1. मंगलाचरण
गोस्वामी तुलसीदास जी सुन्दरकाण्ड आरंभ करने से पहले भी अपनी परंपरा का पालन करते हैं — वे संस्कृत श्लोकों में भगवान श्रीराम की वंदना करते हैं। वे कहते हैं — "मैं उन शांत, सनातन, करुणा के सागर, रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम की वंदना करता हूँ, जो माया से मनुष्य-रूप धारण करने वाले साक्षात् हरि हैं, जिनकी सेवा स्वयं ब्रह्मा, शिव और शेषनाग करते हैं।" फिर वे अतुलित बलधाम, स्वर्ण-पर्वत के समान देह वाले, राक्षस-वन के लिए अग्नि-स्वरूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, गुणों के सागर, केसरीनंदन पवनपुत्र हनुमान जी को भी प्रणाम करते हैं।
देखिए भक्तो, कितनी सुंदर बात है — जिस काण्ड में हनुमान जी की महिमा गाई जानी है, उसका आरंभ भी हनुमान जी की ही वंदना से हो रहा है। यह हमें सिखाता है कि जो भक्त अपने स्वामी की सेवा में इतना समर्पित हो जाता है, वह स्वयं भी पूजनीय बन जाता है। तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि हनुमान जी का चरित्र इतना पावन है कि इसका स्मरण मात्र ही सारे संकट, सारी बाधाएँ हर लेता है।
सीख: जब हम किसी बड़े कार्य की शुरुआत करते हैं, तो हमें उन लोगों को भी स्मरण करना चाहिए जिन्होंने निःस्वार्थ सेवा और समर्पण से अपना जीवन किसी उद्देश्य को अर्पित कर दिया हो। सच्ची भक्ति और सच्ची सेवा कभी अनदेखी नहीं रहती — वह स्वयं पूज्य बन जाती है।
2. सागर लंघन (जामवंत प्रेरणा)
भक्तो, याद कीजिए वह दृश्य — समुद्र के तट पर बैठे सारे वानर, अंगद सहित, निराशा में डूबे हुए। किसी में इतना बल न था कि सौ योजन का समुद्र लांघ सके। तभी बुजुर्ग भालु जामवंत जी को स्मरण हुआ कि हनुमान जी, जो अब तक चुपचाप, संकोचवश एक कोने में बैठे थे, वे तो पवनपुत्र हैं, वे तो जन्म से ही असीम बल के स्वामी हैं — बचपन में एक बार उन्होंने सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास तक किया था! परंतु बाल्यकाल में ऋषियों के शाप के कारण हनुमान जी अपने बल को भूल चुके थे, उन्हें कोई स्मरण दिलाए तभी वह बल जागृत होता।
जामवंत जी हनुमान जी के पास गए और अत्यंत मधुर, प्रेरक वचनों में बोले — "हे पवनसुत! तुम क्यों चुप बैठे हो? तुम्हीं में वह शक्ति है जो इस कार्य को कर सकती है। तुम्हारा बल पर्वतों को चूर-चूर करने वाला है, तुम्हारी गति वायु के समान है, तुम्हारी बुद्धि अत्यंत विशाल है। नल-नील को छोड़कर ऐसा कोई कार्य नहीं जो तुम न कर सको। उठो! अपने बल को पहचानो!"
यह सुनते ही हनुमान जी का हृदय हर्ष से भर उठा। जामवंत जी के प्रेरक वचन उन्हें अत्यंत भाए, और उसी क्षण उनके भीतर सोया हुआ पर्वत-सा बल जागृत हो उठा। हनुमान जी उठ खड़े हुए और गर्जते हुए बोले — "हे वानरो! मुझमें अब वह बल है कि मैं सैकड़ों योजन के समुद्र को भी लांघ सकता हूँ, सुमेरु पर्वत को भी उखाड़ सकता हूँ, और गरुड़ की गति को भी पीछे छोड़ सकता हूँ। परंतु जब तक मैं सीता माता को देखकर, राम-काज पूर्ण करके न लौटूँ, तब तक ही मुझमें यह हर्ष रहेगा।"
सब वानर हर्ष से जय-जयकार करने लगे। हनुमान जी समुद्र-तट पर स्थित एक सुंदर पर्वत पर चढ़े, और भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए, वानरों को प्रणाम करते हुए, अपने शरीर को विस्तार देने लगे। भक्तो, यह दृश्य कल्पना कीजिए — जो शरीर अभी तक साधारण वानर के आकार का था, वह क्षण-क्षण में बढ़ने लगा, पर्वत के समान ऊँचा, फिर उससे भी ऊँचा, मानो कोई विशाल स्वर्णशैल आकाश को चूमने चला हो। जिस पर्वत पर वे खड़े थे, वह उनके पैरों के भार से पाताल में धँस गया — जैसे किसी वस्तु को दबाने से नीचे की वस्तु दब जाए।
फिर हनुमान जी ने अपनी छाती चौड़ी की, पूँछ को ऊँचा उठाया, और भगवान श्रीराम-लक्ष्मण को हृदय में धारण करते हुए, "जय श्रीराम" का उद्घोष करते हुए समुद्र के ऊपर छलांग लगा दी। भक्तो, वह छलांग कैसी थी — मानो स्वयं गरुड़ भी लज्जित हो जाए, मानो कोई पर्वत ही पंख लगाकर उड़ चला हो। हनुमान जी की गति इतनी प्रचंड थी कि समुद्र का जल दोनों ओर पर्वतों की भाँति उठ खड़ा हुआ, बादल उनके मार्ग में छिन्न-भिन्न हो गए, देवता, गंधर्व, सिद्ध — सभी आकाश से यह अद्भुत दृश्य देखने उमड़ पड़े।
मैनाक पर्वत का सत्कार
भक्तो, इसी उड़ान के बीच एक अत्यंत मार्मिक और सुंदर घटना घटती है। समुद्र के भीतर स्थित मैनाक पर्वत ने विचार किया — "श्रीराम के दूत हनुमान इतनी दूर तक बिना विश्राम के उड़ते जा रहे हैं, मुझे इनकी सेवा करनी चाहिए, इन्हें कुछ क्षण विश्राम देना चाहिए।" यह मैनाक पर्वत वही था जिसे प्राचीन काल में समुद्र ने इंद्र के वज्र-प्रहार से बचाकर अपने भीतर शरण दी थी — इसलिए वह सदा उपकार का ऋणी था, और अवसर पाकर उपकार लौटाना चाहता था।
मैनाक पर्वत जल से ऊपर उठा और हनुमान जी के मार्ग में आकर विनम्रता से बोला — "हे पवनसुत! तुम श्रीराम के दूत हो, थके होगे। कृपया कुछ क्षण मेरे ऊपर विश्राम कर लो, फिर आगे बढ़ना।" हनुमान जी ने उड़ते-उड़ते ही, बिना गति रोके, केवल अपने हाथ से उस पर्वत को स्पर्श कर लिया — जैसे कोई धावक दौड़ते हुए किसी मित्र से हाथ मिला ले — और आगे बढ़ गए। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से कहा — "हे मित्र, तुम्हारा स्नेह और सत्कार मुझे स्वीकार्य है, परंतु राम-काज बिना पूर्ण किए मैं विश्राम कैसे करूँ? मुझे क्षमा करो, मुझे आगे बढ़ने दो।"
भक्तो, सोचिए — कितना विशाल प्रलोभन था यह! एक ऐसा पर्वत, जो स्वयं आगे बढ़कर विश्राम का निमंत्रण दे रहा है, समुद्र के मध्य, जहाँ थकान स्वाभाविक भी है। परंतु हनुमान जी ने न रुकने का लालच किया, न मैनाक का हृदय भी नहीं तोड़ा — उन्होंने बीच का सुंदर मार्ग निकाला, स्पर्श करके सम्मान भी दे दिया, और लक्ष्य से डिगे भी नहीं।
सीख: जीवन में जब हम किसी बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हों, तो रास्ते में अनेक सुविधाजनक विश्राम-स्थल, अनेक प्रलोभन मिलेंगे — कुछ तो अत्यंत सम्मानजनक रूप में भी आएँगे, जैसे मैनाक पर्वत का प्रस्ताव था। परंतु सच्चा साधक न तो उन्हें अपमानित करता है और न ही उनमें उलझकर अपने लक्ष्य को भूलता है। सम्मान दीजिए, आभार व्यक्त कीजिए, परंतु जब तक कार्य पूर्ण न हो, विश्राम मत लीजिए।
3. सुरसा-सिंहिका परीक्षा
सुरसा की परीक्षा
भक्तो, हनुमान जी अभी आगे ही बढ़े थे कि देवताओं ने विचार किया — "हनुमान जी में सच में इतना बल और बुद्धि है या नहीं, इसकी परीक्षा ले ली जाए।" उन्होंने नागों की माता सुरसा से कहा — "हे सुरसा! तुम इस वानर की परीक्षा लो।" सुरसा तत्क्षण अत्यंत भयंकर, विशाल रूप धारण करके हनुमान जी के मार्ग में आ खड़ी हुईं और गरजकर बोलीं — "आज विधाता ने मुझे बहुत दिनों बाद आहार भेजा है! तुम मेरा भोजन बनोगे, मेरे मुख में प्रवेश करो!"
