डाला? मेरे ये सुकुमार बालक तो अत्यंत कोमल थे!" — एक माँ की यह ममता भरी विस्मयता कितनी सहज, कितनी सुंदर है। फिर पूरा नगर उत्सव में डूब गया — सोने के कलश हर द्वार पर सजे, बंदनवार-ध्वजा-पताकाएँ लहराईं, गलियाँ सुगंध से सिंचाई गईं, मोतियों की रंगोलियाँ रचाई गईं। गुरु वशिष्ठ ने ब्राह्मणों को बुलाकर कहा — "आज हर दृष्टि से शुभ घड़ी है, अब बिना विलंब श्रीराम का राज्याभिषेक कर दें।" प्रभु ने सेवकों को आज्ञा दी कि पहले उनके वानर-सखाओं को स्नान कराया जाय, और फिर स्वयं अपने हाथों से भरत की उलझी जटाएँ सुलझाईं — भक्तो, सोचिए, स्वयं परब्रह्म अपने भाई की जटाएँ अपने हाथों से सुलझा रहे हैं! यह दृश्य करोड़ों शेषनाग भी वर्णन नहीं कर सकते। सीख: इस संपूर्ण प्रसंग से हमें अनेक गहरी सीख मिलती हैं। पहली — भरत की प्रतीक्षा हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम त्याग और धैर्य में ही परिपक्व होता है, वह दिखावे का मोहताज नहीं होता। दूसरी — हनुमान जी का यह क्षण याद दिलाता है कि शुभ समाचार लाने वाला दूत भी उतना ही आदर पाता है जितना समाचार स्वयं, इसलिए किसी की मददगारी को कभी छोटा न समझें। तीसरी, और सबसे गहरी — श्रीराम का कैकेयी से बिना किसी शिकायत के मिलना हमें सिखाता है कि सच्ची क्षमा वह है जो बिना कहे, बिना जताए, केवल व्यवहार से प्रकट हो। परिवार में जो घाव पुराने पड़ चुके हैं, उन्हें बार-बार कुरेदने के बजाय प्रेम से ढकना ही परिपक्वता है।

3. श्रीराम राज्याभिषेक और रामराज्य

राज्याभिषेक राज्याभिषेक की तैयारी होते ही ब्रह्मा, शिव और मुनियों के समूह, विमानों पर सवार होकर देवता उस आनंदकंद के दर्शन के लिए वहाँ आ पहुँचे। गुरु वशिष्ठ ने सूर्य के समान तेजस्वी, अवर्णनीय दिव्य सिंहासन मँगवाया। श्रीराम ने ब्राह्मणों को सिर नवाकर उस पर आसन ग्रहण किया, सीता जी उनके बाईं ओर विराजीं। वेदमंत्रों की ध्वनि गूँज उठी, आकाश में देव-मुनि जय-जयकार करने लगे, गंधर्व-किन्नर गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं। भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, विभीषण, अंगद और हनुमान — सब छत्र, चँवर, धनुष-तलवार लिए शोभायमान खड़े हुए। गुरु वशिष्ठ ने सबसे पहले तिलक किया, फिर सब ब्राह्मणों को भी वैसी अनुमति दी। पुत्र को सिंहासन पर देखकर माताएँ बार-बार आरती उतारने लगीं। और फिर, भक्तो, एक अत्यंत विलक्षण दृश्य घटित हुआ — सब देवता अपनी-अपनी स्तुति करके लौट गए, तभी भाट का वेश धरकर स्वयं चारों वेद वहाँ आए! वे वेद, जो स्वयं ईश्वर को परिभाषित नहीं कर सकते, फिर भी अपनी असीम श्रद्धा से भरकर मनुष्य-वेश में श्रीराम का गुणगान करने आए, और किसी को — यहाँ तक कि स्वयं सर्वज्ञ श्रीराम को भी — उनका भेद प्रकट नहीं होने दिया। उन्होंने स्तुति की — "जय हो, हे सगुण-निर्गुण दोनों रूपोंवाले प्रभु! आपकी दुर्निवार माया के वशीभूत होकर देव, दानव, मनुष्य — सभी काल और कर्म में बँधकर भटकते रहते हैं, पर जिन्हें आपने एक बार भी कृपादृष्टि से देख लिया, वे तीनों तापों से मुक्त हो गए।" फिर शिव जी स्वयं वहाँ आए और गद्गद वाणी में स्तुति करने लगे, उनका शरीर रोमांच से भर उठा। रामराज्य का स्वर्णिम वैभव भक्तो, अब हम उस प्रसंग पर आते हैं जो शायद संपूर्ण भारतीय सभ्यता की सबसे प्रिय, सबसे गहरी कल्पना है — रामराज्य। तुलसीदास जी इसका वर्णन इतने विस्तार और इतनी कोमलता से करते हैं कि सुनते-सुनते हृदय भर आता है। जब राम राजसिंहासन पर विराजे, तीनों लोक हर्ष से भर उठे। रामराज्य में किसी को दैहिक, दैविक या भौतिक — कोई भी ताप न सताता था। सब लोग परस्पर प्रेम करते और अपने-अपने धर्म का पालन करते थे। धर्म अपने चारों चरणों सहित सारे जगत में परिपूर्ण था — स्वप्न में भी पाप नहीं था। किसी की अकाल मृत्यु न होती, किसी को कोई पीड़ा न होती। न कोई दरिद्र था, न दुखी, न दीन, न मूर्ख। सब दंभरहित, धर्मपरायण, गुणवान और कृतज्ञ थे — किसी में कपट या धूर्तता नहीं थी। और भक्तो, ध्यान दीजिए इस अद्भुत पंक्ति पर — रामराज्य में "दंड" शब्द केवल संन्यासियों के हाथ की छड़ी के अर्थ में सुनाई पड़ता था, "भेद" शब्द केवल नृत्य की लय के अर्थ में, और "जीतना" शब्द केवल अपने ही मन को जीतने के अर्थ में! यानी दंड देने, भेदभाव करने और किसी को पराजित करने जैसी कोई अवधारणा ही शेष नहीं रही थी — शब्द बचे रहे, पर उनके बुरे अर्थ लुप्त हो गए। कैसी अद्भुत कल्पना है यह! वनों