हनुमान जी ने अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा — "हे माता, मैं श्रीरामचंद्र जी का दूत हूँ, राम-काज के लिए लंका जा रहा हूँ। सीता माता की खोज में जा रहा हूँ। कृपया मुझे मार्ग दो, यह कार्य पूर्ण करके मैं स्वयं तुम्हारे पास लौट आऊँगा, तब मुझे खा लेना, मैं सत्य कहता हूँ।" परंतु सुरसा अपनी परीक्षा पर अड़ी रहीं — "कोई भी मेरे मुख से बचकर, बिना मुख में प्रवेश किए, आगे नहीं जा सकता — यह मुझे वरदान प्राप्त है।"
हनुमान जी समझ गए कि यह परीक्षा है, टाला नहीं जा सकता, तो उन्होंने विनोदपूर्ण बुद्धि का सहारा लिया। उन्होंने कहा — "अच्छा माता, तो अपना मुख खोलो।" इतना कहकर हनुमान जी ने अपना शरीर बढ़ाना आरंभ किया। सुरसा ने भी अपना मुख उतना ही बड़ा किया — हनुमान जी बारह योजन के हुए तो सुरसा का मुख भी बारह योजन का हो गया। हनुमान जी सौ योजन के हुए तो सुरसा का मुख भी सौ योजन का फैल गया। यह होड़ बढ़ती ही गई — हनुमान जी का शरीर पर्वत से भी विशाल होता गया, सुरसा का मुख योजन-भर तक फैलता गया।
फिर ठीक उसी क्षण, जब सुरसा का मुख अपनी चरम सीमा तक फैल चुका था, हनुमान जी ने बुद्धि का चमत्कार दिखाया — उन्होंने तत्क्षण अपने शरीर को अंगूठे के बराबर, अत्यंत सूक्ष्म कर लिया, और पलक झपकते ही सुरसा के विशाल मुख में प्रवेश करके, तुरंत बाहर निकल आए! उन्होंने हाथ जोड़कर सिर झुकाकर कहा — "माता, मैंने तुम्हारे मुख में प्रवेश कर लिया, अब मुझे आज्ञा दो, मैं आगे बढ़ूँ।"
सुरसा यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपना वास्तविक, दिव्य रूप प्रकट किया और आशीर्वाद देते हुए कहा — "हे पुत्र! तुम्हारा बल और बुद्धि देखकर मैं धन्य हुई। जाओ, राम-काज पूर्ण करो, तुम्हारी सफलता निश्चित है!"
भक्तो, यहाँ ध्यान दीजिए — हनुमान जी ने पहले शरीर को बड़ा करके यह दिखाया कि वे शक्ति में पीछे नहीं हैं, फिर तुरंत सूक्ष्म रूप धारण करके यह सिद्ध किया कि सच्ची बुद्धि शक्ति से भी बड़ी होती है। हठ और बल-प्रदर्शन से समस्या का हल हर बार नहीं निकलता, कभी-कभी चतुराई और लचीलापन ही असली विजय दिलाते हैं।
सीख: जीवन में जब कोई बड़ी बाधा, कोई कठोर परीक्षा सामने आए, तो घबराइए मत। न तो अहंकार में आकर टकराव कीजिए, न ही भयभीत होकर पीछे हटिए। शांत बुद्धि से रास्ता खोजिए — कभी-कभी बड़ी होकर लड़ना समाधान नहीं होता, छोटा होकर, विनम्र होकर निकल जाना ही सच्ची चतुराई है।
सिंहिका का वध
सुरसा की परीक्षा पार करने के बाद हनुमान जी पुनः आगे बढ़े। तभी समुद्र में रहने वाली सिंहिका नामक राक्षसी की दृष्टि उन पर पड़ी। सिंहिका को यह विचित्र शक्ति प्राप्त थी कि वह आकाश में उड़ने वाले किसी भी प्राणी की परछाईं को पकड़ लेती और वह प्राणी उड़ न पाकर उसके निकट खिंचा चला आता — इसी छल से वह आकाशचारी जीवों को सदा अपना आहार बनाती थी।
सिंहिका ने हनुमान जी की परछाईं पकड़ ली। हनुमान जी को तुरंत आभास हुआ कि उनकी गति अचानक क्यों रुक गई। उन्होंने नीचे देखा तो एक विशाल, भयंकर राक्षसी को जल में देखा, जिसने अपना मुख खोल रखा था, उन्हें निगल जाने के लिए। हनुमान जी ने क्षण भर में समझ लिया कि यह माया का खेल है, और उन्होंने बुद्धिमानी से तुरंत अपने शरीर को अत्यंत छोटा कर लिया — इतना छोटा कि सिंहिका, जो अभी तक विशाल आकार की तैयारी में थी, चौंक गई।
हनुमान जी ने अवसर पाकर सिंहिका के मुख के भीतर प्रवेश किया, और भीतर जाते ही अपने तीखे नखों से उसका हृदय विदीर्ण कर डाला, फिर तुरंत बाहर निकल आए। सिंहिका वहीं तड़पकर मृत्यु को प्राप्त हुई। हनुमान जी ने पुनः अपना सामान्य आकार धारण किया और आगे बढ़ चले।
भक्तो, यहाँ ध्यान दीजिए — सुरसा की परीक्षा में हनुमान जी ने पहले विनम्रता से अनुमति माँगी, यह एक दिव्य शक्ति की परीक्षा थी। परंतु सिंहिका के साथ ऐसा कोई विनय-संवाद नहीं हुआ, क्योंकि वह शुद्ध रूप से एक छलपूर्ण, विनाशकारी राक्षसी थी। हनुमान जी ने तुरंत पहचान लिया कि कब विनम्रता उचित है और कब निर्णायक प्रहार आवश्यक है।
सीख: जीवन में हर बाधा एक जैसी नहीं होती। कुछ बाधाएँ परीक्षा होती हैं, जिन्हें विनम्रता और संवाद से पार किया जा सकता है, जैसे सुरसा। परंतु कुछ बाधाएँ शुद्ध छल और विनाश होती हैं, जैसे सिंहिका — जो हमारी परछाईं यानी हमारी असल शक्ति को ही पकड़कर हमें रोकना चाहती हैं। ऐसी बाधाओं को पहचानकर तुरंत, निर्णायक रूप से समाप्त करना ही बुद्धिमानी है। हर स्थिति में एक ही रणनीति काम नहीं आती — विवेक से पहचानिए कि कब झुकना है और कब वार करना है।
4. लंका प्रवेश
अंततः हनुमान जी लंका के तट पर पहुँचे। उन्होंने अपने वास्तविक विशाल रूप को समेटकर, बिल्ली के समान अत्यंत छोटा रूप धारण किया, ताकि रात्रि के अंधकार में चुपचाप, बिना किसी का ध्यान खींचे, नगर में प्रवेश कर सकें। भक्तो, कल्पना कीजिए यह दृश्य — जिस वानर ने अभी-अभी समुद्र के ऊपर पर्वत जैसा विशाल रूप धारण किया था, वही अब एक छोटी बिल्ली के समान दुबका हुआ, सतर्कता से लंका की स्वर्णिम प्राचीरों की ओर बढ़ रहा है।
जैसे ही हनुमान जी नगर के द्वार के निकट पहुँचे, उन्हें एक भयंकर स्त्री-रूपी रक्षिका ने रोका — यह लंकिनी थी, जो लंका की द्वार-रक्षिका थी, जिसे यह वरदान/शाप प्राप्त था कि जब तक कोई वानर उसे पराजित न करे, लंका सुरक्षित रहेगी। लंकिनी गरजकर बोली — "अरे मूर्ख वानर! तुझे पता नहीं मेरा मुझसे बिना पूछे कोई इस नगर में प्रवेश नहीं कर सकता? मैं ही हूँ जो यहाँ आने वाले चोरों का आहार करती हूँ, अब तू भी मेरा आहार बनेगा!"
हनुमान जी ने पहले उसे रोकने का प्रयास किया, परंतु जब वह न मानी और उन पर झपटी, तो हनुमान जी ने केवल एक घूँसा मारा। भक्तो, वह एक घूँसा इतना प्रचंड था कि लंकिनी लड़खड़ाकर रक्त वमन करती हुई भूमि पर गिर पड़ी! गिरते ही उसे स्मरण हो आया — प्राचीन काल में ब्रह्मा जी ने उसे यह भविष्यवाणी दी थी कि "जिस दिन कोई वानर तुझे इस प्रकार अपने एक ही प्रहार से पराजित कर दे, समझ लेना कि रावण और राक्षसों के विनाश का समय अब निकट आ गया है।"
यह स्मरण होते ही लंकिनी ने हाथ जोड़कर, भयभीत होकर हनुमान जी से विनती की — "हे कपिश्रेष्ठ! तुम धन्य हो! अब मुझे समझ आ गया कि लंका के अधर्म का अंत निकट है। तुम निःसंकोच नगर में प्रवेश करो और अपना कार्य सिद्ध करो।" यह कहकर उसने मार्ग छोड़ दिया।
हनुमान जी ने नगर में प्रवेश किया — और भक्तो, जो दृश्य उन्होंने देखा, वह अद्भुत भी था और पीड़ादायक भी। स्वर्ण के परकोटे, मणि-जड़ित भवन, चौड़े बाजार, सुंदर उद्यान — पूरी लंका ऐसी चमक रही थी मानो साक्षात् स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। परंतु हनुमान जी का हृदय जानता था कि इस बाहरी वैभव और चमक के पीछे कितना अधर्म, कितना अत्याचार, कितना पाप छिपा है — यह वही नगरी है जहाँ एक निर्दोष, पतिव्रता स्त्री को बंदी बनाकर रखा गया है। सोने की चमक ने कभी किसी नगरी के पापों को नहीं छिपाया, और हनुमान जी को यह भलीभाँति ज्ञात था।
सीख: लंकिनी का प्रसंग हमें सिखाता है कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली और प्राचीन क्यों न दिखे, जब उसके पतन का समय आता है, तो वह स्वयं ही अपने पतन के संकेत पहचान लेता है। और लंका का स्वर्णिम वैभव हमें यह भी सिखाता है — किसी भी स्थान, व्यक्ति या वस्तु की बाहरी चमक-दमक देखकर उसकी भीतरी सच्चाई का अनुमान मत लगाइए। सोने के महलों में भी पाप बस सकता है, और झोंपड़ी में भी धर्म निवास कर सकता है।
5. सीता दर्शन
नगर में प्रवेश करने के बाद हनुमान जी ने विचार किया कि सीता माता को कहाँ खोजें। वे रात्रि के अंधकार में एक-एक भवन को सावधानी से देखने लगे — रावण के विशाल राजमहल में, अनगिनत योद्धाओं के कक्षों में, अनेक सुंदरियों से सजे शयन-कक्षों में — परंतु कहीं भी सीता माता के दर्शन न हुए। यहाँ तक कि रावण के अपने शयन-कक्ष में जाकर भी उन्होंने देखा, जहाँ रावण सोया हुआ था, परंतु वहाँ भी सीता माता नहीं थीं।
खोजते-खोजते हनुमान जी एक ऐसे भवन में पहुँचे, जहाँ श्रीराम के नाम अंकित आयुध सजे थे, तुलसी के पौधे लगे थे, और वातावरण में एक अलग ही पवित्रता थी। हनुमान जी ने सोचा — "लंका जैसे राक्षस-नगर में ऐसा सज्जन-निवास कैसे?" उन्होंने वहाँ "राम-राम" का जप सुना, और समझ गए कि यहाँ अवश्य कोई भगवद्भक्त निवास करता है। वे ब्राह्मण का रूप धारण करके भीतर गए और वहीं उनकी भेंट हुई विभीषण जी से — रावण के छोटे भाई, जो स्वभाव से अत्यंत धर्मात्मा, भगवद्भक्त और सात्विक थे।
विभीषण जी ने हनुमान जी से पूछा — "आप कौन हैं? क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं, क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदय में अपार प्रेम उमड़ रहा है?" हनुमान जी ने अपना परिचय दिया, श्रीराम की सारी कथा सुनाई। यह सुनकर विभीषण जी के शरीर में रोमांच हो आया, वे हर्ष से गद्गद हो गए, और उन्होंने ही हनुमान जी को बताया कि सीता माता कहाँ हैं — "वे अशोक वाटिका में हैं, जहाँ राक्षसियाँ उन्हें दिन-रात घेरे रहती हैं, डराती-धमकाती हैं, परंतु वे अपने सतीत्व और श्रीराम-भक्ति में अटल हैं।" विभीषण जी ने हनुमान जी को अशोक वाटिका पहुँचने की युक्ति भी बता दी।
हनुमान जी ने विभीषण जी से विदा ली और छोटा रूप धारण करके अशोक वाटिका में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक वृक्ष के घने पत्तों में छिपकर चारों ओर दृष्टि दौड़ाई — और भक्तो, वहाँ उन्हें वह दृश्य दिखा जिसने उनके हृदय को चीर डाला। एक वृक्ष के नीचे, मलिन वस्त्रों में, अत्यंत दुर्बल, बिखरे केशों वाली, आँसुओं से भीगी एक स्त्री बैठी थीं — यही सीता माता थीं। महीनों के वियोग, भूख और चिंता ने उनके शरीर को कृश कर दिया था, परंतु उनके मुखमंडल पर श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा और सतीत्व का तेज अब भी दमक रहा था — मानो अमावस्या की काली रात में भी चंद्रमा की एक किरण छिपी हो।
रावण का प्रलोभन और धमकी
ठीक उसी समय रावण भी वहाँ आ पहुँचा, अपने राजसी वस्त्रों और आभूषणों में सजा हुआ। उसने सीता माता को अनेक प्रकार से समझाने का प्रयास किया — साम, दान, भय और भेद, चारों नीतियों का प्रयोग किया। उसने कहा — "हे सुंदरी! मुझसे विवाह कर लो, तुम्हें संसार का सारा वैभव, सारा सुख दूँगा। तुम्हारे रूप के आगे मेरी सारी रानियाँ तुच्छ हैं।" परंतु सीता माता ने तिनके की ओट करके, बिना उसकी ओर देखे, दृढ़ स्वर में कहा — "हे दशमुख! तू जुगनू के प्रकाश समान है, और मेरे स्वामी श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी हैं। क्या कमल कभी जुगनू के प्रकाश से खिलता है? तुझे लज्जा नहीं आती, तूने छल से मुझे यहाँ ला रखा है?"