में वृक्ष सदा फूलते-फलते रहते, हाथी और सिंह साथ-साथ विचरते, पक्षी-पशु अपना स्वाभाविक बैर भुलाकर प्रेम करते। लताएँ माँगते ही मधु टपका देतीं, गौएँ मनचाहा दूध देतीं, धरती सदा फसल से लहलहाती। पर्वतों ने रत्नों की खानें प्रकट कर दीं, नदियाँ शीतल-निर्मल जल बहाने लगीं, समुद्र अपनी सीमा में रहकर किनारों पर रत्न बिखेर देते। और सबसे सुंदर — चंद्रमा उतनी ही चाँदनी बिखेरता जितनी आवश्यक हो, सूर्य उतना ही तपता जितना चाहिए, बादल माँगने पर ही जल बरसाते। प्रकृति स्वयं संयम और संतुलन में जीने लगी थी। सीता जी, जो स्वयं लक्ष्मी हैं, जिनकी एक कृपादृष्टि के लिए देवता तरसते हैं, वे स्वयं अपने हाथों घर की सेवा करतीं, बिना किसी अभिमान के सासुओं की सेवा करतीं। सोचिए भक्तो — घर में अनगिनत दास-दासियाँ सेवा में कुशल थीं, फिर भी सीता जी स्वयं सेवा करना चुनती हैं, क्योंकि वे जानती थीं कि सेवा का असली सुख कहीं और नहीं, विनम्रता में ही है। अयोध्या नगरी का वैभव भी अवर्णनीय था — सोने-रत्नों से जड़ी अटारियाँ, स्फटिक के आँगन, हीरे जड़े द्वार। हर घर में एक चित्रशाला थी जिसमें श्रीराम के चरित्र चित्रित थे। बगीचे सदा वसंत-सा खिले रहते, बालक तोता-मैना को "राम", "रघुपति" बोलना सिखाते। बाजारों में वस्तुएँ मानो बिना मोल के मिल जातीं — इतनी समृद्धि थी। सरयू के तट पर अलग-अलग घाट थे — हाथी-घोड़ों के लिए, स्त्रियों के लिए, और राजघाट जहाँ चारों वर्ण के लोग साथ स्नान करते। और नगर की गलियों में लोग एक-दूसरे को यही सिखाते फिरते — "शरणागत के पालक, शोभा-शील-रूप-गुण के धाम रामको भजो... संशय और शोक के अंधकार का नाश करनेवाले सूर्यरूप रामको भजो..." — पूरा नगर मानो एक सतत भजन में डूबा हुआ था। एक दिन सनकादि मुनि — जो देखने में बालक जैसे पर आयु में अत्यंत प्राचीन थे, साक्षात् चारों वेदों का बाल-रूप — श्रीराम के दर्शन को पहुँचे। प्रभु ने हर्षित होकर दंडवत की, अपना पीताम्बर बिछाकर उन्हें बिठाया। मुनि श्रीराम की छवि में इतने डूब गए कि पलक तक न झपकाई, और प्रभु स्वयं हाथ जोड़े उन्हें सिर नवाते रहे। यह देखकर स्वयं श्रीराम के नेत्रों से भी अश्रु बह चले — "आज मैं धन्य हूँ, आपके दर्शनमात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं," प्रभु ने कहा। संत-असंत का उपदेश फिर एक कोमल क्षण आया — भरत, कुछ पूछना चाहते थे पर संकोचवश चुप थे, तो हनुमान जी के माध्यम से उन्होंने श्रीराम से संत और असंत (दुष्ट) के लक्षण पूछे। श्रीराम ने कहा — "संत और असंत की करनी कुल्हाड़ी और चंदन के स्वभाव जैसी है। कुल्हाड़ी चंदन को काटती है, पर चंदन अपने स्वभाव के कारण उसे भी अपनी सुगंध से बसा देता है — इसीलिए चंदन देवताओं के मस्तक पर चढ़ता है, जबकि कुल्हाड़ी को आग में तपाकर घन से पीटा जाता है।" उन्होंने संतों के लक्षण गिनाए — निष्कपट, दीनों पर दयालु, निंदा-स्तुति में समान, अभिमानरहित — और असंतों के भी — ईर्ष्यालु, दूसरों की संपत्ति देखकर जलनेवाले, मीठा बोलकर भी हृदय में सर्प-सा विष रखनेवाले। यह उपदेश सुनकर सब भाई हर्षित हो उठे। सीख: रामराज्य हमें केवल एक स्वप्न नहीं, एक दिशा-निर्देश देता है — कि आदर्श समाज वह है जहाँ भय, भेदभाव और शोषण के शब्द तो बचे रहें, पर उनके अर्थ लुप्त हो जाएँ। सीता जी की विनम्र सेवा हमें सिखाती है कि ऊँचे पद पर होकर भी सेवा-भाव न छोड़ना ही सच्ची महानता है। और चंदन-कुल्हाड़ी का दृष्टांत हमें यह गहरा सत्य समझाता है — किसी के दुर्व्यवहार का उत्तर भी सद्भाव से देना ही संतत्व है। हर व्यक्ति के जीवन में यह चुनाव आता है कि वह कुल्हाड़ी बने या चंदन — यही चुनाव उसका चरित्र गढ़ता है।

4. काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद

भक्तो, अब हम उस प्रसंग पर पहुँचते हैं जो संपूर्ण उत्तरकाण्ड का हृदय है, और सच पूछें तो पूरे रामचरितमानस के सबसे गहन दार्शनिक क्षणों में से एक। यह प्रसंग इतना विस्तृत है कि तुलसीदास जी ने इसे कथा का सबसे बड़ा भाग दिया है — क्योंकि यहीं वह मूल प्रश्न फिर उठता है जिससे यह पूरी कथा आरंभ हुई थी। माता पार्वती, कथा सुनते-सुनते चकित होकर शिव जी से पूछती हैं — "हे नाथ, आपने कहा कि यह रामकथा काकभुशुण्डि ने गरुड़ को सुनाई थी। पर यह तो अद्भुत है — काकभुशुण्डि तो एक कौए के शरीर में हैं, फिर उनमें ऐसा गहन ज्ञान, ऐसी अटूट भक्ति कैसे संभव हुई? और गरुड़ तो स्वयं भगवान विष्णु के वाहन हैं, महाज्ञानी, हरि