रावण यह अपमान सुनकर क्रोध से जल उठा। उसने तलवार निकालकर कहा — "मैं तेरा सिर काट डालूँगा!" परंतु उसकी पत्नी मंदोदरी और अन्य सचिवों ने उसे शांत किया, नीति समझाई। तब रावण ने अंतिम चेतावनी दी — "मैं तुझे एक मास का समय देता हूँ। यदि तूने मुझसे विवाह करने का निश्चय न किया, तो मैं तुझे मरवा डालूँगा!" यह कहकर वह क्रोध में वहाँ से चला गया।
रावण के जाने के बाद राक्षसियों ने सीता माता को और भी डराना-धमकाना आरंभ किया, परंतु उनमें त्रिजटा नामक एक राक्षसी थी, जो राम-भक्त और विवेकशील थी। उसने उसी रात एक अत्यंत भयंकर स्वप्न देखा — जिसमें एक वानर लंका जला रहा है, रावण की सेना नष्ट हो रही है, और रावण गधे पर चढ़कर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है — यह सब रावण के विनाश और विभीषण के राज्याभिषेक के शुभ संकेत थे। त्रिजटा ने यह स्वप्न सबको सुनाकर कहा — "यह चार दिन में सत्य होकर रहेगा, इसलिए अब सीता को सताना छोड़ दो।" यह सुनकर सब राक्षसियाँ भयभीत होकर वहाँ से चली गईं।
सीता माता का विषाद
भक्तो, अब वह अत्यंत मार्मिक क्षण आता है जो हर भक्त के हृदय को द्रवित कर देता है। सारी राक्षसियाँ चले जाने के बाद सीता माता अकेली रह गईं, और उनका मन गहरे विषाद में डूब गया — "एक मास बीतते ही यह दुष्ट मुझे मार डालेगा। मेरे प्रियतम श्रीराम अब तक नहीं आए, शायद उन्हें मेरी सुधि ही नहीं है, या शायद कोई विपत्ति आ पड़ी है। अब जीवन का क्या प्रयोजन?" उन्होंने त्रिजटा से विनती की — "हे माता, अब मैं यह अपमान और सहन नहीं कर सकती। कृपया लकड़ी लाकर चिता सजा दो, मुझे अग्नि में प्रवेश करने दो।"
त्रिजटा ने उन्हें बहुत समझाया, श्रीराम के प्रताप और बल की याद दिलाई, परंतु सीता माता का हृदय निराशा में इतना डूब चुका था कि वे बोलीं — "विधाता ही मेरे प्रतिकूल हो गए हैं, न अग्नि मुझे स्वीकार करती है, न मेरी पीड़ा मिटती है। हे रात्रि! तू भी मुझ अभागिन को अभी तक क्यों नहीं निगल पाई? हे अग्नि! तू भी नए कोमल पल्लव के समान शीतल क्यों हो गई है, मुझे भस्म क्यों नहीं करती?" इतना कहकर, अत्यंत व्याकुल होकर, सीता माता ने एक वृक्ष की डाली में अपने केश बाँधने का प्रयास किया, प्राण त्यागने के निश्चय के साथ।
भक्तो, ठीक इसी क्षण, वृक्ष के ऊपर छिपे हनुमान जी यह सब मूक साक्षी बनकर देख रहे थे। उनका हृदय काँप उठा — "यदि मैं अभी प्रकट न हुआ, तो माता तो प्राण त्याग देंगी! परंतु यदि मैं अचानक इस राक्षस-नगरी में एक अनजान वानर के रूप में प्रकट हो गया, तो माता भयभीत हो सकती हैं, यह सोचकर कि यह भी कोई रावण की माया है।" यही वह क्षण है जब हनुमान जी की बुद्धिमत्ता और संवेदनशीलता दोनों की सबसे कठिन परीक्षा होती है।
सीख: सीता माता का यह विषाद हमें दिखाता है कि सबसे अटूट श्रद्धा रखने वाले भक्त के जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं जब निराशा हृदय को घेर लेती है, जब लगता है कि अब कोई सहारा नहीं बचा। परंतु ठीक ऐसे ही अंधकारमय क्षण में, जब हमें इसका आभास भी नहीं होता, सहायता निकट ही होती है — जैसे हनुमान जी वृक्ष पर छिपे, माता के निकट ही उपस्थित थे। इसलिए चाहे परिस्थिति कितनी भी निराशाजनक क्यों न लगे, धैर्य मत छोड़िए — प्रभु की कृपा अक्सर उस क्षण सबसे निकट होती है जब हमें वह सबसे दूर प्रतीत होती है।
6. मुद्रिका प्रदान
हनुमान जी ने बड़ी सूझबूझ से निर्णय लिया — उन्होंने पहले श्रीराम की मुद्रिका (अंगूठी) नीचे गिरा दी, ठीक सीता माता के सामने। भक्तो, यह कितनी सुंदर युक्ति थी — बिना स्वयं को प्रकट किए, एक ऐसा प्रमाण देना जिसे देखकर माता स्वयं ही यह जान जाएँ कि श्रीराम की ओर से कोई संदेश आया है, और तब वे किसी अनजान वानर से भयभीत नहीं होंगी।
सीता माता ने वह मुद्रिका देखी — उस पर "राम" नाम अंकित था — और वे चकित रह गईं। पहले तो उन्हें संशय हुआ — "क्या यह भी रावण की कोई नई माया है? क्योंकि अजेय श्रीराम को कोई छल से इतनी दूर, ऐसे प्रवंचना से नहीं हरा सकता।" परंतु तभी हनुमान जी ने वृक्ष पर से ही, धीरे-धीरे, अत्यंत मधुर वाणी में श्रीराम के गुणों का, उनकी महिमा का वर्णन करना आरंभ किया। यह सुनते ही सीता माता का दुःख कुछ कम हुआ, उनके कान इस अमृत-समान कथा को सुनकर तृप्त होने लगे। उन्होंने ऊपर देखा और कहा — "यह मधुर कथा सुनाने वाला कृपया प्रकट हो!"
तब हनुमान जी वृक्ष से नीचे उतरे और अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़कर बोले — "हे माता जानकी! मैं श्रीराम का दूत हूँ, मेरा नाम हनुमान है। यह लीजिए आपके स्वामी की मुद्रिका, यह सत्य प्रमाण है।" पहले तो सीता माता एक वानर को देखकर आश्चर्यचकित हुईं — "नर के साथ वानर की मित्रता कैसे हुई?" तब हनुमान जी ने सुग्रीव-मित्रता की, बालि-वध की, संपूर्ण कथा संक्षेप में सुना दी।
यह सुनकर सीता माता के मन में विश्वास जागृत हुआ — उन्होंने मन, वचन और कर्म से यह जान लिया कि यह वानर श्रीराम का ही सेवक है। उनकी आँखों से हर्ष के आँसू बह निकले, रोमांच हो आया, और वे गद्गद कंठ से बोलीं — "हे हरिजन! तुम्हें देखकर मुझे ऐसा प्रतीत होता है मानो डूबते हुए को नाव मिल गई हो। अब कहो, मेरे प्राणनाथ कुशल तो हैं? अपने अनुज लक्ष्मण सहित सकुशल हैं?"