के अत्यंत निकटवासी — फिर वे मुनियों का समूह छोड़कर एक कौए के पास कथा सुनने क्यों गए?" शिव जी मुस्कुराकर कहते हैं — "हे सती, तुमने बहुत पवित्र प्रश्न पूछा है — अब वह परम पावन इतिहास सुनो, जिसे सुनते ही सारे लोकों का भ्रम मिट जाता है।" गरुड़ का संशय युद्ध में, जब मेघनाद ने अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश में बाँध दिया था — याद कीजिए भक्तो, लंकाकाण्ड का वह क्षण — तब नारद मुनि ने गरुड़ जी को वहाँ भेजा था, क्योंकि सर्पों के शत्रु गरुड़ के आते ही नागपाश स्वयं भाग खड़ा होता है। गरुड़ जी ने आकर बंधन काट दिया, पर उनके हृदय में एक गहरा विषाद उठा। वे बार-बार सोचने लगे — "जो सर्वव्यापी, विकाररहित, माया-मोह से परे परमेश्वर हैं, सुना था कि यही उनका अवतार है — पर मैंने तो उनका वह प्रभाव कहीं देखा ही नहीं! जिनका नाम जपकर मनुष्य भवबंधन से मुक्त हो जाते हैं, उन्हीं राम को एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश से बाँध लिया?" गरुड़ जी ने अपने मन को बहुत समझाया, पर स्पष्टता नहीं आई, हृदय में भ्रम और गहरा गया। और शिव जी यहाँ पार्वती से एक अत्यंत सुंदर बात कहते हैं — "हे उमा, दुःख और कुतर्क से व्याकुल होकर गरुड़ भी, ठीक तुम्हारी ही तरह, मोह में पड़ गए।" भक्तो, ठहरिए और इस पंक्ति पर गौर कीजिए — शिव जी स्वयं यह कहकर पार्वती के प्रश्न को गरुड़ के संशय से जोड़ते हैं! यही वह अद्भुत सूत्र है जो पूरे रामचरितमानस को एक वृत्त में बाँध देता है — बालकाण्ड में पार्वती का प्रश्न, और अब उत्तरकाण्ड में गरुड़ का प्रश्न — दोनों एक ही जिज्ञासा के दो रूप हैं। और दोनों ही हमें यह सिखाते हैं कि संदेह किसी अज्ञानी का लक्षण नहीं — वह तो देवी और देवताओं के वाहन तक को छू सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि संदेह होने पर हम कहाँ जाते हैं। व्याकुल गरुड़ पहले नारद के पास गए। नारद ने कहा — "हरि की माया अत्यंत बलवती है, जिसने मुझे भी बार-बार नचाया है — यह मेरे समझाने से नहीं मिटेगा, तुम ब्रह्मा जी के पास जाओ।" ब्रह्मा जी के पास गए तो उन्होंने भी कहा — "यह सारा जगत मेरा ही रचा है, फिर भी मैं मायावश नाचता हूँ — तो तुम्हें मोह होना कोई आश्चर्य नहीं। तुम शंकर जी के पास जाओ, और बीच में किसी और से मत पूछना, वहीं तुम्हारा संदेह मिटेगा।" सोचिए भक्तो — नारद, ब्रह्मा — दोनों ही स्वीकार करते हैं कि वे भी माया से अछूते नहीं। यह कैसी विनम्रता है! सबसे ज्ञानी लोग भी अपनी सीमाओं को स्वीकार करने से नहीं कतराते। नीलपर्वत की यात्रा गरुड़ जी शिव जी के पास पहुँचे। शिव जी ने कहा — "गरुड़, तुम मुझे राह में मिले हो, इतने में तुम्हें कैसे समझाऊँ? हर संदेह तभी मिटता है जब दीर्घकाल तक सत्संग किया जाय। सत्संग के बिना हरिकथा नहीं मिलती, कथा के बिना मोह नहीं भागता, और मोह गए बिना रामचरणों में दृढ़ प्रेम नहीं जगता। उत्तर दिशा में एक सुंदर नीला पर्वत है, वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डि रहते हैं — जाओ, वहाँ जाकर हरि के अनगिनत गुण सुनो।" और यहाँ शिव जी पार्वती को उस अद्भुत पर्वत का वर्णन सुनाते हैं — सुमेरु से बहुत दूर उत्तर में एक नीला पर्वत है, जिसके चार स्वर्णमय शिखरों में से एक-एक पर बरगद, पीपल, पाकर और आम के विशाल वृक्ष हैं। पर्वत पर एक सरोवर है जिसकी मणि-सीढ़ियाँ मन मोह लेती हैं। और वहीं वह पक्षी — काकभुशुण्डि — निवास करता है, जिसका नाश कल्प के अंत में भी नहीं होता। पीपल के नीचे वे ध्यान लगाते हैं, पाकर के नीचे जप करते हैं, आम की छाया में मानस-पूजा करते हैं, और बरगद के नीचे हरिकथा सुनाते हैं — जिसे अनेक पक्षी और सरोवर पर बसनेवाले हंस आदरपूर्वक सुनते हैं। शिव जी कहते हैं — "मैं स्वयं एक बार हंस का रूप धरकर वहाँ कुछ समय रहा था और आदरसहित रघुनाथ के गुण सुने थे।" भक्तो, सोचिए — स्वयं शिव जी, जो सर्वज्ञ हैं, एक बार हंस बनकर काकभुशुण्डि की कथा सुनने गए थे! यह हमें सिखाता है कि ज्ञान पाने के लिए पद और प्रतिष्ठा का त्याग करना पड़ सकता है — यहाँ तक कि महादेव को भी। गरुड़ जी उस पर्वत पर पहुँचे। सरोवर में स्नान करते ही, उस पावन स्थान की महिमा से उनका आधा मोह-भ्रम स्वयं ही मिट गया। काकभुशुण्डि, जो अभी कथा आरंभ ही करने वाले थे, गरुड़ को आते देख हर्ष से भर उठे। उन्होंने बड़े आदर से पूजा-अर्चना की और पूछा — "हे पक्षिराज, बताइए किस कार्य से पधारे