हनुमान जी ने अत्यंत गद्गद स्वर में श्रीराम का संदेश सुनाया — "हे जानकी! श्रीराम कहते हैं — तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ विपरीत हो गया है। नए कोमल पल्लव भी मुझे कुंत (भाले) के समान चुभते हैं, चंद्रमा भी अग्नि के समान तपाता है। परंतु तुम धैर्य धरो, मैं शीघ्र ही राक्षसों का संहार करके तुम्हें ले जाऊँगा।" यह संदेश सुनकर सीता माता का हृदय श्रीराम के प्रेम से भर उठा, आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
हनुमान जी ने कहा — "माता, धैर्य धरो। जिस प्रकार श्रीराम के बाण अग्नि के समान हैं और राक्षस पतंगे के समान, वे शीघ्र ही भस्म हो जाएँगे। यदि आज्ञा हो तो मैं अभी तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर श्रीराम के पास ले चलूँ!" सीता माता मुस्कुराईं और कहा — "हे पुत्र, तुम्हारा प्रेम और साहस देखकर मुझे संतोष हुआ, परंतु यह उचित नहीं। श्रीराम स्वयं आकर, अपने बाहुबल से राक्षसों का वध करके मुझे ले जाएँ, तभी उनका यश संसार में फैलेगा। तुम्हारे साथ चोरी-छिपे जाना उनकी मर्यादा के अनुकूल नहीं।"
यह सुनकर हनुमान जी को माता की विवेकपूर्ण बुद्धि पर और भी श्रद्धा हुई। जाते समय सीता माता ने अपने केशों में से एक चूड़ामणि (चूड़ामणि — सिर का आभूषण) उतारकर हनुमान जी को दिया और कहा — "यह चूड़ामणि श्रीराम को दे देना, वे इसे पहचान लेंगे, यह उनके प्रति मेरे प्रेम और सत्य का प्रमाण होगा।" उन्होंने यह भी कहा — "मुझे विश्वास दिलाना कि मैं अभी जीवित हूँ, परंतु यदि एक मास के भीतर श्रीराम न आए, तो मैं प्राण त्याग दूँगी।"
सीख: हनुमान जी ने पहले प्रमाण (मुद्रिका) भेजा, फिर मधुर वचनों से विश्वास जीता, तब स्वयं प्रकट हुए — यह हमें सिखाता है कि किसी भयभीत, आहत हृदय के सामने जब हम पहुँचते हैं, तो धैर्य और संवेदनशीलता से, चरण-दर-चरण विश्वास बनाना चाहिए, अचानक या जबरन नहीं। और सीता माता का यह निर्णय — कि वे स्वयं हनुमान जी के साथ न जाकर श्रीराम की प्रतीक्षा करेंगी — हमें सिखाता है कि कभी-कभी सबसे आसान रास्ता अपनाने के बजाय, सही और मर्यादित रास्ते की प्रतीक्षा करना ही सच्ची गरिमा है।
7. अशोक वाटिका ध्वंस एवं बंधन
सीता माता से विदा लेकर हनुमान जी के मन में विचार आया — "मैंने अभी माता को केवल दर्शन दिए, संदेश दिया, परंतु राक्षसों को यह भी जताना आवश्यक है कि वानर सेना कितनी शक्तिशाली है, ताकि रावण को अपनी शक्ति का अनुमान हो जाए और वह भयभीत हो।" उन्होंने कहा — "मुझे भूख भी लगी है, इस वाटिका के मधुर फल खाकर, फिर कुछ लीला करके देखता हूँ।"
हनुमान जी ने पहले अशोक वाटिका के मीठे फल खाए, वृक्षों को तोड़ना-मरोड़ना आरंभ किया, सुंदर उद्यान को पूरी तरह उजाड़ डाला। रखवालों ने रावण को सूचना दी — "एक विशाल वानर ने आकर अशोक वाटिका उजाड़ दी है!" रावण ने क्रोध में अनेक राक्षस-योद्धा भेजे, हनुमान जी ने उन सबको मार गिराया या पीट-पीटकर धूल में मिला दिया।
फिर रावण ने अपने पुत्र अक्षयकुमार को भेजा, जो अत्यंत शक्तिशाली और युद्ध-कुशल था। भीषण युद्ध हुआ, परंतु हनुमान जी ने अंततः अक्षयकुमार का भी वध कर डाला। यह सुनकर रावण अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हुआ, और उसने अपने सबसे बड़े योद्धा — पुत्र मेघनाद (इंद्रजित) को भेजा।
मेघनाद और हनुमान जी के बीच घमासान युद्ध हुआ। हनुमान जी ने उसका रथ तोड़ डाला, उसके सारथी को मार डाला, बड़े-बड़े राक्षस-योद्धाओं का संहार कर दिया। जब मेघनाद कोई भी अस्त्र हनुमान जी पर प्रभावी न कर सका, तब उसने अंतिम उपाय के रूप में ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।
हनुमान जी ने मन में विचार किया — "यह ब्रह्मास्त्र है, स्वयं ब्रह्मा जी का अस्त्र, इसका सम्मान करना उचित है। यदि मैं इसे टाल भी दूँ, तो भी इसका अपमान न हो, इसलिए इसे स्वीकार कर लेना ही श्रेष्ठ होगा। इसके अतिरिक्त, इस बंधन के बहाने मुझे स्वयं रावण की सभा में पहुँचने और उसे प्रत्यक्ष उपदेश देने का अवसर भी मिल जाएगा।" यह सोचकर हनुमान जी ने स्वयं को ब्रह्मास्त्र के बंधन में बँधने दिया।
राक्षस यह देखकर हर्षित हुए और नागपाश जैसी अन्य रस्सियों से भी उन्हें बाँध दिया — परंतु ज्यों ही साधारण रस्सियाँ शरीर से बँधीं, ब्रह्मास्त्र का प्रभाव स्वतः समाप्त हो गया, क्योंकि ब्रह्मा जी का अस्त्र स्वयं यह प्रतिज्ञा रखता था कि वह किसी को अपमानित होते नहीं देख सकता। परंतु हनुमान जी ने यह बात प्रकट नहीं होने दी — उन्होंने जान-बूझकर बंधे रहना स्वीकार किया, क्योंकि उन्हें तो रावण की सभा तक पहुँचना ही था।
सीख: हनुमान जी की यह लीला हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति वह है जो आवश्यकता पड़ने पर स्वेच्छा से विनम्र भी हो सकती है। उन्होंने ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए बंधन स्वीकार किया — यह कोई पराजय नहीं थी, बल्कि एक सुविचारित रणनीति थी, अपने बड़े उद्देश्य (रावण को संदेश देना) को साधने के लिए। कभी-कभी हमें भी अपने लक्ष्य के लिए क्षणिक रूप से समर्पण जैसा दिखने वाला मार्ग अपनाना पड़ता है — परंतु भीतर से हमारा उद्देश्य और आत्मबल अडिग रहना चाहिए।
8. रावण-हनुमान संवाद
बंधे हुए हनुमान जी को राक्षस रावण की भव्य सभा में ले गए। सारी सभा कौतूहलवश उस विशाल वानर को देखने उमड़ पड़ी। रावण अपने सिंहासन पर बैठा, क्रोध और तिरस्कार से भरा हुआ बोला — "तू कौन है, मूर्ख वानर? किसके बल पर तूने मेरा उद्यान उजाड़ा, मेरे योद्धाओं को मारा, मेरे पुत्र अक्षयकुमार का वध किया? क्या तुझे अपने प्राणों की चिंता नहीं?"
हनुमान जी तनिक भी भयभीत नहीं हुए। उन्होंने सिंहासन की ऊँचाई तक अपनी पूँछ को कुंडली बनाकर एक ऊँचा आसन बना लिया, और उस पर बैठकर, अत्यंत निर्भीक और तेजस्वी वाणी में बोले — "हे दशानन! मैं भगवान श्रीराम का दूत हूँ, पवनपुत्र हनुमान। जिनके बल से मैंने ब्रह्मा, विष्णु, शिव तक को उत्पन्न, पालन और संहार करते देखा है, जिनके नाम-मात्र से यह सृष्टि थर्रा उठती है, मैं उन्हीं श्रीराम का दूत हूँ। मुझे मारना तो दूर, तुझमें मुझे रोकने की भी सामर्थ्य नहीं।"
हनुमान जी ने आगे कहा — "हे रावण! तूने अपने अभिमान में यह भूल कर दी कि जिस श्रीराम ने खर-दूषण, त्रिशिरा, बालि जैसे अतुलित बलशाली राक्षसों-वीरों का वध किया, उन्हीं का तूने अपमान करने का दुःसाहस किया है। तूने माता सीता का अपहरण करके अपने कुल का नाश स्वयं आमंत्रित कर लिया है। मैं तुझे विनम्रतापूर्वक सलाह देता हूँ — अपना मिथ्या अभिमान त्यागकर सीता माता को श्रीराम को लौटा दे, उनकी शरण में चला जा। वे अत्यंत करुणासागर हैं, शरण में आए हुए को कभी नहीं त्यागते।"
रावण यह सुनकर क्रोध से आगबबूला हो उठा — "यह तुच्छ वानर मुझे उपदेश दे रहा है? इसका वध कर दो!" परंतु विभीषण जी, जो वहीं उपस्थित थे, तुरंत आगे बढ़े और नीतिपूर्वक समझाया — "हे भ्राता! दूत का वध करना नीति और शास्त्र के विरुद्ध है। इसे कोई अन्य दंड दीजिए, परंतु प्राण मत लीजिए।"
रावण ने विचार करके कहा — "वानर को पूँछ अत्यंत प्रिय होती है, इसकी पूँछ में आग लगा दो, फिर इसे समूचे नगर में घुमाओ, इससे इसका अपमान भी होगा और यह हमारी शक्ति भी देख लेगा।" राक्षसों ने हनुमान जी की पूँछ में कपड़ा लपेटकर उसमें तेल-घी डाला और आग लगा दी। भक्तो, यहीं हनुमान जी ने मन-ही-मन मुस्कुराते हुए सोचा — "मूर्ख राक्षसो, तुमने मेरी पूँछ में आग लगाकर स्वयं अपने ही नगर के विनाश का साधन तैयार कर दिया है!"
सीख: हनुमान जी का यह निर्भीक संवाद हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की बात कहने के लिए किसी बड़े पद या शस्त्र की आवश्यकता नहीं, केवल निर्भीक हृदय चाहिए। चाहे शत्रु कितना भी शक्तिशाली और क्रोधित क्यों न हो, सत्य को स्पष्ट, विनम्र परंतु दृढ़ स्वर में कहने से कभी न डरें। और विभीषण जी का हस्तक्षेप हमें यह भी सिखाता है कि परिवार और मित्रों के बीच रहकर भी, जब अन्याय होता दिखे, तो नीति और धर्म की बात कहने का साहस रखना चाहिए, चाहे वह असुविधाजनक ही क्यों न हो।
9. लंका दहन
हनुमान जी की पूँछ में आग लगते ही राक्षस ढोल बजाने लगे, ताली पीटने लगे, हनुमान जी को समूची लंका नगरी में घुमाया जाने लगा, ताकि सब देख सकें और उनका उपहास करें। परंतु हनुमान जी ने तत्क्षण अपने शरीर को अत्यंत विशाल और हल्का कर लिया, और एक भवन से दूसरे भवन पर छलांग लगाते हुए, अपनी जलती हुई पूँछ से एक-एक करके सारी लंका नगरी में आग लगाना आरंभ कर दिया।
भक्तो, वह दृश्य कल्पना कीजिए — स्वर्ण के महल, जो अभी थोड़ी देर पहले तक अपनी चमक-दमक से आँखें चौंधिया रहे थे, अब धू-धू करके जल उठे। हवा प्रभु की प्रेरणा से इतनी प्रचंड गति से बहने लगी कि आग एक भवन से दूसरे भवन में फैलती चली गई। पूरी लंका नगरी अग्नि की लपटों में घिर गई, राक्षस चीखते-चिल्लाते, अपने प्राण और धन बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। हाहाकार मच गया — "हाय! कौन हमें इस विपत्ति से बचाएगा?"
परंतु भक्तो, यहीं एक अत्यंत विलक्षण और चमत्कारिक बात हुई — जहाँ सारी लंका जल रही थी, वहीं अशोक वाटिका, जहाँ सीता माता विराजमान थीं, हनुमान जी की इच्छा से पूर्णतः अस्पर्शित, अग्नि से अछूती रह गई। हनुमान जी ने अपनी शक्ति और भक्ति से यह सुनिश्चित किया कि जिस अग्नि ने भेजने वाले (रावण) को दंड देने का साधन बनाया, वह उस माता को स्पर्श तक न कर पाए जिसके लिए वे यह सब कर रहे थे।
तुलसीदास जी इस प्रसंग में एक सुंदर बात कहते हैं — जो अग्नि रावण के ही एक असुर-मित्र निर्ऋति (या कहा जाता है अग्नि देव स्वयं) से उत्पन्न हुई थी, वह अग्नि हनुमान जी को — जो पवनदेव के पुत्र हैं — क्यों जलाती? पवन और अग्नि का प्रगाढ़ संबंध होने के कारण अग्नि ने हनुमान जी को कोई हानि नहीं पहुँचाई, केवल शत्रुओं के नगर को भस्म करने का साधन बनी।
समूची लंका नगरी जल-भुनकर राख हो गई, केवल विभीषण जी का घर अछूता रहा, क्योंकि वे धर्मात्मा और श्रीराम के परम भक्त थे। कार्य पूर्ण करने के बाद हनुमान जी समुद्र के तट पर पहुँचे और अपनी जलती हुई पूँछ को समुद्र के जल में डुबोकर शांत किया।
सीख: लंका दहन हमें सिखाता है कि जब अन्याय अपने चरम पर पहुँच जाता है, तो प्रकृति भी उसके विनाश में सहायक बन जाती है। परंतु इससे भी बड़ी सीख यह है कि हनुमान जी ने अपने क्रोध और शक्ति को भी इतना नियंत्रित रखा कि विनाश की आग भी माता सीता तक नहीं पहुँची — क्योंकि सच्चा बल वह है जो लक्ष्य को पहचानता है, जो निर्दोष को हानि नहीं पहुँचाता, चाहे परिस्थिति कितनी भी उग्र क्यों न हो।
10. हनुमान वापसी एवं समाचार
कार्य पूर्ण करके, माता सीता से पुनः दर्शन और आशीर्वाद लेकर, हनुमान जी हर्षित होकर समुद्र लांघकर वापस उस पर्वत पर पहुँचे जहाँ अंगद और शेष वानर-दल उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। हनुमान जी की गर्जना सुनते ही सभी वानर हर्ष से उछल पड़े — उन्हें समझ आ गया कि हनुमान जी सफल होकर लौटे हैं। सब वानर हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े, उन्हें गले लगाया, मानो नया जन्म पाया हो।