हैं?" गरुड़ ने विनम्रता से अपनी व्यथा कही, और काकभुशुण्डि ने प्रेमपूर्वक संपूर्ण रामकथा — जन्म से लेकर राज्याभिषेक तक — विस्तार से सुनाई। कथा सुनकर गरुड़ जी का संदेह जाता रहा। उन्होंने कहा — "युद्ध में प्रभु का नागपाश-बंधन देखकर मुझे मोह हुआ था, पर अब मैं उस भ्रम को ही अपना हितकारी मानता हूँ — क्योंकि जो तेज धूप से व्याकुल होता है, वही वृक्ष की छाया का सुख जानता है। यदि मुझे इतना गहरा मोह न होता, तो मैं आपसे कैसे मिल पाता?" प्रभु की माया और लीला का रहस्य काकभुशुण्डि ने तब वह रहस्य खोला जिसकी प्रतीक्षा हम सबको है — "गरुड़, आश्चर्य मत करो। नारद, शिव, ब्रह्मा और सनकादि जैसे आत्मज्ञान के मर्मज्ञ मुनि तक — इनमें भी किसे मोह ने अंधा नहीं किया? श्रीराम स्वयं वही सच्चिदानंदघन हैं — अजन्मा, निर्गुण, सर्वव्यापी, मोहरहित। यहाँ मोह का कोई कारण ही नहीं — क्या अंधकार कभी सूर्य के सामने टिक सकता है? पर भक्तों के लिए उन्होंने मनुष्य का शरीर धारण किया, और जैसे कोई नट अनेक वेष धरकर नाचता है, हर वेष के अनुरूप भाव दिखाता है, पर स्वयं उनमें से कोई बनता नहीं — वैसी ही है रघुनाथ की यह लीला।" और फिर वह अद्भुत दृष्टांत — "जिसे आँख का दोष हो, वह चंद्रमा को भी पीला कहता है। नाव पर चढ़ा मनुष्य संसार को चलता देखता है और मोहवश स्वयं को स्थिर मान बैठता है। हरि के विषय में मोह की कल्पना भी ऐसी ही है — भगवान में स्वप्न में भी अज्ञान का कोई प्रसंग नहीं, पर जो मायावश मंदबुद्धि हैं, वे मूर्ख हठवश संदेह करते हैं और अपना ही अज्ञान राम पर मढ़ देते हैं।" सोचिए भक्तो — यह कैसा गहरा सत्य है! जब हमें कोई बात समझ में नहीं आती, तो हम अक्सर यह मान बैठते हैं कि दोष उस बात में है, जबकि दोष हमारी अपनी दृष्टि में हो सकता है। पीलिया के रोगी को शंख भी पीला दिखता है — शंख का दोष नहीं, रोगी की आँख का दोष है। काकभुशुण्डि की अपनी कथा — शाप से वरदान तक गरुड़ जी अब मंत्रमुग्ध होकर पूछते हैं — "हे नाथ, आप तो स्वयं इतने ज्ञानी हैं — फिर आपने यह काक (कौए) का शरीर किस कारण पाया? और यह रामकथा आपने कहाँ से पाई?" यह सुनकर काकभुशुण्डि प्रसन्न होकर अपनी संपूर्ण, बहुजन्मों में फैली अद्भुत कथा सुनाने लगते हैं। "एक पूर्वकल्प में," वे कहते हैं, "मैं अयोध्यापुरी में ही एक शूद्र के शरीर में जन्मा था। मन-वचन-कर्म से शिव जी का सेवक तो था, पर साथ ही धन के नशे में चूर, बकवादी और अत्यंत घमंडी — दूसरे देवताओं और हरिभक्तों की निंदा करनेवाला। उसी अयोध्या में रहते हुए भी मैंने उसकी महिमा तनिक भी नहीं पहचानी थी।" बाद में अकाल पड़ने पर वे उज्जैन चले गए, जहाँ एक विद्वान, दयालु ब्राह्मण गुरु ने उन्हें अपने पुत्र की तरह अपनाया, शिव-मंत्र दिया। पर काकभुशुण्डि का दंभ बढ़ता गया — जब गुरु ने प्रेम से समझाया कि "शिव जी की सेवा का सच्चा फल भी यही है कि श्रीराम के चरणों में भक्ति जागे, क्योंकि स्वयं शिव-ब्रह्मा भी राम को भजते हैं," तो यह सुनकर उनका हृदय जल उठा — जैसे साँप दूध पिलाने से और विषैला हो जाता है। एक दिन गुरु मंदिर में आए और अभिमानवश काकभुशुण्डि ने उठकर प्रणाम तक नहीं किया। यह गुरु-अपराध इतना गंभीर था कि स्वयं शिव जी सहन न कर सके। आकाशवाणी गूँज उठी — "अरे मूर्ख! गुरु के अपमान का पाप करोड़ों युगों तक रौरव नरक में ले जाता है। जा, अब तू सर्प बनकर किसी वृक्ष के खोखल में जा बस!" गुरु हाहाकार कर उठे, क्षमा माँगने लगे। शिव जी ने कुछ दया दिखाई — शाप को रद्द तो नहीं किया, पर यह वरदान दिया कि हर जन्म में उनका ज्ञान बना रहेगा, कभी लुप्त नहीं होगा, और अयोध्या के प्रभाव तथा शिव-कृपा से अंततः उनके हृदय में रामभक्ति अवश्य जागेगी। भक्तो, यहाँ ठहरकर सोचिए — यह कैसी करुणा है! शाप को रद्द नहीं किया गया, पर उसके भीतर ही मुक्ति का बीज बो दिया गया। यही तो परमात्मा की सबसे बड़ी विशेषता है — वे हमारे कर्मों का फल नहीं छीनते, पर उस फल के भीतर भी कृपा का मार्ग खुला रखते हैं। काकभुशुण्डि सर्प बने, फिर अनेक शरीर बदले — जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र उतारकर नया धारण करता है — पर हर जन्म में उनका ज्ञान बना रहा। अंततः उन्हें ब्राह्मण का अंतिम, दुर्लभ शरीर मिला। इस जन्म में भी उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा — भीतर से सारी वासनाएँ छूट चुकी थीं, बस एक ही लालसा थी: श्रीराम के दर्शन। माता-पिता की मृत्यु के बाद वे वन की ओर निकल पड़े, मुनियों से रामकथा पूछते फिरे। जब भी कोई मुनि उन्हें निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देता — "ईश्वर सर्वभूतमय है, तू ही वह है" — यह मत उनके हृदय में कभी नहीं उतरा। उनका मन तो सगुण राम के प्रेम में मछली की तरह रम चुका था। अंततः सुमेरु पर्वत पर लोमश मुनि से भेंट हुई। काकभुशुण्डि ने विनती की — "मुझे सगुण ब्रह्म की आराधना का मार्ग बताइए।" मुनि ने निर्गुण का उपदेश देना आरंभ किया, पर काकभुशुण्डि बार-बार वही कहते — "मेरा मन तो रामभक्ति में रम चुका है, कृपया मुझे वह उपाय बताइए जिससे मैं अपनी आँखों से श्रीरघुनाथ को देख सकूँ। पहले नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथ का दर्शन कर लूँ, तब निर्गुण का उपदेश सुनूँगा।" यह सुनकर मुनि ने फिर निर्गुण का ही प्रतिपादन किया, पर काकभुशुण्डि बड़े हठ के साथ सगुण का ही समर्थन करते रहे। बार-बार के उत्तर-प्रत्युत्तर से मुनि के भीतर भी क्रोध जाग उठा — जैसे चंदन की लकड़ी को बहुत रगड़ा जाय तो उससे भी आग निकल आती है। क्रोधित मुनि बोले — "अरे मूर्ख! तेरे हृदय में अपने ही पक्ष का इतना हठ है, तो तू शीघ्र चांडाल-पक्षी (कौआ) बन जा!" और भक्तो, यहाँ काकभुशुण्डि का जो उत्तर है, वही उनकी संपूर्ण भक्ति का सार है — उन्होंने यह शाप सहर्ष, सिर-माथे स्वीकार कर लिया। न कोई भय, न कोई दीनता। तत्क्षण वे कौआ बन गए, और मुनि के चरणों में सिर झुकाकर, राम का स्मरण करते हुए प्रसन्न मन उड़ चले। शिव जी यहाँ पार्वती को समझाते हैं — "इसमें ऋषि का तनिक भी दोष नहीं था। स्वयं श्रीराम ही सबके हृदय में यह प्रेरणा भर रहे थे — कृपासागर प्रभु ने मुनि की बुद्धि को भुलावा देकर असल में मेरे भक्त के प्रेम की परख ली थी।" जब मुनि ने काकभुशुण्डि का वह अटूट धैर्य और श्रद्धा देखी, तो वे आश्चर्यचकित होकर पछताने लगे, आदरपूर्वक उन्हें बुला लिया, संतुष्ट किया, और हर्षपूर्वक राम-मंत्र प्रदान करके संपूर्ण रामकथा सुनाई — यह कहते हुए कि "यह सुंदर, गुह्य रामचरितमानस मैंने स्वयं शिव जी की कृपा से पाया था।" फिर उन्होंने आशीर्वाद दिया — अटूट रामभक्ति, इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति, इच्छामृत्यु, और यह वरदान कि जहाँ भी वे निवास करेंगे, वहाँ चारों ओर एक योजन तक अविद्या का साया भी नहीं पड़ेगा। तब से काकभुशुण्डि उसी नीलपर्वत पर सत्ताईस कल्पों से निवास कर रहे हैं। और जब-जब श्रीराम अयोध्या में अवतार लेते हैं, वे वहाँ जाकर बाल-लीलाएँ देखते हैं — यहाँ तक कि एक बार तो बालक राम ने खेल-ही-खेल में उन्हें अपने मुख में समेट लिया था, और काकभुशुण्डि ने वहाँ भीतर अनगिनत ब्रह्मांड देखे — हर ब्रह्मांड में अलग ब्रह्मा, अलग विष्णु-शिव, अलग अयोध्या, अलग दशरथ-कौसल्या — फिर भी हर जगह वही अपरिवर्तित, वही कृपालु बाल-राम! इतना देखकर वे मोह-विह्वल होकर "त्राहि त्राहि" पुकार उठे थे, और करुणामय प्रभु ने अपना करकमल उनके सिर पर रखकर उनका सारा दुःख हर लिया था। तब प्रभु ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा — सिद्धियाँ, मोक्ष, ज्ञान — जो चाहे माँग ले। पर काकभुशुण्डि ने सोचा — "भक्तिरहित सब सुख वैसे ही हैं जैसे नमक के बिना व्यंजन।" उन्होंने माँगा — "हे प्रभु, मुझे केवल अपनी वह अविरल, विशुद्ध भक्ति दीजिए जिसे वेद-पुराण गाते हैं।" श्रीराम प्रसन्न होकर बोले — "एवमस्तु! तूने सब सुखों की खान भक्ति माँग ली — संसार में तेरे समान भाग्यशाली कोई नहीं!" और फिर प्रभु ने वह मूल सिद्धांत कहा जो शायद पूरे रामचरितमानस का सार-वाक्य है — "यह सारा संसार मेरी ही रचना है, इसलिए सब मुझे प्रिय हैं। पर इनमें से जो मद-माया त्यागकर मुझे भजता है — वह पुरुष हो, स्त्री हो, नपुंसक हो या कोई भी जीव — वही मुझे परम प्रिय है। भक्तिहीन तो चाहे ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे शेष जीवों के समान ही प्रिय है, पर भक्तिवान अत्यंत नीच प्राणी भी मुझे प्राणों के समान प्रिय है — यह मेरी घोषणा है।" सीख: भक्तो, इस विशाल प्रसंग से जो सबसे गहरी सीख मिलती है वह यह है — ईश्वर तक पहुँचने के लिए कोई एक निर्धारित योग्यता नहीं चाहिए। काकभुशुण्डि एक शूद्र से सर्प बने, सर्प से अनेक योनियाँ भोगीं, फिर ब्राह्मण बने, फिर हठ के कारण कौआ बने — पर हर पड़ाव पर उनकी भक्ति ही उन्हें आगे ले गई। जीवन में जो शाप, जो दंड, जो असफलता हमें मिलती है, वह भी अंततः किसी बड़ी कृपा का ही मार्ग हो सकती है — बशर्ते हम उसे विनम्रता और श्रद्धा से स्वीकार करें, जैसे काकभुशुण्डि ने कौए के शाप को हँसकर स्वीकार किया। और सबसे बड़ी बात — ईश्वर के लिए पद, बुद्धि या योग्यता महत्वपूर्ण नहीं, केवल निश्छल प्रेम महत्वपूर्ण है। एक कौआ भी, यदि उसका हृदय शुद्ध भक्ति से भरा हो, गरुड़ जैसे महाज्ञानी वाहन का गुरु बन सकता है।