मार्ग में सभी वानर मधुबन में रुक गए, जो सुग्रीव का निजी, अत्यंत सुरक्षित उद्यान था, और वहाँ के मीठे फल बिना अनुमति खाने लगे, उपद्रव मचाने लगे — क्योंकि उन्हें विश्वास था कि जब कार्य सफल हो चुका है, तो सुग्रीव इस उत्पात को क्षमा कर देंगे। रखवालों ने जाकर सुग्रीव को शिकायत की, परंतु सुग्रीव ने हर्षित होकर कहा — "यदि सीता माता की सुधि न मिली होती, तो ये वानर मधुबन के फल छूते भी नहीं! अवश्य ही हनुमान जी सफल होकर लौटे हैं!" और उन्होंने उपद्रव को क्षमा करके सबको प्रसन्नतापूर्वक बुला भेजा।
सभी वानर श्रीराम के पास पहुँचे, हनुमान जी सबसे आगे। अंगद ने कहा — "प्रभु, हनुमान जी ने कार्य पूर्ण कर दिखाया, हम सब वानरों के प्राण बचा लिए।" यह सुनकर श्रीराम का हृदय हर्ष से भर उठा, परंतु वे धैर्यपूर्वक हनुमान जी के मुख से सारा समाचार सुनना चाहते थे।
हनुमान जी ने भगवान श्रीराम के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और अत्यंत विनम्रता से, गद्गद कंठ से सारी कथा सुनानी आरंभ की — सागर लंघन से लेकर सीता माता के दर्शन तक, लंका दहन तक, सब कुछ विस्तार से बताया। जब उन्होंने माता सीता की विरह-वेदना, उनके प्राण त्यागने के निश्चय, और अंततः उनकी दृढ़ श्रीराम-भक्ति की कथा सुनाई, तो श्रीराम के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली — साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर भी अपनी प्रिय पत्नी की पीड़ा सुनकर द्रवित हो उठे, यह उनकी लीला की सबसे मार्मिक झलक थी।
अंत में हनुमान जी ने वह चूड़ामणि श्रीराम के हाथों में रखी, जो सीता माता ने प्रेम-चिह्न स्वरूप भेजी थी। श्रीराम ने उस चूड़ामणि को अपनी हृदय से लगा लिया, मानो स्वयं सीता माता को ही पा लिया हो। उन्होंने भावविह्वल होकर कहा — "हे हनुमान! तुमने जो उपकार किया है, उसका ऋण मैं कभी नहीं चुका सकता। तुम मेरे प्राणों के समान प्रिय हो।" यह कहकर उन्होंने हनुमान जी को हृदय से लगा लिया — भक्तो, यह वह क्षण था जब स्वामी और सेवक के बीच का भेद मिट गया, केवल प्रेम ही प्रेम शेष रहा।
सीख: हनुमान जी की यह वापसी हमें सिखाती है कि सच्ची सेवा का सबसे बड़ा पुरस्कार स्वामी का हार्दिक आलिंगन और विश्वास होता है, न कि कोई धन या पद। और श्रीराम के आँसू हमें यह भी सिखाते हैं कि सबसे बड़ी शक्ति रखने वाला व्यक्ति भी जब अपने प्रियजनों की पीड़ा सुनता है, तो उसका द्रवित होना कमजोरी नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम का प्रमाण है।
11. विभीषण शरणागति
भक्तो, अब कथा आगे बढ़ती है श्रीराम की विशाल वानर-सेना के लंका की ओर प्रस्थान के साथ। जब वानर-सेना समुद्र तट पर पहुँची, उसी समय लंका में एक और महत्वपूर्ण घटना घट रही थी। विभीषण जी ने रावण को बार-बार, अत्यंत विनम्रता और नीतिपूर्वक समझाने का प्रयास किया — "हे भ्राता! श्रीराम कोई साधारण राजा नहीं, वे स्वयं भुवनेश्वर हैं, काल के भी काल हैं। सीता माता को लौटा दो, अन्यथा हमारे समूचे कुल का विनाश निश्चित है। जो व्यक्ति सच्चा कल्याण चाहता है, वह पराई स्त्री का, विशेषकर श्रीराम जैसी शक्ति की पत्नी का, कभी अपहरण नहीं करता।"
रावण ने यह उपदेश सुनकर अत्यंत क्रोधित होकर कहा — "तू मेरा ही अन्न खाकर मेरे ही शत्रु का पक्ष लेता है? तुझे लज्जा नहीं आती?" और उसने विभीषण जी को लात मार दी — अपने ही सगे भाई को, जो केवल हितकारी नीति की बात कह रहे थे। यह अपमान विभीषण जी के लिए असहनीय था।
विभीषण जी ने विचार किया — "श्रीराम सत्य-संकल्प, धर्म के अवतार हैं। यह सभा अब काल के वश में आकर अपना विनाश निमंत्रण दे चुकी है। मुझे अब यहाँ रहना उचित नहीं, मैं श्रीराम की शरण में जाता हूँ।" इतना कहकर वे कुछ विश्वस्त सचिवों को साथ लेकर आकाश-मार्ग से समुद्र पार करके श्रीराम की सेना के पास पहुँचे।
वानर-सेना में यह देखकर हलचल मच गई — "यह तो रावण का भाई है, शत्रु-पक्ष से कोई गुप्तचर बनकर तो नहीं आया?" सुग्रीव सहित अनेक वानर-प्रमुखों ने संदेह व्यक्त किया — "प्रभु, यह भेद लेने आया है, इसे बाँध लीजिए, या मार डालिए।" परंतु हनुमान जी ने, जो स्वयं विभीषण जी के धर्मात्मा स्वभाव को पहचान चुके थे, विनम्रता से कहा — "प्रभु शरणागत-वत्सल हैं, यह हमारी नीति नहीं होगी कि शरण में आए किसी को यूँ ही संदेह के आधार पर अस्वीकार कर दें।"
तब श्रीराम ने वह अमर वचन कहा, जो युगों-युगों तक शरणागति के सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्मरण किया जाएगा — "हे मित्रो! सुनो, मेरी नीति स्पष्ट है — जो एक बार भी, किसी भी भाव से मेरी शरण में आ जाए और कहे 'मैं तुम्हारा हूँ', मैं उसे समस्त प्राणियों से अभय कर देता हूँ, यही मेरा व्रत है। चाहे कोई करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का पापी ही क्यों न हो, यदि वह मेरी शरण में आ जाए, तो मैं उसे कभी नहीं त्यागता। पापी का स्वभाव ही होता है पाप करना, परंतु जो निर्मल मन से मेरे पास आया है, वह मुझे प्रिय है — मुझे छल-कपट पसंद नहीं। और यदि भेद लेने ही आया हो, तो भी क्या हानि — मेरी सेना में तो लक्ष्मण के एक ही बाण से समस्त राक्षसों का संहार हो सकता है, फिर भय किस बात का?"
यह कहकर श्रीराम ने मुस्कुराते हुए विभीषण जी को आदरपूर्वक बुलवाया। विभीषण जी दूर से ही श्रीराम के छवि-धाम स्वरूप को देखकर स्तब्ध रह गए, नेत्रों से आँसू बहने लगे, रोमांच हो आया। उन्होंने दंडवत प्रणाम करते हुए कहा — "हे प्रभु! मैं रावण का भाई हूँ, राक्षस-कुल में जन्मा हूँ, आपका सुयश सुनकर आपकी शरण में आया हूँ। हे संसार के भय हरने वाले! मेरी रक्षा कीजिए, त्राहि-त्राहि!"