5. कलियुग वर्णन — अंधकार और आशा

भक्तो, काकभुशुण्डि जब अपनी कथा में उस प्राचीन कल्प के कलियुग का वर्णन करते हैं जिसमें उन्होंने शूद्र-जन्म पाया था, तो वे कोई कल्पना नहीं कर रहे — वे कहते हैं, "यह सब मैंने अपनी आँखों देखा है।" और यही वर्णन आगे चलकर एक चेतावनी और भविष्यवाणी दोनों बन जाता है, जो हमारे अपने युग पर भी लागू होती है। काकभुशुण्डि कहते हैं — उस कलियुग में वर्णधर्म और आश्रम-व्यवस्था शेष न रही। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले बन गए, राजा प्रजा का शोषण करनेवाले। जिसे जो अच्छा लगे, वही उसके लिए सत्य बन गया। जो झूठा आडंबर रचे, वही संत माना जाने लगा। जो दूसरे का धन हड़प ले, वही चतुर कहलाया। नाखून बढ़े और जटाएँ लंबी हों तो वही तपस्वी बन बैठा। पुरुष स्त्रियों के पूर्ण वशीभूत होकर मदारी के बंदर की तरह नाचने लगे। सुहागिनें आभूषणहीन रहतीं, विधवाएँ शृंगार सजातीं — यानी मर्यादाएँ उलट गईं। गुरु और शिष्य के बीच बहरे और अंधे-सा संबंध रह गया — एक उपदेश सुनता नहीं, दूसरा सच्ची दृष्टि देता नहीं। शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करने लगे — "हम तुमसे किस बात में कम हैं?" बार-बार अकाल पड़ने लगे, अन्न के अभाव में लोग तड़पकर मरने लगे। सोचिए भक्तो — क्या यह वर्णन हमारे अपने समय से कुछ अलग लगता है? जहाँ बड़बोलापन ही पांडित्य बन गया है, जहाँ पाखंड को ही आध्यात्मिकता समझ लिया जाता है, जहाँ दिखावे को ही सफलता माना जाता है — तुलसीदास जी सदियों पहले ही मानो हमारे युग का ही चित्र खींच रहे थे। पर भक्तो, अब वह मोड़ आता है जो इस पूरे वर्णन को निराशा से आशा में बदल देता है। काकभुशुण्डि कहते हैं — "कलिकाल पाप और अवगुणों का घर तो है, पर उसमें एक बड़ा गुण भी है — इसमें बिना किसी विशेष परिश्रम के ही भवबंधन से मुक्ति मिल जाती है! सतयुग, त्रेता और द्वापर में पूजा, यज्ञ और योग के द्वारा जो गति प्राप्त होती है, कलियुग में वही गति लोग केवल भगवान का नाम लेकर पा लेते हैं।" और यह वह पंक्ति है, भक्तो, जो शायद पूरे रामचरितमानस का सबसे मुक्तिदायक संदेश है — "कलियुगमें न योग काम आता है, न यज्ञ, न ज्ञान — श्रीरामके गुणगानका ही एकमात्र सहारा रह जाता है। इसलिये जो सब भरोसे छोड़कर श्रीरामको भजता है और प्रेमपूर्वक उनके गुण गाता है, वही निश्चित रूपसे भवसागरसे पार हो जाता है।" काकभुशुण्डि आगे कहते हैं — "यदि मनुष्य श्रद्धा रखे तो कलियुग के समान कोई अन्य युग सुगम नहीं!" क्योंकि सत्ययुग में सिद्धि पाने के लिए कठिन योग चाहिए, त्रेता में विशाल यज्ञ, द्वापर में विधिवत पूजा — पर कलियुग में केवल श्रद्धा से लिया गया एक नाम पर्याप्त है। भक्तो, यह कितनी करुणामय बात है! जिस युग को सबसे अंधकारमय कहा गया, उसी युग में भगवान ने सबसे सरल द्वार खोल दिया — क्योंकि वे जानते थे कि कलियुग के मनुष्य के पास न वह संयम बचेगा, न वह साधन-सामर्थ्य। इसलिए उन्होंने कठिन विधियों की जगह सबसे सहज विधि रख दी — केवल नाम-स्मरण। सीख: जीवन में जब भी हमें लगे कि परिस्थितियाँ बहुत प्रतिकूल हैं, समय बहुत कठिन है, साधन बहुत सीमित हैं — तब यह याद रखिए कि हर कठिन समय के भीतर भी एक सरल द्वार छिपा होता है। कलियुग की सबसे बड़ी सीख यही है कि जटिल साधनाओं की चिंता किए बिना, बस श्रद्धा और प्रेम से अपने कर्तव्य और अपनी भक्ति में लगे रहें — क्योंकि सच्ची श्रद्धा किसी भी युग, किसी भी परिस्थिति से बड़ी होती है। निराशा के अंधकार में भी आशा का दीपक ढूँढना ही सच्ची बुद्धिमानी है।

6. रामभक्ति महिमा — ज्ञान और भक्ति का रहस्य

गरुड़ जी अब काकभुशुण्डि से पूछते हैं — "हे प्रभु, वेद-पुराण सब कहते हैं कि ज्ञान के समान दुर्लभ कुछ नहीं, फिर आपने उस मुनि के दिए ज्ञान का आदर क्यों नहीं किया, भक्ति का ही हठ क्यों रखा? ज्ञान और भक्ति में आखिर कितना अंतर है?" काकभुशुण्डि उत्तर देते हैं — "भक्ति और ज्ञान में वस्तुतः कोई भेद नहीं, दोनों ही संसार के क्लेश को दूर करते हैं। पर सुनो अंतर — ज्ञान, वैराग्य, योग — ये सब 'पुरुष-तत्त्व' हैं, प्रबल हैं। माया स्वभाव से निर्बल स्त्री-तत्त्व है, जिसे केवल धीरबुद्धि, वैराग्यवान पुरुष ही त्याग सकता है। पर भक्ति भी स्त्री-रूप मानी जाती है — फिर भी श्रीरघुवीर को भक्ति ही प्रिय है, क्योंकि उसके सामने माया स्वयं सकुचाकर पीछे हट जाती है।" फिर काकभुशुण्डि एक अत्यंत सुंदर, विस्तृत रूपक रचते हैं — ज्ञान का मार्ग एक दीपक जलाने जैसा है: श्रद्धारूपी गाय दुही जाती है, निष्कामभाव की अग्नि पर दूध औटाया जाता है, वैराग्य का मक्खन निकाला जाता है, ज्ञान का घी बनाया जाता है, समता की दीवट पर चित्त का दीपक जलाया जाता है — पर यह मार्ग "तलवार की धार के समान" है। थोड़ी भी असावधानी हो, तो देवता स्वयं (जो इंद्रियों के द्वारपाल हैं) विषय-वासना की आँधी को भीतर आने देते हैं और वह दीपक बुझ जाता है। ज्ञान का मार्ग अत्यंत कठिन, अत्यंत नाजुक है। पर भक्ति? "भक्ति एक चिंतामणि है — जिसके हृदय में यह बस जाती है, वह दिन-रात स्वयं ही प्रकाशरूप बना रहता है, उसे दीपक, घी या बत्ती कुछ नहीं चाहिए। न मोह की दरिद्रता उसके पास फटकती है, न लोभ की हवा उसे बुझा पाती है।" यही अंतर है — ज्ञान एक दीपक है जिसे सँभालकर रखना पड़ता है; भक्ति स्वयं प्रकाश है, जिसे बुझाया ही नहीं जा सकता। गरुड़ जी फिर सात प्रश्न पूछते हैं — सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा (मनुष्य-देह, जो स्वर्ग-नरक-मोक्ष तीनों की सीढ़ी है), सबसे बड़ा दुःख (दरिद्रता) और सबसे बड़ा सुख (संतों का मिलन) क्या है, संत-असंत के लक्षण, सबसे बड़ा पुण्य (अहिंसा) और सबसे बड़ा पाप (परनिंदा) क्या है, और मन के रोग कौन-से हैं। काकभुशुण्डि अंतिम प्रश्न का उत्तर देते हुए एक अद्भुत रूपक रचते हैं — मोह ही समस्त रोगों की जड़ है, काम वात है, लोभ कफ है, क्रोध पित्त है, अहंकार गाँठ का रोग है, तृष्णा जलोदर है — और इन सबकी एकमात्र संजीवनी बूटी है श्रीराम की भक्ति। फिर काकभुशुण्डि अंतिम, सबसे मार्मिक बात कहते हैं — "मैं तो पक्षियों में सबसे नीच, हर तरह से अपवित्र हूँ, फिर भी प्रभु ने मुझे जगत को पावन करनेवाला बना दिया।" और वे यह घोषणा करते हैं कि श्रीराम भजन के अतिरिक्त कोई साधक, सिद्ध, ज्ञानी, तपस्वी — कोई भी संसार-सागर पार नहीं कर सकता। गरुड़ जी का हर संदेह अब पूरी तरह मिट चुका था। वे भुशुण्डि के चरणों में सिर झुकाकर प्रेम-विह्वल होकर वैकुण्ठ की ओर चल पड़े। काकभुशुण्डि इस पूरी कथा का समापन एक अंतिम, अत्यंत हृदयस्पर्शी घोषणा से करते हैं — "पतितों को पवित्र करना जिनका प्रसिद्ध स्वभाव है, ऐसे श्रीराम को भजकर आज तक किसने परम गति नहीं पाई? गणिका, अजामिल, बहेलिया (वाल्मीकि), गीध (जटायु), हाथी (गजेंद्र) जैसे अनेक — इन्हें भी उन्होंने तार दिया। अहीर, यवन, किरात, चांडाल जैसे अत्यंत पापी लोग भी उनका नाम एक बार लेकर पवित्र हो जाते हैं!" सीख: ज्ञान और भक्ति के इस भेद से हमें सीख मिलती है कि जीवन में जटिल, नाजुक मार्गों की अपेक्षा सरल, हृदय से किया गया प्रयास अधिक टिकाऊ होता है। जिस काम में हमारा हृदय, हमारा प्रेम पूरी तरह लगा हो, वह काम कभी असफल नहीं होता — भले ही हमारे पास सबसे विद्वतापूर्ण तरीके न हों। और सबसे बड़ी सीख — कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका अतीत कैसा भी रहा हो, चाहे समाज ने उसे कितना भी "नीच" या "अयोग्य" माना हो, वह भी परम गति का अधिकारी है, बस उसके हृदय में सच्ची श्रद्धा हो। किसी को उसके अतीत या उसकी पृष्ठभूमि के आधार पर कभी हीन मत समझिए — हर हृदय में बदलने और ऊँचा उठने की क्षमता है।

7. उपसंहार — संपूर्ण रामचरितमानस का सार

भक्तो, अब हम उस स्थान पर आ खड़े हुए हैं जहाँ से हमने यह पूरी यात्रा आरंभ की थी। याद कीजिए वह दिन जब हमने बालकाण्ड में पहला कदम रखा था — प्रयाग के तट पर भरद्वाज मुनि का याज्ञवल्क्य से प्रश्न, और उसके भीतर कैलाश पर माता पार्वती का शिव जी से वह मूल प्रश्न — "ये राम कौन हैं? क्या वे केवल दशरथ के पुत्र हैं, या स्वयं परब्रह्म परमेश्वर?" और आज, उत्तरकाण्ड के इस अंतिम पड़ाव पर, हमने वही प्रश्न फिर सुना — गरुड़ के मुख से, जो नागपाश में बँधे राम को देखकर मोह में पड़ गए थे। और उसका उत्तर उतना ही सुंदर था जितना पहली बार था — कि संदेह कोई पाप नहीं, कि माया शिव-ब्रह्मा-नारद तक को छू सकती है, और कि इस संदेह को मिटाने का एकमात्र मार्ग सत्संग और भक्ति ही है, कोई