श्रीराम तुरंत उठ खड़े हुए, अत्यंत हर्षित होकर विभीषण जी को अपने लक्ष्मण सहित गले लगाया, अपने पास बैठाया, और अभयदान दिया। उन्होंने कहा — "हे विभीषण! अब तुम निश्चिंत रहो। जब तक मैं तुम्हें लंका का राज्य न दिला दूँ, तब तक मेरा विश्राम नहीं।" यह सुनकर विभीषण जी की आँखों से हर्षाश्रु बहने लगे, और उन्होंने ही श्रीराम को समुद्र पार करने की युक्ति सुझाने की बात भी कही।
सीख: भक्तो, यह प्रसंग संपूर्ण रामचरितमानस के सबसे गहन उपदेशों में से एक है। श्रीराम का यह वचन हमें सिखाता है कि सच्ची करुणा वह है जो किसी के अतीत, उसके कुल, उसकी पृष्ठभूमि को देखकर निर्णय नहीं लेती, बल्कि उसके वर्तमान हृदय की सच्चाई को परखती है। जो व्यक्ति सच्चे मन से शरण माँगता है, उसे स्वीकार करने में हमें भी उदार होना चाहिए, संदेह और पूर्वाग्रह को दूर रखकर। और विभीषण जी का साहस हमें यह भी सिखाता है कि जब अपने ही परिवार में अधर्म व्याप्त हो जाए, तो सत्य और धर्म का साथ देना ही सच्ची निष्ठा है, चाहे इसके लिए अपने ही रक्त-संबंधों से दूर क्यों न होना पड़े।
12. समुद्र तट पर श्रीराम
विभीषण जी को शरण देने के बाद श्रीराम ने पूछा — "अब इस विशाल, गंभीर समुद्र को कैसे पार करें?" विभीषण जी ने सुझाव दिया — "प्रभु, समुद्र भी आपका ही सेवक है, आपके पूर्वज महाराज सगर के कुलगुरु का यह सागर सम्मान करता है, आप इससे विनम्रतापूर्वक मार्ग माँगिए, यह अवश्य उपाय बताएगा।"
श्रीराम ने विभीषण जी की सलाह मानकर, समुद्र-तट पर दर्भ (कुश) बिछाकर, अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा से समुद्र की स्तुति और प्रार्थना आरंभ की। वे तीन दिनों तक निरंतर विनयपूर्वक समुद्र से मार्ग माँगते रहे, परंतु समुद्र देव की ओर से कोई उत्तर न आया, कोई हलचल न हुई।
भक्तो, यहाँ ध्यान दीजिए — श्रीराम ने, जो स्वयं परब्रह्म हैं, तीन दिन तक अत्यंत धैर्य और विनम्रता के साथ प्रतीक्षा की, कोई अहंकार नहीं दिखाया। परंतु जब विनय का कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा — "हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ। जो विनय की भाषा नहीं समझता, उसे कठोरता की भाषा में ही समझाना पड़ता है। मैं अपने अग्निबाण से इस समूचे सागर को सुखा डालूँगा!" उन्होंने कहा — "जिस प्रकार कोमल केले के वृक्ष को काटने पर ही वह फल देता है, कितना भी सींचने पर वह विनय से फल नहीं देता — उसी प्रकार कुछ प्रकृतियाँ केवल दंड की भाषा ही समझती हैं।"
यह देखकर समुद्र देव अत्यंत भयभीत हो उठे और तुरंत मनुष्य रूप धारण करके, हाथ जोड़कर श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा — "हे प्रभु! मुझे क्षमा करें, मेरे सारे अपराध क्षमा कीजिए। मैं तो आपकी ही माया से रचा हुआ जड़ पदार्थ हूँ, आपकी मर्यादा के अनुसार ही व्यवहार करता हूँ — यदि आपकी सेना बिना किसी परिश्रम के मुझे पार कर जाए, तो लोग यह मर्यादा भूल जाएँगे कि जल तो जल ही रहता है, इसे तैरकर ही पार करना पड़ता है। कृपया मुझे दंड न दें, मैं आपको उपाय बताता हूँ।"
समुद्र देव ने कहा — "हे प्रभु! आपकी सेना में नल और नील नामक दो वानर हैं, जिन्हें बचपन में एक ऋषि का आशीर्वाद प्राप्त है कि वे जो भी वस्तु जल में डालेंगे, वह डूबेगी नहीं, तैरती रहेगी। इनकी सहायता से आप एक विशाल सेतु (पुल) का निर्माण कीजिए, मैं स्वयं उस सेतु को स्थिर रखने में सहायता करूँगा। और मेरे उत्तरी तट पर बसे राक्षस, जो अत्यंत पापी और दुष्ट हैं, उन्हें आप दंड दीजिए, यह मेरी भी प्रार्थना है।"
श्रीराम यह सुनकर प्रसन्न हुए, समुद्र देव को क्षमा किया, और नल-नील के नेतृत्व में सेतु-निर्माण का कार्य आरंभ हुआ — विशाल वानर-सेना पर्वतों को उखाड़-उखाड़कर समुद्र में डालने लगी, और आश्चर्यजनक रूप से वे पत्थर जल में तैरने लगे! भक्तो, यहीं से आरंभ होती है वह अद्भुत रामसेतु की कथा, जो आगे लंकाकाण्ड में हमें और विस्तार से सुनने को मिलेगी।
सीख: समुद्र देव का यह प्रसंग हमें एक अत्यंत सूक्ष्म परंतु महत्वपूर्ण सत्य सिखाता है — विनय और प्रार्थना सदैव प्रथम प्रयास होनी चाहिए, परंतु जब विनय का कोई सम्मान न मिले, कोई प्रत्युत्तर न आए, तो दृढ़ता और आवश्यकता पड़ने पर उचित कठोरता दिखाना भी अनुचित नहीं। श्रीराम का क्रोध भी अंधा नहीं था — वह धर्म-संगत, संयमित और उद्देश्यपूर्ण था, विनाश के लिए नहीं बल्कि मर्यादा स्थापित करने के लिए। जीवन में भी हमें यह विवेक रखना चाहिए — विनम्रता कमजोरी नहीं, परंतु हर परिस्थिति में केवल विनम्र बने रहना भी सदैव उचित नहीं होता।
13. उपसंहार — संपूर्ण सुन्दरकाण्ड का सार
भक्तो, अब हम पीछे मुड़कर देखें तो यह संपूर्ण सुन्दरकाण्ड हमारे सामने भक्ति, साहस और बुद्धि के अद्भुत संगम के रूप में प्रकट होता है। यह काण्ड केवल एक दूत की यात्रा की कथा नहीं, यह हमें सिखाता है कि सच्चा भक्त कैसा होता है — जो अपने स्वामी के कार्य के लिए समुद्र लांघने से नहीं हिचकिचाता, जो शक्ति में अद्वितीय होकर भी विनम्रता नहीं त्यागता, जो चतुराई और साहस दोनों का संतुलन बनाए रखता है, और जो सफलता का सारा श्रेय स्वयं को नहीं, अपने स्वामी की कृपा को देता है।
मैनाक पर्वत का प्रलोभन हमें सिखाता है कि लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए विश्राम के आकर्षक अवसरों से कैसे विनम्रतापूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। सुरसा और सिंहिका की परीक्षाएँ हमें बताती हैं कि हर बाधा को एक ही रणनीति से नहीं जीता जा सकता — कभी बुद्धि चाहिए, कभी निर्णायक प्रहार। लंकिनी का पतन हमें दिखाता है कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसके पतन का समय अवश्य आता है। सीता माता का विषाद और उसका अंत हमें सिखाता है कि निराशा के सबसे गहरे क्षण में भी सहायता निकट होती है, बस धैर्य चाहिए। मुद्रिका-प्रदान का प्रसंग हमें संवेदनशीलता और धैर्य से विश्वास बनाने की कला सिखाता है। अशोक वाटिका ध्वंस और रावण-संवाद हमें निर्भीकता से सत्य कहने का साहस सिखाते हैं। लंका दहन हमें दिखाता है कि सच्चा बल वह है जो लक्ष्य को कभी नहीं भूलता, निर्दोष को कभी हानि नहीं पहुँचाता। और विभीषण की शरणागति तथा श्रीराम का अमर वचन — यह इस समूचे काण्ड का हृदय है — सिखाता है कि भगवान की करुणा किसी के अतीत, कुल या पृष्ठभूमि की मोहताज नहीं, केवल सच्चे हृदय की शरणागति चाहिए।
सबसे बढ़कर, भक्तो, हनुमान जी हमें यह सिखाते हैं कि असीम शक्ति और असीम विनम्रता एक साथ रह सकती हैं — कि जो जितना अधिक समर्थ होता है, उसे उतना ही अधिक विनीत होना चाहिए। यही कारण है कि सुन्दरकाण्ड को अकेला भी पढ़ने से संकट कटते हैं, साहस मिलता है, बुद्धि जागृत होती है — क्योंकि यह भक्ति, साहस, बुद्धि और करुणा के परिपूर्ण संगम की कथा है।
जय श्री सीताराम! अब समुद्र पर सेतु बन रहा है, विशाल वानर-भालु सेना लंका की ओर कूच करने को तैयार है, विभीषण जी को श्रीराम का आश्वासन मिल चुका है। आगे लंकाकाण्ड में हम देखेंगे वह महासंग्राम, जिसमें धर्म और अधर्म की अंतिम टक्कर होगी — जहाँ अंगद का दूत बनकर जाना होगा, कुम्भकर्ण का भीषण पराक्रम होगा, मेघनाद की माया होगी, लक्ष्मण का शक्ति-बाण से मूर्च्छित होना और संजीवनी बूटी की खोज में हनुमान जी का पुनः पर्वत उठाकर लाना होगा, और अंततः रावण के साथ वह अंतिम युद्ध होगा जिसमें अधर्म का अंत और धर्म की पूर्ण विजय होगी।
॥ जय श्री सीताराम ॥