शास्त्रार्थ नहीं। भक्तो, यही तो इस संपूर्ण महाकाव्य का सबसे सुंदर वृत्त है — यह प्रश्न से आरंभ होकर, हजारों प्रसंगों, सैकड़ों पात्रों, अनगिनत आँसुओं और मुस्कानों से गुज़रकर, अंततः उसी प्रश्न के उत्तर पर वापस आ टिकता है, पर अब वह उत्तर हमारे हृदय में उतना ही गहरा उतर चुका होता है जितना कभी पार्वती के हृदय में उतरा था। पीछे मुड़कर देखिए भक्तो — बालकाण्ड में हमने सीखा था कि भक्ति के लिए योग्यता नहीं, श्रद्धा चाहिए। अयोध्याकाण्ड में देखा कि त्याग और वचन-पालन ही सच्चा प्रेम है। अरण्यकाण्ड और किष्किंधाकाण्ड में देखा कि विपत्ति में भी धैर्य और मित्रता कैसे मार्ग खोलती है। सुंदरकाण्ड में देखा कि एक भक्त का समर्पण पर्वत लाँघ सकता है, समुद्र पार कर सकता है। लंकाकाण्ड में देखा कि धर्म की विजय के लिए संगठन, साहस और सही समय पर सही निर्णय चाहिए। और अब, उत्तरकाण्ड में, हमने देखा कि यह सारी यात्रा अंततः किस ओर ले जाती है — रामराज्य के उस स्वप्न की ओर जहाँ भय और भेद के शब्द रह जाएँ पर उनके अर्थ मिट जाएँ, और काकभुशुण्डि की उस कथा की ओर जो हमें सिखाती है कि एक कौआ भी, यदि उसका हृदय शुद्ध भक्ति से भरा हो, गरुड़ जैसे महाज्ञानी का गुरु बन सकता है। भक्तो, यही तो इस संपूर्ण रामचरितमानस की मूल शिक्षा है, जो हर काण्ड में अलग-अलग रूप में, अलग-अलग पात्रों के माध्यम से बार-बार दोहराई गई — कि भक्ति किसी की मोहताज नहीं। वह राजा दशरथ की भी उतनी ही है जितनी शबरी की, हनुमान की भी उतनी ही जितनी काकभुशुण्डि की, विद्वान वशिष्ठ की भी उतनी ही जितनी अनपढ़ निषादराज की। तुलसीदास जी ने अपने ही बारे में कहा था कि वे "अधम कवि" हैं, कोई विशेष विद्वान नहीं — और फिर भी उन्होंने वह रच दिया जिसे आज साढ़े चार सौ वर्षों बाद भी करोड़ों घर श्रद्धा से पढ़ते हैं। यही तो भक्ति की शक्ति है। काकभुशुण्डि अपनी कथा के अंत में कहते हैं कि इस कलिकाल में योग, यज्ञ, तप — कुछ भी काम नहीं आता, केवल राम का स्मरण, राम का गुणगान ही एकमात्र सहारा है। भक्तो, यह केवल उस प्राचीन युग के लिए नहीं कहा गया — यह हमारे लिए, आज के लिए, इसी क्षण के लिए कहा गया है। हमारा युग भी कलियुग ही है — तेज़, उलझा हुआ, अक्सर अर्थहीन प्रतीत होनेवाला। पर ठीक इसीलिए तुलसीदास जी हमें यह आश्वासन देते हैं कि इस युग में मुक्ति सबसे सरल है — बस श्रद्धा से एक नाम लेना काफी है। तो भक्तो, इस कथा को यहीं विराम देते हुए, मैं आपसे बस इतना ही निवेदन करूँगा — अपने जीवन में चाहे कितनी भी उलझनें हों, चाहे कितने भी संदेह उठें, चाहे कितनी भी बार लगे कि ईश्वर दूर है या कथा असंभव-सी है — याद रखिए कि एक कौआ भी भक्ति के बल पर गरुड़ का गुरु बन सकता है, एक वनवासी भील भी शबरी की तरह भगवान का प्रिय बन सकता है, और एक साधारण मनुष्य भी, बस राम का नाम अपने होंठों पर, अपने हृदय में लिए हुए, इस भवसागर को पार कर सकता है। यही रामचरितमानस का अंतिम संदेश है, और यही इसका सबसे पहला संदेश भी था — भक्ति सबके लिए है, सदा के लिए है, हर हृदय के लिए है। जिस तरह काकभुशुण्डि ने कहा — "रामनाम जन्म-मरण के रोग की अचूक औषधि है" — उसी तरह मैं भी आपसे कहूँगा: इस कथा को सुनकर यहीं मत छोड़ दीजिए। इसे अपने दैनिक जीवन में उतारिए। जब भी मन भारी हो, जब भी राह कठिन लगे, जब भी लगे कि अकेले हैं — बस राम का नाम लीजिए। यही वह सूत्र है जो तुलसीदास जी ने अपने पूरे जीवन की साधना से हमें सौंपा है। चलते-चलते वही अंतिम आरती स्मरण कर लें, जिसे स्वयं ब्रह्मा, नारद, वाल्मीकि, शुकदेव, शिव-पार्वती और अगस्त्य मुनि गाते हैं — यह आरती संपूर्ण रामायण की महिमा का सार है, कलियुग के पापों का नाश करनेवाली, मुक्तिरूपी युवती का शृंगार, संसार के रोगों की अमृत-जड़ी। इसी भाव के साथ, हृदय में राम-नाम को सदा के लिए बसाकर, हम इस कथा को विराम देते हैं — यह जानते हुए कि यह कोई अंत नहीं, बल्कि हर उस हृदय में एक नया आरंभ है जो इसे श्रद्धा से सुनता है। भगवान श्रीराम, जिन्होंने अपने पूरे जीवन से यह सिखाया कि मर्यादा, त्याग, प्रेम और भक्ति ही जीवन के सच्चे आभूषण हैं, वे सदा हम सबके हृदय में विराजमान रहें। जो भी इस कथा को श्रद्धा से पढ़े, सुने या गाए, उसके जीवन के सारे क्लेश मिट जाएँ, और उसके हृदय में सदा के लिए अटूट रामभक्ति का दीपक जल उठे। ॥ जय श्री सीताराम ॥ सियावर रामचंद्र की जय। पवनसुत हनुमान की जय। बोलो सब भक्तजन — जय श्री सीताराम!